उत्तर की पहाड़ियों में एक ऐसा गाँव था, जहाँ जाने के लिए आखिरी बस से उतरने के बाद भी लगभग चार घंटे पैदल चलना पड़ता था।
गाँव का नाम था देवकुंड।
नक्शे पर उसका नाम बहुत छोटे अक्षरों में लिखा था।
इतना छोटा कि पहली नजर में लगता था जैसे किसी ने पेंसिल से बस एक निशान बना दिया हो।
गाँव के चारों तरफ घना जंगल था।
चीड़ के लंबे पेड़ दिन में भी इतने घने लगते थे कि उनके नीचे धूप जमीन तक पहुँचने से पहले ही बूढ़ी हो जाती थी।
बरसात के दिनों में तो पूरा इलाका धुंध में खो जाता था।
लेकिन देवकुंड की सबसे अजीब बात जंगल नहीं था।
अजीब बात थी गाँव के नीचे बहने वाली एक पतली नदी।
गाँव वाले उसे काली धार कहते थे।
नाम सुनकर कोई भी सोच सकता था कि पानी काला होगा।
लेकिन ऐसा नहीं था।
दिन में उसका पानी बिल्कुल साफ दिखाई देता था।
इतना साफ कि नीचे पड़े छोटे-छोटे पत्थर भी दिखाई देते थे।
पर रात होते ही उस पानी का रंग बदल जाता था।
वह काला हो जाता था।
और गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि अमावस की रात उस पानी में अपना चेहरा नहीं देखना चाहिए।
क्योंकि नदी आपका चेहरा नहीं दिखाती।
वह दिखाती है कि आपकी मौत के बाद आपको कौन देखेगा।
गाँव में यह बात बच्चों को डराने के लिए नहीं कही जाती थी।
बड़ों को भी यह बात उतनी ही सच लगती थी।
देवकुंड में शाम के बाद कोई नदी की तरफ नहीं जाता था।
यहाँ तक कि मवेशियों को भी सूरज ढलने से पहले घर लौटा लिया जाता था।
गाँव में करीब साठ घर थे।
अधिकतर घर पत्थर और मिट्टी से बने थे।
कुछ घरों की छत पर काली स्लेट लगी थी।
कुछ के ऊपर पुरानी टीन की चादरें थीं।
बरसात में टीन पर गिरती बूंदों की आवाज इतनी तेज होती थी कि लोग एक-दूसरे की आवाज नहीं सुन पाते थे।
फिर भी देवकुंड में एक आवाज ऐसी थी जिसे हर कोई सुन लेता था।
मंदिर की घंटी।
गाँव के सबसे ऊँचे हिस्से पर एक छोटा-सा मंदिर था।
मंदिर में कोई बड़ी मूर्ति नहीं थी।
बस पत्थर की एक काली शिला थी।
लोग उसे देवता कहते थे।
किस देवता की शिला थी, यह कोई ठीक से नहीं जानता था।
कहा जाता था कि मंदिर गाँव से भी पुराना है।
बहुत पुराना।
इतना पुराना कि जब देवकुंड में पहला घर बना था, तब भी मंदिर वहाँ था।
मंदिर की घंटी पीतल की थी।
बहुत भारी।
दो आदमी मिलकर भी उसे मुश्किल से उठा सकते थे।
लेकिन अजीब बात यह थी कि कभी-कभी वह अपने आप बजती थी।
बिना हवा के।
बिना किसी आदमी के।
और हर बार जब घंटी आधी रात के बाद बजती थी, अगले दिन गाँव में कुछ न कुछ जरूर होता था।
कभी कोई मवेशी गायब हो जाता।
कभी जंगल में किसी की चीज मिलती।
कभी किसी घर की दीवार पर गीली हथेली के निशान दिखाई देते।
और कभी-कभी…
कोई इंसान गायब हो जाता।
गाँव के बुजुर्ग इन घटनाओं पर चर्चा नहीं करते थे।
वे सिर्फ इतना कहते थे—
“घंटी अगर रात में बजे तो दरवाजा मत खोलना।”
बस।
इतना ही।
देवकुंड में रहने वाला सत्रह साल का रघु इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।
उसे लगता था कि बूढ़े लोग हर चीज में भूत खोज लेते हैं।
रघु के पिता जंगल विभाग में चौकीदार थे।
उसकी माँ गाँव में ही रहती थी।
रघु पढ़ाई में बहुत अच्छा नहीं था।
लेकिन जंगल के रास्ते उसे अच्छी तरह मालूम थे।
वह कई बार अकेला कई किलोमीटर दूर तक चला जाता था।
उसे डर नहीं लगता था।
या कम से कम वह ऐसा दिखाता था।
एक शाम अगस्त के महीने में रघु अपने दोस्त गोपाल के साथ खेत से लौट रहा था।
आसमान पर बादल बहुत नीचे झुक आए थे।
हवा में बारिश की गंध थी।
गोपाल ने अचानक कदम रोक दिए।
“क्या हुआ?”
