Beyond the Fog: Discovering Hidden Truths

A Village Between Hills and Forests

In the northeast of India, a small village lay between rolling hills and dense forests, where the air carried the scent of pine and rain.

Locals recount a horror story from years past when strangers vanished, and night sounds rose from the trees as if listening to every breath. Some villagers still listen for footsteps that never come, and the forest seems to hold a memory of that night.

उस गाँव का नाम था लुमथांग

नक्शे पर उसका नाम मुश्किल से दिखाई देता था।

गाँव तक पहुँचने के लिए पहले शहर से बस पकड़नी पड़ती थी।

फिर बस एक संकरी पहाड़ी सड़क पर चलती थी।

कुछ घंटों बाद सड़क खत्म हो जाती थी।

उसके बाद रास्ता पैदल था।

लगभग छह kilometer

घना जंगल।

बाँस के झुरमुट।

छोटे-छोटे झरने।

और हर तरफ धुंध।

लुमथांग में लगभग पचास घर थे।

अधिकतर घर लकड़ी के बने थे।

घर जमीन से थोड़े ऊपर बनाए जाते थे।

कहा जाता था कि ऐसा इसलिए ताकि बारिश का पानी घर के अंदर न आए।

लेकिन गाँव के बुजुर्गों का कहना था कि असली वजह कुछ और थी।

वे कहते थे—

“जमीन पर रात में जो चलता है, उसे घर के अंदर आने मत देना।”

गाँव में यह बात बच्चों को डराने के लिए नहीं कही जाती थी।

बड़े भी इसे गंभीरता से लेते थे।

शाम के बाद कोई घर के नीचे नहीं जाता था।

कुत्तों को भी रात में खुला नहीं छोड़ा जाता था।

और सबसे जरूरी नियम था—

धुंध में किसी का नाम सुनाई दे तो जवाब मत देना।

क्योंकि धुंध में आवाजें इंसानों की नहीं होतीं।

लुमथांग का सबसे पुराना हिस्सा गाँव से थोड़ा दूर था।

वहाँ एक पत्थर की सीढ़ी जंगल के अंदर जाती थी।

सीढ़ियों के ऊपर एक बहुत पुराना लकड़ी का पुल था।

पुल के नीचे गहरी खाई थी।

और खाई के नीचे एक नदी बहती थी।

गाँव वाले उसे सियांग-रू कहते थे।

उस नदी के बारे में कहा जाता था कि वह पहाड़ से नहीं निकलती।

वह जंगल के नीचे से आती है।

और जंगल के नीचे…

कुछ और भी है।

कहानी की शुरुआत तब हुई जब शहर से एक युवक लुमथांग आया।

उसका नाम था अर्जुन

अर्जुन की उम्र अट्ठाईस साल थी।

वह एक सरकारी सर्वे टीम के साथ गाँव आया था।

उसे पहाड़ी इलाके में पुराने रास्तों और पुलों का सर्वे करना था।

उसके साथ दो और लोग थे।

लेकिन गाँव तक पहुँचते-पहुँचते बाकी दोनों लोग लौट गए।

अर्जुन को अकेले सर्वे पूरा करना था।

गाँव के मुखिया ने उसे रहने के लिए अपना पुराना घर दे दिया।

घर गाँव के आखिरी छोर पर था।

घर के पीछे बाँस का जंगल था।

और जंगल के बाद वही नदी।

पहली शाम अर्जुन ने गाँव में घूमते हुए कुछ अजीब देखा।

लोग सूरज ढलने से पहले अपने घरों के दरवाजों पर छोटे-छोटे सफेद पत्थर रख रहे थे।

उसने एक बूढ़ी महिला से पूछा—

“ये पत्थर क्यों रखते हैं?”

महिला ने उसकी तरफ देखा।

फिर बोली—

“तुम शहर से आए हो।”

“हाँ।”

“तो बेहतर है कि तुम मत जानो।”

अर्जुन हँस दिया।

“मैं भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं करता।”

महिला ने कहा—

“हम भी नहीं करते।”

“फिर?”

