Beyond the Fog: Discovering Hidden Truths

A Village Between Hills and Forests In the northeast of India, a small village lay between rolling hills and dense forests, where the air carried the scent of pine and rain. Locals recount a horror story from years past when strangers vanished, and night sounds rose from the trees as if listening to every breath. […]

देवकुंड — वह गाँव जिसे रात ने निगल लिया

उत्तर की पहाड़ियों में एक ऐसा गाँव था, जहाँ जाने के लिए आखिरी बस से उतरने के बाद भी लगभग चार घंटे पैदल चलना पड़ता था। गाँव का नाम था देवकुंड। नक्शे पर उसका नाम बहुत छोटे अक्षरों में लिखा था। इतना छोटा कि पहली नजर में लगता था जैसे किसी ने पेंसिल से बस एक

मसान घाट का आख़िरी दीपक

सन 1998… रानीखेत से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर, देवदार और बाँज के घने जंगलों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था—भैसियाछीना। गाँव में मुश्किल से चालीस घर थे। सूरज ढलते ही ऐसा लगता जैसे पूरा गाँव किसी अदृश्य चादर के नीचे छिप गया हो। यहाँ एक नियम था… सूर्यास्त के बाद कोई भी “मसान घाट”

काला अध्याय: भारत की सबसे डरावनी हिंदी हॉरर कहानी | Platform 0

भाग 1 — जिस रात गाँव ने साँस रोक ली उस रात गाँव ने साँस लेना बंद कर दिया था। यह कोई मुहावरा नहीं था।लोग सच में महसूस कर रहे थे कि हवा फेफड़ों तक नहीं पहुँच रही। दरवाज़े खुले थे।खिड़कियाँ खुली थीं।फिर भी दम घुट रहा था। कुत्ते सबसे पहले समझ गए।वे अचानक अपने मालिकों

मरणूर का मणिकुंड

नदी की गर्दन जहां समुद्र से मिलती थी, वहां एक छोटा सा गाँव था — मरणूर। नारियल के पेड़ किनारे झुके रहते, और दलदली मिट्टी में छोटे-छोटे थार होते जो जुलूस की तरह तिरछे दिखाई देते। गाँव की राहें सर्पिल थीं; हर मोड़ के बाद बैकवॉटर का एक अलग रंग दिखता। देहाती घरों की दीवारों

हिमालय का विरह 

साँसें पत्थर पर जमती थीं उस ऊँचाई पर जहाँ हवा पतली थी और रातें लंबी।सूर्य जब भी पहाड़ी के पीछे छिपता, घाटी पर पहाड़ों की परछाई ऐसी फैल जाती कि मानो दुनिया धीमी-धीमी अपनी सांस रोक लेती। उस घाटी का नाम था चिरहोल—घर कुछ लोगों का, पर ज़्यादातर समय एक अनकही खामोशी का घर। गाँव

कहानी: पथरीला स्टेशन

पहाड़ी रास्ता शहर से बहुत दूर जाकर खत्म हुआ। गाँवों की आख़िरी रोशनी के बाद सब कुछ खामोश रहता—केवल चारों ओर विस्तृत पत्थर और पेड़ों की परछाइयाँ जो रात में लंबी होती चली जातीं। रास्ते का आख़िरी मोड़ था—एक सुनसान रेलवे प्लेटफ़ॉर्म, जिसे लोग “पथरीला स्टेशन” कहते थे। नाम पर वही पथर था: प्लेटफ़ॉर्म का

शवगृह स्टेशन

धुंध इतनी घनी थी कि सामने खड़ा पेड़ भी धुआँ बनकर हवा में घुलता-सा लगता था।सुबह का सूरज ऊपर था, लेकिन चमक किसी और दुनिया से होकर आ रही थी—फीकी, ठंडी और अजीब तरह से टेढ़ी।रास्ते के किनारे बांस, पलाश और कुछ सूखे नीम के पेड़ थे, लेकिन ऐसा लगता था जैसे वो पेड़ नहीं,

खूनी झील का शाप

कोलकाता के दो युवा फोटोग्राफर — अदिति और रोहन — एक सुनसान झील की कहानियाँ सुनकर वहां जाते हैं। झील के पानी में परछाइयाँ लहराती हैं; वे जो देखते हैं वह सिर्फ़ भय नहीं, बल्कि किसी पुराने, भयंकर शाप की पुनरावृत्ति है। 1 — रास्ते की शुरुआतरात का घिरना।सड़क धुंध में गायब।कार की हेडलाइट हल्की-सी

अँधेरों का गांव

राजस्थान की सीमा पर बसे, नक़्शों में मुश्किल से दिखाई देने वाले, एक लगभग-भूले गाँव कांकरेड़ा का नाम बहुत कम लोग जानते हैं। जो जानते हैं… वे इसके बारे में बोलने से कतराते हैं। कहते हैं—वहाँ रात और मौत में फ़र्क नहीं है।कई साल पहले इस गाँव को “शापित” कहा गया था, एक ऐसा शाप जिसे न

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