रघु ने पूछा।
गोपाल चुपचाप जंगल की तरफ देखने लगा।
“सुना?”
“क्या?”
दोनों ने कुछ देर ध्यान से सुना।
पहले कुछ नहीं था।
फिर बहुत दूर से आवाज आई।
छन…
छन…
छन…
जैसे किसी के पैरों में पायल हो।
रघु हँस पड़ा।
“लोमड़ी होगी।”
गोपाल ने सिर हिलाया।
“लोमड़ी पायल पहनकर नहीं चलती।”
रघु ने उसे धक्का दिया।
“चल घर।”
दोनों आगे बढ़ गए।
लेकिन पायल की आवाज पीछे से आती रही।
छन…
छन…
छन…
कुछ देर बाद आवाज बिल्कुल उनके पीछे आ गई।
गोपाल ने पीछे देखने की कोशिश की।
रघु ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत देख।”
गोपाल ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
रघु खुद नहीं जानता था कि उसने ऐसा क्यों कहा।
बस अचानक उसे अपनी दादी की बात याद आ गई।
दादी कहा करती थी—
“जंगल में अगर कोई तुम्हारे पीछे चले और उसके कदम सुनाई न दें, तो पीछे मत देखना।”
रघु ने कभी उस बात को गंभीरता से नहीं लिया था।
लेकिन उस शाम उसे पहली बार डर लगा।
दोनों तेज चलने लगे।
पायल की आवाज भी तेज हो गई।
छन-छन-छन-छन…
फिर अचानक बंद।
दोनों रुक गए।
पीछे मुड़कर देखा।
पगडंडी खाली थी।
गोपाल ने राहत की साँस ली।
“देखा? कुछ नहीं था।”
रघु ने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि उसे जमीन पर कुछ दिखाई दिया था।
गीली मिट्टी में पैरों के निशान।
नंगे पैरों के।
एक के बाद एक।
लेकिन निशान जंगल से उनकी तरफ नहीं आ रहे थे।
वे उनके पीछे से शुरू होकर जंगल की तरफ जा रहे थे।
जैसे कोई उनके साथ-साथ चल रहा था।
और फिर उनके पीछे से वापस जंगल में चला गया हो।
गोपाल ने निशान देखे।
उसका चेहरा बदल गया।
“ये किसके हैं?”
रघु ने जवाब नहीं दिया।
दोनों तेजी से गाँव की ओर चल पड़े।
उस दिन पहली बार रघु ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
गाँव पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो चुका था।
हर घर में चूल्हे जल चुके थे।
दूर मंदिर में एक दीपक टिमटिमा रहा था।
रघु घर में घुसा।
उसकी माँ ने पूछा—
“इतनी देर क्यों?”
“जंगल में रुक गए थे।”
माँ ने उसकी तरफ ध्यान से देखा।
“तुम दोनों डर गए थे?”
रघु चौंक गया।
“आपको कैसे पता?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस दरवाजा बंद कर दिया।
फिर कुंडी लगाई।
एक बार।
दो बार।
रघु ने पूछा—
“माँ, आज क्या हुआ है?”
माँ ने धीरे से कहा—
“कुछ नहीं।”
“फिर दरवाजा दो बार क्यों बंद किया?”