“हम जानते हैं।”

यह कहकर वह चली गई।

अर्जुन को पहली बार लगा कि इस गाँव में कुछ अजीब जरूर है।

रात करीब नौ बजे बारिश शुरू हुई।

लकड़ी की छत पर पानी गिरने की आवाज लगातार आने लगी।

अर्जुन ने अपना सामान खोला।

लैपटॉप निकाला।

कुछ तस्वीरें देखीं।

फिर अचानक बिजली चली गई।

पूरा गाँव अँधेरे में डूब गया।

अर्जुन ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

खिड़की के बाहर घनी धुंध थी।

इतनी घनी कि उसे अपना आँगन भी दिखाई नहीं दे रहा था।

तभी…

किसी ने उसका नाम पुकारा।

“अर्जुन…”

वह खिड़की की तरफ देखता रह गया।

आवाज बाहर से आई थी।

फिर दोबारा।

“अर्जुन…”

उसने खिड़की खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

फिर उसे बूढ़ी महिला की बात याद आई।

धुंध में किसी का नाम सुनाई दे तो जवाब मत देना।

उसने खिड़की नहीं खोली।

कुछ सेकंड बाद आवाज बंद हो गई।

अर्जुन ने सोचा कि शायद उसे भ्रम हुआ था।

फिर खिड़की पर किसी ने उँगली से लिखा—

“देखो मत।”

अर्जुन पीछे हट गया।

उसने टॉर्च खिड़की पर डाली।

काँच पर कोई नहीं था।

लेकिन शब्द अभी भी वहाँ थे।

और सबसे डरावनी बात यह थी कि शब्द बाहर की तरफ नहीं…

काँच के अंदर की तरफ लिखे हुए थे।

अर्जुन पूरी रात नहीं सोया।

सुबह जब गाँव वाले आए तो उसने उन्हें सब बताया।

मुखिया ने खिड़की देखी।

वह कुछ देर चुप रहा।

फिर बोला—

“आज रात तुम अकेले मत रहना।”

अर्जुन ने पूछा—

“क्यों?”

मुखिया ने कहा—

“क्योंकि उसने तुम्हें देख लिया है।”

“किसने?”

मुखिया ने जवाब नहीं दिया।

उसने घर के नीचे देखा।

फिर बोला—

“आज से सूरज ढलने के बाद बाहर मत निकलना।”

अर्जुन ने बात मान ली।

लेकिन दोपहर को उसे सर्वे के लिए पुराने पुल तक जाना पड़ा।

पुल गाँव से लगभग दो किलोमीटर दूर था।

रास्ते में उसे एक लड़की मिली।

लगभग पच्चीस साल की।

उसका नाम था नारा

वह गाँव की स्कूल शिक्षिका थी।

नारा ने पूछा—

“आप पुल की तरफ जा रहे हैं?”

“हाँ।”

“आज मत जाइए।”

“क्यों?”

“धुंध आने वाली है।”

अर्जुन ने आसमान देखा।

आसमान साफ था।

“अभी तो धूप है।”

नारा बोली—

“यहाँ धुंध आसमान से नहीं आती।”

अर्जुन हँस पड़ा।

नारा नहीं हँसी।

उसने कहा—

“अगर वहाँ आपको कोई घंटी सुनाई दे…”

वह रुक गई।

“तो?”

“पीछे मत देखिएगा।”

अर्जुन ने पूछा—

“और अगर देख लिया?”

नारा ने उसकी आँखों में देखा।

“तो फिर आपको पता चल जाएगा कि गाँव वाले रात में दरवाजे क्यों बंद करते हैं।”

अर्जुन पुल तक पहुँचा।

पुल बहुत पुराना था।

लकड़ी की पट्टियाँ जगह-जगह टूट चुकी थीं।

नीचे नदी दिखाई नहीं दे रही थी।

सिर्फ धुंध।

उसने सर्वे उपकरण निकाला।

तभी…

टन।

एक घंटी बजी।

अर्जुन रुक गया।

टन।

फिर आवाज आई।

जैसे नदी के नीचे से आ रही हो।

अर्जुन ने पीछे मुड़ने की कोशिश की।

लेकिन उसे नारा की बात याद आई।

उसने आँखें बंद कर लीं।

घंटी तीसरी बार बजी।

और उसके बाद…

किसी लड़की के रोने की आवाज आई।

“मुझे घर जाना है…”

अर्जुन का दिल जोर से धड़कने लगा।

आवाज बिल्कुल पास थी।

फिर किसी ने उसके पीछे आकर कहा—

“तुमने पीछे क्यों नहीं देखा?”

अर्जुन ने आँखें बंद रखीं।

“कौन हो?”

कोई उत्तर नहीं।

फिर उसके कान के पास बहुत धीमी आवाज आई—

“मैं वही हूँ जिसे तुम खोज रहे हो।”

अर्जुन ने आँखें खोल दीं।

पुल खाली था।

लेकिन उसकी सर्वे मशीन जमीन पर पड़ी थी।

और उसके ऊपर लाल मिट्टी से एक निशान बना था।

तीन उँगलियों जैसा।

वह तुरंत गाँव लौट आया।

नारा उसका इंतजार कर रही थी।

उसने मशीन देखी।

उसका चेहरा बदल गया।

“आपने उसे देख लिया?”

“नहीं।”

“तो उसने आपको छुआ है।”

अर्जुन ने अपनी कलाई देखी।

वहाँ तीन लाल निशान थे।

नारा ने कहा—

“अब हमें आपको सच बताना पड़ेगा।”

शाम होते ही गाँव के सभी बुजुर्ग एक घर में इकट्ठा हुए।

दरवाजा बंद किया गया।

खिड़कियों पर कपड़ा डाल दिया गया।

बीच में मिट्टी का दीपक जलाया गया।

मुखिया ने कहना शुरू किया—

“लुमथांग हमेशा से ऐसा गाँव नहीं था।”

बहुत साल पहले यहाँ एक और गाँव था।

उसका नाम था लुम-राई

वहाँ जंगल के बीच एक पत्थर का मंदिर था।

मंदिर में कोई मूर्ति नहीं थी।

सिर्फ एक पत्थर था।

उस पत्थर को गाँव वाले सोई-मारा कहते थे।

कहा जाता था कि वह जंगल की रखवाली करता है।

लेकिन एक साल भयंकर अकाल पड़ा।

लोगों ने मंदिर का पत्थर हटाकर उसके नीचे छिपा पानी खोजने की कोशिश की।

पत्थर हटते ही जमीन के नीचे से आवाज आई।

एक बच्चे की आवाज।

“मुझे बाहर निकालो।”

गाँव वालों ने जमीन खोदी।

उन्हें नीचे एक सुरंग मिली।

सुरंग में दर्जनों लकड़ी के मुखौटे रखे थे।

हर मुखौटे पर किसी इंसान का नाम लिखा था।

गाँव के बुजुर्गों ने कहा कि उन्हें वहीं छोड़ दो।

लेकिन एक आदमी ने एक मुखौटा उठा लिया।

उसका नाम था—

नारा।

अर्जुन ने चौंककर नारा की तरफ देखा।

नारा चुप बैठी थी।

मुखिया ने कहा—

“उसके बाद गाँव में लोग गायब होने लगे।”

पहले एक।

फिर दो।

फिर पूरा परिवार।

हर बार गायब होने से पहले धुंध आती थी।

और धुंध में किसी का नाम सुनाई देता था।

लोगों ने सुरंग बंद कर दी।

मंदिर को पत्थरों से ढक दिया।

लेकिन कुछ साल बाद फिर आवाजें आने लगीं।

तब गाँव वालों ने एक नियम बनाया।

धुंध में किसी की आवाज का जवाब नहीं देना।

किसी पुराने पुल पर रात में नहीं जाना।

और सबसे जरूरी—

सोई-मारा का नाम कभी नहीं लेना।

अर्जुन ने पूछा—

“लेकिन मेरा नाम उसे कैसे पता?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

नारा ने धीरे से कहा—

“क्योंकि तुमने उसका रास्ता खोल दिया।”

अर्जुन ने पूछा—

“मैंने?”

मुखिया ने सिर हिलाया।

“तुम्हारी सर्वे मशीन ने पुराने पत्थर को रिकॉर्ड किया है।”

“तो?”

“अब वह पत्थर जाग गया है।”

तभी बाहर से घंटी बजी।

टन।

सभी लोग जम गए।

फिर दूसरी बार।

टन।

मुखिया ने दीपक बुझा दिया।

तीसरी बार घंटी बजी।

इस बार घर की लकड़ी की दीवार काँपने लगी।

फिर बाहर से नारा की आवाज आई—

“दरवाजा खोलो।”

अर्जुन ने नारा की तरफ देखा।

वह उसके सामने बैठी थी।

उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

बाहर से फिर आवाज आई—

“नारा…”

नारा की आँखों से आँसू निकल आए।

उसने अर्जुन से कहा—

“अब वह मेरा नाम नहीं बुला रही।”

अर्जुन ने पूछा—

“तो किसका?”