माँ कुछ सेकंड चुप रही।
फिर बोली—
“आज अमावस है।”
रघु ने खिड़की से बाहर देखा।
आसमान बादलों से ढका था।
चाँद दिखाई नहीं दे रहा था।
तभी…
मंदिर की घंटी बजी।
टन…
रघु की माँ के हाथ से कटोरी गिर गई।
टन…
इस बार आवाज ज्यादा तेज थी।
रघु ने माँ की तरफ देखा।
माँ का चेहरा पीला पड़ चुका था।
तीसरी बार घंटी बजी।
टन…
फिर पूरा गाँव शांत हो गया।
कुत्तों का भौंकना बंद।
झींगुरों की आवाज बंद।
हवा बंद।
ऐसा लगा जैसे पूरा जंगल साँस रोककर खड़ा हो।
रघु ने धीरे से पूछा—
“माँ…”
माँ ने उँगली होंठों पर रख दी।
“चुप।”
कुछ सेकंड बाद बाहर से आवाज आई।
“रघु…”
वह आवाज उसकी माँ की थी।
रघु ने माँ की तरफ देखा।
माँ उसके सामने ही खड़ी थी।
दोनों ने एक साथ दरवाजे की तरफ देखा।
बाहर से फिर आवाज आई।
“रघु…”
इस बार आवाज बिल्कुल उसके कान के पास जैसी लगी।
माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।
ठक।
दोनों चुप रहे।
ठक।
रघु की साँस रुक गई।
ठक।
फिर बाहर से आवाज आई—
“दरवाजा खोल बेटा।”
रघु की माँ की आँखों में आँसू आ गए।
वह बहुत धीमे से बोली—
“ये मैं नहीं हूँ।”
रघु के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
बाहर फिर वही आवाज आई।
लेकिन इस बार वह आवाज उसकी माँ की नहीं थी।
वह रघु की अपनी आवाज थी।
“माँ… दरवाजा खोलो।”
कमरे में रखा दीया अचानक बुझ गया।
और उसी क्षण खिड़की के बाहर किसी ने धीरे से अपना चेहरा काँच से लगा दिया।
रघु ने उसे देखा।
चेहरा उल्टा था।
आँखें खुली थीं।
और होंठों पर मुस्कान थी।
वह मुस्कान धीरे-धीरे फैलती गई।
फिर काँच पर पाँच गीली उँगलियाँ दिखाई दीं।
रघु पीछे हट गया।
बाहर खड़ा चेहरा गायब हो गया।
लेकिन गीली हथेली के निशान खिड़की पर बने रहे।
सुबह तक।
अगली सुबह पूरे गाँव में यही बात थी।
हर घर की किसी न किसी खिड़की पर गीली हथेली के निशान मिले थे।
किसी के बाहर।
किसी के अंदर।
और रघु के घर में…
हथेली का निशान दीवार पर था।
उस दीवार के पीछे कोई रास्ता नहीं था।
फिर भी निशान ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने दीवार के अंदर से हाथ बाहर निकाला हो।
गाँव के सबसे बूढ़े आदमी बिसनू काका को बुलाया गया।
उन्होंने दीवार देखी।
बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।
फिर उन्होंने रघु से पूछा—
“तुम कल जंगल गए थे?”
रघु ने सिर हिलाया।
“काली धार के पास तक?”
“हाँ।”
काका की आँखें सिकुड़ गईं।
“वहाँ तुम्हें क्या मिला?”
रघु चुप रहा।
गोपाल ने आगे बढ़कर कहा—
“हमें पैरों के निशान मिले थे।”
बिसनू काका ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“किसके?”
“नंगे पैर।”
काका ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ देर बाद बोले—
“अब वह वापस आ गई है।”
रघु ने पूछा—
“कौन?”
काका ने जवाब नहीं दिया।
उन्होंने बस मंदिर की तरफ देखा।
फिर कहा—
“आज रात कोई भी घर से बाहर नहीं निकलेगा।”
“क्यों?”
काका ने रघु की तरफ देखा।
“क्योंकि आज पहली रात है।”
रघु को समझ नहीं आया।
“पहली रात किस चीज की?”