बाहर से आवाज आई—

“अर्जुन…”

और इस बार…

आवाज उसकी अपनी थी।

नारा ने धीरे से कहा—

“भागना पड़ेगा।”

मुखिया ने पुराने घर की फर्श के नीचे से एक लोहे का डिब्बा निकाला।

उसमें एक नक्शा था।

नक्शे पर गाँव के नीचे बनी सुरंगें दिखाई दे रही थीं।

और सबसे नीचे एक लाल निशान था।

मुखिया ने कहा—

“अगर सूरज निकलने से पहले वह पत्थर वापस नहीं ढका गया…”

उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा।

“…तो लुमथांग भी लुम-राई जैसा हो जाएगा।”

अर्जुन ने पूछा—

“और अगर नहीं किया?”

बाहर से अचानक सैकड़ों आवाजें एक साथ आईं।

पुरुष।

औरतें।

बच्चे।

सब एक साथ उसका नाम पुकार रहे थे।

“अर्जुन…”

“अर्जुन…”

“अर्जुन…”

फिर पूरी रात में पहली बार…

नारा ने उसका हाथ पकड़कर कहा—

“अब आपको हमारे साथ नीचे जाना होगा।”

अर्जुन ने पूछा—

“कहाँ?”

नारा ने खिड़की के बाहर देखा।

धुंध पूरे गाँव को ढक चुकी थी।

उसने फुसफुसाकर कहा—

“उस जगह…”

“…जहाँ से कोई वापस नहीं आया।”

रात के करीब बारह बज चुके थे।

लुमथांग का पूरा गाँव धुंध में डूब चुका था।

लकड़ी के घरों की छतें दिखाई नहीं दे रही थीं।

पेड़ों के सिरे गायब थे।

यहाँ तक कि सामने खड़ा आदमी भी कुछ कदम दूर जाकर परछाईं जैसा दिखाई देता था।

मुखिया ने मिट्टी का दीपक उठाया।

“अब हमें नीचे जाना होगा।”

अर्जुन ने पूछा—

“अगर नीचे जाना इतना खतरनाक है तो ऊपर रहकर सुबह का इंतजार क्यों नहीं कर सकते?”

मुखिया ने सिर हिलाया।

“सुबह नहीं होगी।”

अर्जुन ने उनकी तरफ देखा।

“क्या मतलब?”

“अगर आज रात सोई-मारा जाग गई है, तो सूरज निकलने से पहले उसे वापस सुलाना होगा।”

नारा ने पुराने नक्शे को मोड़ा।

“रास्ता कहाँ से है?”

मुखिया ने फर्श की तरफ इशारा किया।

घर के बीच में लकड़ी की एक पट्टी थी।

उन्होंने उसे हटाया।

नीचे अँधेरी सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

अर्जुन ने पूछा—

“यह रास्ता आपके घर में क्यों है?”

मुखिया ने कहा—

“क्योंकि मेरा घर पहले मंदिर था।”

अर्जुन कुछ क्षण चुप रहा।

नारा ने दीपक नीचे किया।

सीढ़ियाँ बहुत पुरानी थीं।

दीवारों पर काई लगी थी।

नीचे से ठंडी हवा आ रही थी।

लेकिन हवा के साथ कुछ और भी था।

एक गंध।

गीली मिट्टी की।

और धुएँ की।

तीनों नीचे उतरने लगे।

पहली सीढ़ी।

दूसरी।

तीसरी।

फिर सीढ़ियाँ खत्म हो गईं।

सामने पत्थर की लंबी सुरंग थी।

दीवारों पर छोटे-छोटे सफेद निशान बने थे।

नारा ने कहा—

“इन निशानों को मत छूना।”

“क्यों?”

“ये उन लोगों के नाम हैं जो वापस नहीं आए।”

अर्जुन ने टॉर्च दीवार पर डाली।

उसे दर्जनों नाम दिखाई दिए।

कुछ नाम पुराने थे।

कुछ बहुत नए।

एक नाम देखकर वह रुक गया।

मोहन।

उसका सहकर्मी।

वही आदमी जो दो दिन पहले सर्वे टीम के साथ गाँव आया था।

अर्जुन का दिल बैठ गया।

“मोहन यहाँ कैसे?”

मुखिया ने उसकी तरफ देखा।

“कौन मोहन?”

“मेरी टीम का आदमी।”

“वह तो गाँव से वापस चला गया था।”

अर्जुन ने काँपती आवाज में कहा—

“नहीं।”

“क्या?”

“वह वापस नहीं गया।”

नारा ने दीवार को देखा।

उसकी आँखें भर आईं।

“तो वह यहीं है।”

सुरंग में अचानक किसी के दौड़ने की आवाज आई।

धड़-धड़-धड़।

तीनों रुक गए।

आवाज सामने से आ रही थी।

फिर किसी ने चिल्लाया—

“अर्जुन!”

अर्जुन आगे बढ़ने लगा।

नारा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मत जाओ।”

“वह मोहन है!”

“नहीं।”

आवाज फिर आई।

“अर्जुन!”

इस बार बहुत साफ।

“मैं यहाँ हूँ!”

अर्जुन ने टॉर्च आगे की।

सुरंग खाली थी।

लेकिन जमीन पर एक मोबाइल पड़ा था।

मोहन का मोबाइल।

अर्जुन ने उसे उठा लिया।

स्क्रीन टूटी हुई थी।

फिर भी उसमें एक वीडियो चल रहा था।

वीडियो में मोहन दिखाई दे रहा था।

वह घबराया हुआ था।

उसने कैमरे की तरफ देखकर कहा—

“अगर किसी को यह वीडियो मिले तो…”

पीछे से कोई आवाज आई।

मोहन ने कैमरा घुमाया।

कुछ दिखाई नहीं दिया।

फिर उसने कहा—

“यहाँ कोई है।”

वीडियो में अचानक धुंध भर गई।

और आखिरी फ्रेम में एक लड़की दिखाई दी।

उसका चेहरा धुंध में छिपा था।

उसने कैमरे के पास आकर कहा—

“तुम लोग हमेशा देर से आते हो।”

वीडियो बंद हो गया।

अर्जुन ने मोबाइल नीचे कर लिया।

“यह लड़की कौन थी?”

नारा ने कहा—

“सोई-मारा।”

मुखिया ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

नारा ने उनकी तरफ देखा।

“तो कौन?”

मुखिया ने कहा—

“पहले लोग समझते थे कि वह जंगल की आत्मा है।”

उन्होंने कुछ देर चुप रहकर कहा—

“लेकिन असली कहानी इससे भी खराब है।”

वे आगे बढ़े।

कुछ दूर जाकर सुरंग चौड़ी हो गई।

सामने लकड़ी के दर्जनों मुखौटे लटके थे।

हर मुखौटे पर एक चेहरा बना था।

कुछ हँस रहे थे।

कुछ रो रहे थे।

कुछ के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

अर्जुन ने पूछा—

“इनका क्या मतलब है?”

मुखिया ने कहा—

“ये गाँव के पुराने लोग हैं।”

“मरे हुए?”

“नहीं।”

“तो?”

“जो अपनी आवाज खो चुके हैं।”

अर्जुन ने पूछा—

“आवाज कैसे खोई?”

मुखिया ने कहा—

“सोई-मारा उनका नाम लेती है।”

“फिर?”

“वे जवाब देते हैं।”

नारा ने आगे कहा—

“और जिस दिन कोई उसकी आवाज का जवाब देता है…”

वह रुक गई।

“उसका नाम मुखौटे पर लिखा जाता है।”

अर्जुन ने अपने हाथ की ओर देखा।

उसकी कलाई पर तीन लाल निशान अब और गहरे हो चुके थे।

नारा ने उन्हें देखा।

“बहुत देर नहीं है।”

“किस चीज की?”

“तुम्हारा नाम भी लिखा जाएगा।”

तभी पीछे से आवाज आई—

“अर्जुन…”

इस बार आवाज बहुत नरम थी।

जैसे कोई माँ अपने बच्चे को बुला रही हो।

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“मेरी माँ की आवाज है।”

मुखिया ने कहा—

“मत सुनो।”

आवाज फिर आई।

“बेटा…”

अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।

उसकी माँ की मृत्यु को दस साल हो चुके थे।

फिर भी वह आवाज बिल्कुल वैसी थी।

“अर्जुन…”

“घर चलो।”

अर्जुन ने एक कदम पीछे लिया।

नारा उसके सामने आ गई।

“वह आपकी माँ नहीं है।”

आवाज अचानक बदल गई।

अब उसमें गुस्सा था।

“तुमने मेरा नाम क्यों नहीं लिया?”

नारा ने जवाब नहीं दिया।

मुखिया ने मिट्टी का दीपक ऊपर उठाया।

अचानक सुरंग के सारे मुखौटे एक साथ हिलने लगे।

टक।

टक।

टक।

टक।

उनमें से एक मुखौटा जमीन पर गिरा।

उस पर लिखा था—

नारा।

नारा पीछे हट गई।

उसका चेहरा बदल गया।

“यह नहीं हो सकता।”

मुखिया ने कहा—

“तुम्हें पहले से पता था।”

“क्या?”