बिसनू काका ने बहुत धीमे से कहा—
“जिस कहानी को तुम्हारे दादा लोगों ने खत्म समझ लिया था…”
“…वह आज से फिर शुरू हुई है।”
उस शाम गाँव में किसी ने चूल्हा नहीं जलाया।
लोग जल्दी-जल्दी दरवाजे बंद करने लगे।
मंदिर की घंटी को मोटी रस्सी से बाँध दिया गया।
काली धार के रास्ते पर काँटेदार झाड़ियाँ रख दी गईं।
और गाँव की चौपाल पर पहली बार पुरुषों की पूरी टोली रात भर पहरा देने के लिए बैठी।
रघु भी वहीं था।
गोपाल भी।
बीच में आग जल रही थी।
बिसनू काका चुपचाप बैठे थे।
करीब आधी रात को आग अचानक बुझ गई।
किसी ने लकड़ी नहीं हटाई थी।
हवा भी नहीं थी।
फिर जंगल की तरफ से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।
सबने एक-दूसरे को देखा।
आवाज फिर आई।
इस बार बहुत साफ।
“माँ…”
बिसनू काका खड़े हो गए।
उनका चेहरा काँप रहा था।
उन्होंने कहा—
“कोई मत जाना।”
रोने की आवाज पास आती गई।
“माँ…”
“माँ…”
“माँ…”
फिर अचानक रोना बंद हो गया।
और उसी जगह से एक और आवाज आई।
बहुत बूढ़ी।
बहुत थकी हुई।
“बिसनू…”
काका की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने फुसफुसाकर कहा—
“तू अभी भी मुझे याद करती है?”
रघु ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“काका, आप किससे बात कर रहे हैं?”
काका ने उसकी तरफ देखा।
“जिसे हमने बारह साल पहले नदी में डुबो दिया था।”
रघु के हाथ ठंडे पड़ गए।
“किसे?”
काका ने कोई जवाब नहीं दिया।
दूर मंदिर की घंटी अचानक जोर से हिलने लगी।
रस्सी बंधी हुई थी।
फिर भी घंटी हिल रही थी।
एक बार।
दो बार।
तीन बार।
और चौथी बार घंटी बजते ही…
काली धार की दिशा से किसी औरत की चीख सुनाई दी।
पूरे गाँव ने वह चीख सुनी।
लेकिन सबसे ज्यादा डरावनी बात यह थी कि चीख के तुरंत बाद नदी के पानी से आवाज आई—
“रघु…”
रघु ने आँखें बंद कर लीं।
क्योंकि उसे उसी क्षण समझ आ गया था।
वह आवाज उसे बुला रही थी।
और काली धार के उस पार…
कोई उसका इंतज़ार कर रहा था।
“दरवाजा खोलो।”
सुरंग में वही आवाज फिर गूँजी।
रघु का शरीर सुन्न हो गया।
वह जानता था कि आवाज उसकी बहन की नहीं थी।
लेकिन आवाज इतनी असली थी कि उसके मन का एक हिस्सा अब भी उसे सच मानना चाहता था।
बिसनू काका ने उसका हाथ कसकर पकड़ रखा था।
“जो सुन रहे हो, उस पर भरोसा मत करना।”
रघु ने पूछा—
“तो फिर बाहर कैसे निकलेंगे?”
काका ने सामने की काली दीवार को देखा।
“जिस रास्ते से आए हैं, उसी रास्ते से।”
गोपाल ने घबराकर कहा—
“वहाँ तो रास्ता है ही नहीं।”
काका ने लालटेन जमीन पर रखी।
फिर अपनी जेब से एक पुराना पीतल का सिक्का निकाला।
सिक्के पर एक तरफ मंदिर बना था।
दूसरी तरफ तीन दरवाजे।
काका ने सिक्का फर्श पर रखा।
अचानक दीवार पर तीन जगह हल्की रोशनी दिखाई दी।
तीन दरवाजे।
पहला लकड़ी का।
दूसरा पत्थर का।
तीसरा लोहे का।
गोपाल ने पूछा—
“इनमें से कौन सा सही है?”
काका बोले—
“तीनों।”
“क्या?”
“तीनों रास्ते एक ही जगह जाते हैं।”
रघु ने पूछा—
“कहाँ?”
काका ने कहा—
“देवकुंड के नीचे।”
पहला दरवाजा अपने आप खुल गया।
अंदर से तेज ठंडी हवा आई।
काका ने कहा—
“इससे जाना आसान है।”
गोपाल बोला—
“और बाकी?”
“बाकी रास्ते हमें नहीं चाहिए।”
तीनों पहले दरवाजे से अंदर चले गए।
दरवाजा उनके पीछे बंद हो गया।
अंदर एक छोटी सुरंग थी।
दीवारों पर लाल धागे बंधे थे।
सैकड़ों।
हर धागे के साथ एक नाम लिखा था।
रघु धीरे-धीरे पढ़ने लगा।
कुछ नाम पुराने थे।
कुछ बहुत पुराने।
कुछ ऐसे जिन्हें उसने गाँव में सुना था।
फिर उसकी नजर एक नाम पर पड़ी।
उसका अपना नाम।
रघु।
उसके नीचे तारीख लिखी थी।
आज की तारीख।
रघु पीछे हट गया।
“काका…”
काका ने नाम देखा।
उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
“यह संभव नहीं।”
गोपाल ने पूछा—
“क्या?”