“कि तुम्हारा नाम उस पत्थर पर लिखा है।”

नारा ने कुछ नहीं कहा।

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम मुझे गाँव में क्यों लेकर आईं?”

नारा की आँखों में आँसू आ गए।

“क्योंकि मुझे लगा था कि आप उसे रोक सकते हैं।”

“मैं?”

“हाँ।”

“क्यों?”

नारा ने धीरे से कहा—

“क्योंकि आप उस आदमी के वंशज हैं जिसने पहली बार पत्थर खोला था।”

अर्जुन स्तब्ध रह गया।

“मेरे पूर्वज?”

मुखिया ने सिर हिलाया।

“तुम्हारे दादा नहीं।”

उन्होंने कहा—

“तुम्हारे परदादा।”

अर्जुन को याद आया कि उसके घर में एक पुरानी तस्वीर थी।

एक पहाड़ी गाँव की।

उस तस्वीर में कुछ लोग खड़े थे।

और पीछे एक पत्थर का मंदिर था।

उसने कभी उस तस्वीर पर ध्यान नहीं दिया था।

अब उसे समझ आया।

उसके परिवार का इस गाँव से रिश्ता था।

बहुत पुराना रिश्ता।

वे आगे बढ़े।

सुरंग अचानक एक विशाल कमरे में खुली।

कमरे के बीच में एक काला पत्थर रखा था।

पत्थर के चारों तरफ पानी था।

पानी स्थिर था।

जैसे शीशा।

और पत्थर पर सैकड़ों नाम खुदे थे।

नारा आगे बढ़ी।

“यही है।”

अर्जुन ने पूछा—

“इसे बंद कैसे करेंगे?”

मुखिया ने कहा—

“तीन चीजें चाहिए।”

“क्या?”

“जिसने दरवाजा खोला था उसका रक्त।”

“दूसरा?”

“जिसने पहली बार आवाज का जवाब दिया था उसका नाम।”

“और तीसरा?”

मुखिया ने पत्थर की ओर देखा।

“जिसे आखिरी बार चुना गया है, उसका सच।”

अर्जुन ने अपनी कलाई देखी।

“मैं तीसरा हूँ?”

मुखिया ने सिर हिलाया।

नारा बोली—

“और पहला भी।”

अर्जुन समझ नहीं पाया।

“कैसे?”

“आपके खून में उस आदमी की विरासत है।”

“और मेरा सच?”

नारा ने कहा—

“आपको खुद बोलना होगा।”

तभी पत्थर के नीचे से आवाज आई।

“अर्जुन…”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

सोई-मारा जाग चुकी थी।

कमरे की दीवारों पर धुंध फैलने लगी।

पानी में लहरें उठीं।

काले पत्थर के पीछे एक आकृति दिखाई दी।

एक लड़की।

लंबे बाल।

सफेद चेहरा।

आँखें पूरी तरह काली।

वह धीरे-धीरे पानी के ऊपर चलती हुई आगे आई।

मुखिया ने सिर झुका लिया।

नारा पीछे हट गई।

अर्जुन अकेला खड़ा रहा।

लड़की ने कहा—

“तुम्हारे लोग मुझे छोड़ गए।”

अर्जुन ने कहा—

“मैंने नहीं।”

“तुम उन्हीं के खून से हो।”

“लेकिन उनके अपराध मेरे नहीं हैं।”

लड़की मुस्कराई।

“फिर अपना सच बोलो।”

अर्जुन ने पत्थर की तरफ देखा।

“मुझे डर लगता है।”

कमरे में हल्की गूँज हुई।

“मुझे इस गाँव से डर लगता है।”

पत्थर पर एक दरार पड़ी।

“मुझे डर है कि मैं अपने लोगों को नहीं बचा पाऊँगा।”

दूसरी दरार।

“मुझे डर है कि मैं अपनी माँ की मौत को कभी स्वीकार नहीं कर पाया।”

तीसरी दरार।

सोई-मारा उसके सामने आ गई।

उसने कहा—

“और सबसे बड़ा डर?”

अर्जुन की आँखों में आँसू थे।

“कि अगर मैं किसी को बचाने के लिए खुद को खो दूँ…”

वह कुछ पल रुका।

“…तो शायद कोई मुझे याद भी नहीं रखेगा।”

सोई-मारा का चेहरा बदल गया।

उसकी आँखों की काली परत धीरे-धीरे गायब होने लगी।

अब वह एक सामान्य लड़की जैसी दिख रही थी।

उसने पूछा—

“तुम मेरा नाम जानते हो?”

अर्जुन ने कहा—

“नहीं।”

“फिर भी तुम मुझे मुक्त करना चाहते हो?”

“हाँ।”

लड़की ने पहली बार मुस्कराकर कहा—

“मेरा नाम सोई-मारा नहीं था।”

नारा ने पूछा—

“तो क्या था?”

लड़की ने उत्तर दिया—

“मेरा नाम था लैना।”

कमरे की हवा अचानक बदल गई।

मुखिया घुटनों पर बैठ गए।

“लैना…”

लड़की ने उन्हें देखा।

“अब याद आया?”

मुखिया रोने लगे।

“मेरी दादी तुम्हारे बारे में बताती थीं।”

लैना ने कहा—

“मैं जंगल की आत्मा नहीं थी।”

अर्जुन ने पूछा—

“फिर क्या हुआ?”

लैना ने पत्थर की तरफ देखा।

“मैं उस गाँव की लड़की थी जिसे तुम्हारे लोगों ने बलि देने की कोशिश की।”

अर्जुन चौंक गया।

“बलि?”

“अकाल के समय उन्होंने सोचा कि जंगल को इंसान चाहिए।”

उसने अपनी हथेली पत्थर पर रखी।

“उन्होंने मुझे चुना।”

“लेकिन तुम बच गईं?”

“नहीं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

“मैं मरी।”

नारा ने आँखें बंद कर लीं।

लैना ने कहा—

“लेकिन मेरा डर नहीं मरा।”

“मेरा नाम पत्थर में बंद कर दिया गया।”

“मेरी आवाज सुरंगों में बंद कर दी गई।”

“और तब से जो भी मेरा नाम सुनता है…”

उसने अर्जुन की ओर देखा।

“…वह मुझे अपने डर में देखता है।”

अर्जुन ने पूछा—

“तो तुम लोगों को क्यों बुलाती हो?”

लैना बोली—

“क्योंकि मैं अकेली थी।”

यह सुनकर पहली बार अर्जुन को उस भयावह चीज़ में भी दुख दिखाई दिया।

लैना ने कहा—

“मैंने कभी गाँव को खत्म नहीं करना चाहा।”

“मैं चाहती थी कि कोई एक इंसान मेरी बात सुने।”

अर्जुन ने कहा—

“मैं सुन रहा हूँ।”

लैना की आँखों में आँसू आ गए।

“तो मेरा नाम पत्थर से मिटा दो।”

अर्जुन पत्थर के पास गया।

उसने हाथ रखा।

पत्थर गर्म था।

उसकी कलाई से खून की एक बूंद निकली।

बूंद पत्थर पर गिरी।

सैकड़ों नाम चमक उठे।

फिर धीरे-धीरे एक-एक करके गायब होने लगे।

लैना ने आँखें बंद कर लीं।

नारा ने लाल धागा निकाला।

“इसे बाँधना होगा।”

अर्जुन ने पूछा—

“किसे?”

“पत्थर को।”

उन्होंने लाल धागा पत्थर के चारों तरफ बाँधा।

मुखिया ने पुरानी भाषा में कुछ शब्द बोले।

अचानक पूरा कमरा काँपने लगा।

सुरंग की छत से पत्थर गिरने लगे।

पानी तेजी से बढ़ने लगा।

लैना पीछे हट गई।

उसका चेहरा फिर बदलने लगा।

वह चिल्लाई—

“जल्दी!”

अर्जुन ने पत्थर पर आखिरी नाम देखा।

लैना।

उसने उँगली से नाम मिटाना शुरू किया।

नाम मिटते ही एक तेज चीख पूरे सुरंग में गूँजी।

दीवारों पर लगे सभी मुखौटे टूटने लगे।

एक।

दो।

दस।

फिर दर्जनों।

हर मुखौटे के टूटने के साथ एक आवाज निकलती।

“धन्यवाद।”

“हमें जाने दो।”

“बहुत देर हो गई।”

“घर…”

फिर आखिरी मुखौटा टूटा।

वह नारा का था।

नारा जमीन पर गिर पड़ी।

अर्जुन ने उसे उठाया।

“नारा!”

उसने आँखें खोलीं।

और पहली बार उसके चेहरे पर शांति थी।

लैना सामने खड़ी थी।

अब वह बहुत छोटी बच्ची जैसी दिखाई दे रही थी।

उसने कहा—

“अब मुझे घर जाना है।”

अर्जुन ने पूछा—

“कहाँ?”