काका ने कहा—
“नाम तभी लिखा जाता है जब रास्ता किसी को चुन ले।”
“किसे?”
काका ने रघु की तरफ देखा।
“तुम्हें।”
रघु ने लाल धागा खींच दिया।
जैसे ही धागा टूटा, सुरंग में जोरदार हवा चली।
सारे दीपक बुझ गए।
अँधेरे में गौरा की आवाज आई—
“धागा तोड़ दिया?”
रघु ने कहा—
“तुम चाहती क्या हो?”
कुछ पल कोई आवाज नहीं आई।
फिर उसने कहा—
“जो मेरा था, वह वापस।”
“क्या?”
“मेरा गाँव।”
अचानक सुरंग की दीवारें गायब हो गईं।
तीनों एक खुले मैदान में खड़े थे।
आसमान काला था।
चारों तरफ घर थे।
पुराने घर।
मिट्टी की दीवारें।
पत्थर की छतें।
दरवाजों पर लकड़ी की नक्काशी।
गोपाल ने फुसफुसाकर कहा—
“यह वही गाँव है।”
काका ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
रघु ने पूछा—
“यह गाँव कितने साल पहले खत्म हुआ था?”
काका ने उत्तर दिया—
“बारह साल नहीं।”
“तो?”
“छियासी साल।”
रघु चुप हो गया।
काका आगे बोले—
“बारह साल पहले हमने सिर्फ उसकी कहानी दोबारा दबाई थी।”
रघु ने पूछा—
“गौरा कौन थी?”
काका ने गहरी साँस ली।
“गौरा इस गाँव की बेटी थी।”
“और फिर?”
“उसने देवकुंड के नीचे का रास्ता खोज लिया।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसके पिता गायब हो गए थे।”
काका की आवाज में पछतावा था।
“वह उन्हें ढूँढते हुए इस सुरंग में आई।”
“और उसे क्या मिला?”
“एक मंदिर।”
“मंदिर?”
“एक ऐसा मंदिर जो जमीन के नीचे था।”
काका ने बताया कि उस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं थी।
सिर्फ एक पत्थर था।
उस पत्थर पर गाँव के हर परिवार का नाम लिखा था।
और सबसे नीचे एक खाली जगह।
गौरा ने वहाँ अपना नाम लिख दिया था।
उसी रात गाँव में पहली बार मंदिर की घंटी अपने आप बजी।
अगली सुबह तीन लोग गायब हो गए।
फिर पाँच।
फिर आठ।
लोग डर गए।
उन्होंने गौरा को दोषी माना।
उसे पकड़कर नदी के पास ले गए।
लेकिन बिसनू काका के पिता ने उसे मारने से इनकार कर दिया।
उन्होंने उसे नदी में नहीं डुबोया।
उन्होंने उसे सुरंग के अंदर बंद कर दिया।
और रास्ता पत्थरों से बंद कर दिया।
“फिर?”
रघु ने पूछा।
काका की आँखें भर आईं।
“हमने झूठ बोल दिया कि गौरा नदी में डूब गई।”
“क्यों?”
“क्योंकि डर गया था गाँव।”
तभी पीछे से आवाज आई—
“डर तुम थे, गाँव नहीं।”
तीनों पलटे।
गौरा सामने खड़ी थी।
इस बार उसका चेहरा वैसा नहीं था जैसा पानी में दिखाई दिया था।
वह एक सामान्य पहाड़ी लड़की जैसी दिख रही थी।
लंबे बाल।
सादा कपड़े।
हाथ में लाल धागा।
लेकिन उसकी आँखें बहुत पुरानी थीं।
जैसे उसने कई जन्म देखे हों।
रघु ने पूछा—
“तुमने इतने लोगों को क्यों डराया?”
गौरा ने कहा—
“मैंने नहीं डराया।”
“फिर कौन?”
उसने पीछे मंदिर की तरफ देखा।
“वह।”
मंदिर का दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।
अंदर अँधेरा था।
फिर उस अँधेरे में एक लंबी परछाईं उठी।
वह इंसान जैसी थी।
लेकिन उसके पैर नहीं थे।
उसका चेहरा नहीं था।
और जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं वहाँ दो छोटे दीपक जल रहे थे।
बिसनू काका घुटनों के बल बैठ गए।
“काली धार का रक्षक…”
गौरा ने कहा—
“नहीं।”
उसकी आवाज कठोर थी।
“रक्षक नहीं।”
“तो?”
“भूख।”
परछाईं धीरे-धीरे मंदिर से बाहर आने लगी।
जमीन पर उसके कदम नहीं पड़ रहे थे।
फिर भी हर कदम पर घंटी बजती थी।
टन।
टन।
टन।
रघु ने पूछा—
“इसे कैसे रोकेंगे?”
गौरा ने कहा—
“इसे रोका नहीं जा सकता।”
“फिर?”
“इसे वापस सुलाना होगा।”
“कैसे?”
गौरा ने रघु की तरफ देखा।
“जिसने इसे जगाया है, वही इसे सुलाएगा।”
रघु समझ गया।
“मैं?”
गौरा ने सिर हिलाया।
“तुम्हारे खून में उस आदमी का नाम है जिसने मुझे बंद किया था।”
बिसनू काका ने आँखें झुका लीं।
रघु ने उनकी तरफ देखा।
“मेरे दादा?”
काका ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
रघु को जैसे विश्वास नहीं हुआ।
“उन्होंने क्या किया था?”
काका ने कहा—
“उन्होंने गाँव को बचाने के लिए गौरा को धोखा दिया।”
गौरा बोली—
“और अब उसका वंशज फैसला करेगा कि कहानी खत्म होगी या नहीं।”
रघु मंदिर की तरफ बढ़ा।
गोपाल ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तू अकेला मत जा।”
रघु ने कहा—
“मैं अकेला नहीं हूँ।”
गौरा ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।
“यही सही जवाब है।”
तीनों मंदिर के भीतर चले गए।
मंदिर के बीचोंबीच वही काली शिला थी।
उसके चारों तरफ सात छोटे दीपक रखे थे।
छह बुझ चुके थे।
सातवाँ जल रहा था।
गौरा ने कहा—
“सातवाँ दीपक बुझाना होगा।”
रघु ने पूछा—
“बस इतना?”
“नहीं।”
“फिर?”
“दीपक बुझाने के बाद अपना नाम शिला से मिटाना होगा।”
रघु ने शिला देखी।
उस पर कई नाम खुदे थे।
सबसे नीचे उसका नाम था।
रघु।
उसने हाथ बढ़ाया।
तभी परछाईं मंदिर के दरवाजे तक पहुँच गई।
पूरा मंदिर काँपने लगा।
गोपाल ने दरवाजा पकड़ लिया।
“जल्दी कर!”
रघु ने पत्थर से अपना नाम घिसना शुरू किया।
पहली रेखा मिटाई।
दूसरी।
तीसरी।
लेकिन नाम जितना मिटाता…
उतना ही गहरा होता जाता।
रघु चिल्लाया—
“यह मिट क्यों नहीं रहा?”
गौरा बोली—
“क्योंकि नाम मिटाने से पहले तुम्हें सच बोलना होगा।”
“कौन सा सच?”
“अपने बारे में।”
रघु ने आँखें बंद कीं।
फिर बोला—
“मैं डरता हूँ।”
शिला थोड़ी काँपी।
उसने फिर कहा—
“मुझे मरने से डर लगता है।”
एक और हिस्सा मिट गया।
“मुझे डर है कि मैं अपने परिवार को नहीं बचा पाऊँगा।”
नाम की एक और रेखा गायब हो गई।
“मुझे डर है कि मैं अपने दादा जैसा बन जाऊँगा।”
अब उसका आधा नाम मिट चुका था।
परछाईं मंदिर के अंदर आ गई।
गोपाल पीछे हट गया।
गौरा ने कहा—
“आखिरी सच।”
रघु की आँखों में आँसू थे।
उसने कहा—
“मैंने कई बार उन बातों पर हँसी जिनसे मेरे गाँव के लोग डरते थे।”
शिला टूटने लगी।
“मैंने सोचा था कि मैं सबसे बहादुर हूँ।”
नाम लगभग मिट चुका था।
“लेकिन मैं अकेला नहीं हूँ।”
उसने गोपाल की तरफ देखा।
“और मुझे अकेले बचना भी नहीं है।”
अंतिम अक्षर मिट गया।
उसी क्षण सातवाँ दीपक बुझ गया।
परछाईं रुक गई।
मंदिर में ऐसा सन्नाटा छा गया कि सबकी साँसें सुनाई देने लगीं।
फिर काली शिला के भीतर से एक आवाज आई।
“कौन है?”