उसने ऊपर की ओर देखा।

“जहाँ धुंध खत्म होती है।”

फिर उसका शरीर धुंध में बदलने लगा।

अर्जुन ने कहा—

“लैना!”

वह मुस्कराई।

“अब मेरा नाम मत भूलना।”

और गायब हो गई।

उसी क्षण काला पत्थर बीच से टूट गया।

सुरंग में पानी भरने लगा।

मुखिया चिल्लाए—

“भागो!”

तीनों दौड़ पड़े।

पीछे से पूरी सुरंग टूटती जा रही थी।

वे सीढ़ियों तक पहुँचे।

ऊपर धुंध अब पहले जैसी नहीं थी।

वह हल्की हो रही थी।

अर्जुन ने पीछे देखा।

सुरंग के आखिरी हिस्से में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

लैना।

उसने हाथ हिलाया।

फिर पत्थरों के नीचे सब कुछ बंद हो गया।

सुबह जब गाँव वालों ने देखा तो लुमथांग पहली बार साफ दिखाई दे रहा था।

आसमान नीला था।

पहाड़ साफ थे।

नदी का पानी चमक रहा था।

पुराने पुल पर जमा धुंध गायब थी।

गाँव के नीचे से आने वाली घंटी की आवाज भी बंद हो चुकी थी।

लेकिन सबसे बड़ा बदलाव जंगल में था।

जहाँ पुराना मंदिर था वहाँ अब सिर्फ एक खुला मैदान था।

बीच में एक छोटा सफेद पत्थर पड़ा था।

उस पर किसी ने एक नाम खुदा हुआ था।

लैना।

मुखिया ने गाँव वालों से कहा—

“इसे मत मिटाना।”

“क्यों?”

“क्योंकि यह पहली बार है जब उसका नाम डर के साथ नहीं…”

“…सम्मान के साथ लिखा गया है।”

अर्जुन ने गाँव छोड़ने से पहले पुराने पुल पर जाकर आखिरी बार नदी को देखा।

पानी में उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।

साफ।

शांत।

फिर नदी में हल्की-सी लहर उठी।

कुछ क्षण के लिए उसे पानी में एक छोटी बच्ची दिखाई दी।

वह मुस्करा रही थी।

अर्जुन ने हाथ जोड़ दिए।

लहर खत्म हुई।

चेहरा गायब हो गया।

वह वापस गाँव की तरफ चला।

नारा उसके साथ थी।

मुखिया पीछे आ रहे थे।

तीनों कुछ दूर चले।

फिर नारा अचानक रुक गई।

अर्जुन ने पूछा—

“क्या हुआ?”

नारा ने पीछे जंगल की तरफ देखा।

“कुछ नहीं।”

“तुमने कुछ सुना?”

नारा ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

वे आगे बढ़ गए।

लेकिन जंगल की गहराई में…

बहुत दूर…

एक पुरानी लकड़ी की घंटी धीरे से हिली।

टन…

फिर दूसरी बार।

टन…

और तीसरी बार।

टन…

लेकिन इस बार उस आवाज में डर नहीं था।

वह किसी विदाई जैसी थी।

उसके बाद लुमथांग में कभी किसी ने धुंध के अंदर अपना नाम नहीं सुना।

पुराना पुल भी कुछ वर्षों बाद हटा दिया गया।

सुरंग का रास्ता हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

और गाँव की नई पीढ़ी को एक कहानी सुनाई जाने लगी।

एक ऐसी लड़की की कहानी…

जिसे कभी जंगल की आत्मा समझ लिया गया था।

एक ऐसी लड़की की…

जो सिर्फ चाहती थी कि कोई उसकी बात सुन ले।

कहानी के अंत में गाँव के बुजुर्ग हमेशा एक ही बात कहते—

“हर डरावनी आवाज भूत की नहीं होती।”

“कभी-कभी वह किसी भूले हुए इंसान की आखिरी पुकार होती है।”

और अगर कभी किसी बरसाती रात में उत्तर-पूर्व की किसी पहाड़ी सड़क पर आपको घनी धुंध मिल जाए…

और उस धुंध के भीतर से कोई बहुत धीमी आवाज आपका नाम पुकारे…

तो जवाब देने से पहले एक बार जरूर सोचना।

क्योंकि हो सकता है वह आवाज किसी बुरी आत्मा की न हो।

हो सकता है कोई बहुत दूर…

बहुत पुराने समय से…

सिर्फ यह इंतजार कर रहा हो कि…

इस बार कोई उसकी कहानी सुन ले।

समाप्त

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top