गौरा आगे बढ़ी।
“मैं हूँ।”
“कौन?”
“गौरा।”
परछाईं उसकी तरफ मुड़ी।
गौरा ने अपना लाल धागा शिला पर रख दिया।
“जिसे तुमने बाँध रखा था।”
परछाईं पीछे हटने लगी।
गौरा ने कहा—
“अब कोई नाम नहीं है।”
परछाईं से चीख निकली।
इतनी तेज कि मंदिर की छत काँप गई।
काली धार का पानी सुरंग में भरने लगा।
गोपाल चिल्लाया—
“हमें बाहर निकलना होगा!”
गौरा ने सिर हिलाया।
“तुम दोनों जाओ।”
रघु ने कहा—
“और तुम?”
गौरा मुस्कराई।
“मेरा घर यहीं है।”
“नहीं।”
रघु ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम हमारे साथ चलोगी।”
गौरा ने उसकी तरफ देखा।
पहली बार उसकी आँखों में आँसू थे।
“इतने साल बाद किसी ने यह बात कही है।”
रघु ने कहा—
“तो चलो।”
तीनों बाहर भागे।
पीछे मंदिर टूटने लगा।
दीवारों में दरारें पड़ गईं।
घंटी लगातार बज रही थी।
टन।
टन।
टन।
टन।
सुरंग में पानी घुटनों तक आ गया।
वे सीढ़ियों की तरफ दौड़े।
इस बार सीढ़ियाँ दिखाई दे रही थीं।
गोपाल सबसे आगे था।
रघु बीच में।
गौरा सबसे पीछे।
जैसे ही रघु ऊपर पहुँचा, उसने पीछे देखा।
गौरा रुक गई थी।
“क्या हुआ?”
गौरा ने कहा—
“मुझे जाना होगा।”
“कहाँ?”
उसने सुरंग के अँधेरे की तरफ देखा।
“जिसे तुमने सुलाया है, वह पूरी तरह नहीं सोया।”
रघु ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम भी चलोगी।”
गौरा ने धीरे से हाथ छुड़ा लिया।
“रघु…”
उसकी आवाज अब बहुत दूर से आती हुई लग रही थी।
“अगर मैं ऊपर गई…”
वह रुक गई।
“तो वह भी मेरे साथ आएगा।”
रघु ने कुछ नहीं कहा।
गौरा मुस्कराई।
“अब मेरा इंतज़ार मत करना।”
अगले ही पल सुरंग की छत से पत्थर गिरने लगे।
गोपाल ने रघु को खींच लिया।
दोनों सीढ़ियों पर भागे।
पीछे से गौरा की आवाज आखिरी बार आई—
“देवकुंड को बचा लेना।”
एक जोरदार धमाका हुआ।
सुरंग बंद हो गई।
रघु और गोपाल जमीन पर गिर पड़े।
सुबह होने लगी थी।
जब वे घर के पास पहुँचे तो गाँव में लोग जमा थे।
रघु की माँ उसे देखते ही दौड़कर आई।
उसने उसे गले लगा लिया।
“तू कहाँ था?”
रघु कुछ नहीं बोल पाया।
माँ ने उसके चेहरे को देखा।
“गोपाल भी साथ था?”
गोपाल ने सिर हिलाया।
बिसनू काका कुछ दूर खड़े थे।
उन्होंने रघु की तरफ देखा।
फिर मंदिर की तरफ।
मंदिर की घंटी अब शांत थी।
काली धार भी शांत थी।
लेकिन नदी का पानी पहली बार साफ दिखाई दे रहा था।
इतना साफ कि उसमें आसमान दिखाई दे रहा था।
रघु नदी के किनारे गया।
उसने पानी में अपना चेहरा देखा।
पहली बार।
पानी में उसका चेहरा ही दिखाई दिया।
कोई और नहीं।
वह वापस मुड़ा।
तभी उसकी नजर रेत पर पड़ी।
एक छोटी-सी चाँदी की पायल वहाँ रखी थी।
वही पायल जो गौरा के हाथ में थी।
रघु ने उसे उठाया नहीं।
वह बस कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर उसने उसे वहीं छोड़ दिया।
उस दिन के बाद देवकुंड में कभी रात को मंदिर की घंटी नहीं बजी।
काली धार का पानी कभी काला नहीं हुआ।
घर की दीवारों पर गीली हथेलियाँ फिर कभी नहीं दिखाई दीं।
लोगों ने धीरे-धीरे उस रात को भुलाना शुरू कर दिया।
लेकिन रघु नहीं भूला।
वर्षों बाद उसने गाँव छोड़ दिया।
शहर में नौकरी की।
शादी की।
बच्चे हुए।
लेकिन हर साल सावन की एक रात वह देवकुंड वापस आता था।
एक रात वह अपने छोटे बेटे को लेकर गाँव पहुँचा।
बेटा करीब आठ साल का था।
उसने मंदिर की तरफ देखकर पूछा—
“पापा, यहाँ घंटी क्यों नहीं है?”
रघु ने कहा—
“घंटी है।”
“कहाँ?”
रघु ने मंदिर की तरफ देखा।
घंटी सच में वहीं थी।
लेकिन अब उस पर जंग लग चुकी थी।
बेटे ने पूछा—
“इसे बजाते क्यों नहीं?”
रघु मुस्कराया।
“क्योंकि कुछ घंटियाँ बजाने के लिए नहीं होतीं।”
उस रात दोनों पुराने घर में सोए।
आधी रात को रघु की आँख खुली।
कमरे में हल्की ठंडी हवा थी।
उसने खिड़की की तरफ देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
फिर उसे बहुत धीमी आवाज सुनाई दी।
छन…
छन…
छन…
रघु बिस्तर से उठ गया।
उसका बेटा सो रहा था।
आवाज बाहर से आ रही थी।
वह खिड़की तक गया।
नीचे आँगन में एक लड़की खड़ी थी।
लंबे बाल।
सफेद कपड़े।
हाथ में लाल धागा।
रघु का दिल तेज धड़कने लगा।
लड़की ने सिर उठाया।
वह गौरा थी।
लेकिन उसके चेहरे पर डर नहीं था।
वह मुस्करा रही थी।
रघु ने खिड़की खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।
तभी गौरा ने सिर हिलाकर मना किया।
फिर उसने पीछे जंगल की तरफ इशारा किया।
रघु ने ध्यान से देखा।
जंगल में दूर एक लालटेन जल रही थी।
और उसके पास एक आदमी खड़ा था।
रघु उस आदमी को पहचानता था।
वह उसके दादा थे।
वही चेहरे की तस्वीर जो पुराने संदूक में लगी थी।
रघु के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
गौरा ने धीरे से कहा—
“कहानी खत्म नहीं हुई।”
रघु ने खिड़की खोल दी।
लेकिन आँगन खाली था।
जंगल भी खाली था।
सिर्फ जमीन पर लाल धागा पड़ा था।
रघु ने उसे उठाया।
उस पर मिट्टी से एक शब्द लिखा था—
“अगली अमावस।”
उसने धागा तुरंत नदी में फेंक दिया।
पानी ने उसे अपने भीतर खींच लिया।
कुछ सेकंड बाद नदी की सतह पर गोल-गोल लहरें बनने लगीं।
फिर बहुत नीचे से…
एक घंटी की आवाज आई।
टन…
रघु की आँखें बंद हो गईं।
लेकिन इस बार वह नहीं डरा।
उसने अपने बेटे को उठाया।
दरवाजा खोला।
और पहली बार काली धार की तरफ जाने वाली पगडंडी पर कदम रखा।
पीछे से सुबह का उजाला फैल रहा था।
आगे जंगल था।
और जंगल के पार…
एक पुराना गाँव।
जिसे दुनिया ने कभी जाना ही नहीं था।
रघु ने पीछे मुड़कर आखिरी बार देवकुंड को देखा।
उसे लगा जैसे मंदिर की छत पर कोई खड़ा है।
गौरा।
उसने हाथ उठाया।
फिर धुंध में गायब हो गई।
रघु आगे बढ़ गया।
क्योंकि अब उसे समझ आ चुका था—
कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं।
वे बस अगली पीढ़ी का इंतज़ार करती हैं।
और देवकुंड की कहानी…
अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।