सन 1998…
रानीखेत से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर, देवदार और बाँज के घने जंगलों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था—भैसियाछीना।
गाँव में मुश्किल से चालीस घर थे।
सूरज ढलते ही ऐसा लगता जैसे पूरा गाँव किसी अदृश्य चादर के नीचे छिप गया हो।
यहाँ एक नियम था…
सूर्यास्त के बाद कोई भी “मसान घाट” की दिशा में नहीं जाता था।
वह घाट गाँव से लगभग दो किलोमीटर नीचे, कोसी नदी के किनारे था।
बुज़ुर्ग कहते थे—
“दिन में वह सिर्फ़ श्मशान है…
लेकिन रात में…
वह किसी और का घर बन जाता है।”
बारह साल का मोहन गर्मियों की छुट्टियों में अपने दादा के पास गाँव आया था।
उसे शहर की बातें पसंद थीं।
वह भूत-प्रेत पर हँसता था।
एक शाम उसने पूछा—
“दादाजी… सब लोग मसान घाट से इतना डरते क्यों हैं?”
दादा कुछ देर चुप रहे।
फिर धीमे से बोले—
“डर श्मशान से नहीं…
उसमें रहने वाले से है।”
मोहन मुस्कुरा दिया।
“भूत?”
दादा ने सिर हिलाया।
“नहीं…
मसान।“
दादा ने अंगीठी में लकड़ी डाली।
आग की लपटें उनके चेहरे पर पड़ रही थीं।
“जब किसी की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती…
या अंतिम संस्कार अधूरा रह जाता है…
तो वह आत्मा धीरे-धीरे मसान बन जाती है।”
“वह इंसानों को मारता है?”
“नहीं…”
दादा की आवाज़ और धीमी हो गई।
“वह…
उन्हें बुलाता है।”
“कैसे?”
“तुम्हारे किसी अपने की आवाज़ बनकर।”
मोहन पहली बार थोड़ा असहज हुआ।
अगली रात…
करीब ग्यारह बजे…
मोहन की नींद खुल गई।
खिड़की के बाहर…
किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी।
टक… टक… टक…
जैसे कोई लकड़ी की चप्पल पहनकर चल रहा हो।
उसने बाहर झाँका।
सड़क खाली थी।
लेकिन…
दूर जंगल की तरफ़…
एक छोटा-सा दीपक जल रहा था।
इतनी रात को?
जंगल के बीच?
वह दीपक धीरे-धीरे हिल रहा था।
जैसे कोई उसे हाथ में लेकर चल रहा हो।
और फिर…
अचानक…
बुझ गया।
सुबह गाँव में खबर फैल गई।
चरवाहा गोविंद रात से गायब था।
उसकी लाठी…
मसान घाट के रास्ते पर मिली।
जूते…
श्मशान के पास।
लेकिन गोविंद…
कहीं नहीं मिला।
गाँव वाले बस एक बात दोहरा रहे थे—
“मसान फिर जाग गया…”
तीन दिन बाद पूर्णिमा थी।
दादा ने घर का दरवाज़ा सूर्यास्त से पहले बंद कर दिया।
“आज कोई बाहर नहीं जाएगा।”
लेकिन आधी रात…
मोहन ने साफ़-साफ़ अपनी माँ की आवाज़ सुनी।
“मोहन…
बेटा…
बाहर आ…”
वह चौंक गया।
माँ तो दिल्ली में थी।
फिर…
आवाज़ कैसे?
आवाज़ दोबारा आई।
इस बार बिल्कुल खिड़की के बाहर से।
“मोहन…
मैं आ गई…”
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
धीरे-धीरे…
वह खिड़की के पास पहुँचा।
पर्दा हटाया।
बाहर…
सफेद साड़ी पहने…
उसकी माँ खड़ी थी।
चेहरा वैसा ही।
मुस्कान भी वैसी।
लेकिन…
एक बात अजीब थी।
उसकी आँखें नहीं थीं।
आँखों की जगह…
काला अंधेरा था।
मोहन चीखने ही वाला था कि…
दादा ने पीछे से उसका मुँह दबा दिया।
उन्होंने बिना बाहर देखे कहा—
“नाम मत लेना…
आँख मत मिलाना…”
बाहर से आवाज़ आई—
“बाबा…
मोहन को भेज दो…”
दादा ने कोई जवाब नहीं दिया।
कुछ देर बाद…
आवाज़ बदल गई।
अब वह किसी बूढ़े आदमी की थी।
फिर किसी बच्चे की।
फिर किसी औरत की।
और आखिर में…
ऐसी आवाज़…
जो इंसान की हो ही नहीं सकती थी।
अगले दिन दादा मोहन को मंदिर ले गए।
पुजारी ने बस इतना कहा—
“जिसने उसकी आवाज़ सुन ली…
वह अब उसे दोबारा ज़रूर सुनेगा।”
मोहन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
गाँव के सबसे बूढ़े व्यक्ति ने बताया—
हर तीस साल बाद…
मसान घाट में एक दीपक अपने-आप जलता है।
जो उसे देखने चला जाता है…
वह लौटकर कभी वैसा नहीं रहता।
कुछ लौटते ही नहीं।
कुछ लौटते हैं…
लेकिन उनकी परछाईं नहीं लौटती।
आधी रात।
फिर वही दीपक।
इस बार…
दीपक धीरे-धीरे गाँव की तरफ़ आ रहा था।
कोई उसे लेकर नहीं चल रहा था।
वह…
अपने-आप हवा में तैर रहा था।
पूरा गाँव घरों में बंद था।
सिर्फ़ एक आदमी बाहर निकला।
गोविंद।
जिसे सब मृत समझ रहे थे।
उसका चेहरा सफेद था।
आँखें पूरी काली।
वह कुछ नहीं बोल रहा था।
बस…
दीपक के पीछे-पीछे चल रहा था।
मोहन और दादा दूर से उसका पीछा करने लगे।
श्मशान पहुँचते ही…
दीपक बुझ गया।
और अचानक…
चारों तरफ़ सन्नाटा।
फिर…
राख के बीच…
कुछ हिलने लगा।
धीरे-धीरे…
एक आकृति उठी।
वह आदमी जितनी लंबी नहीं थी।
वह…
लगभग नौ फ़ुट ऊँची थी।
पूरा शरीर जली हुई लकड़ियों जैसा काला।
चेहरे पर त्वचा नहीं।
आँखों की जगह…
जलते हुए अंगारे।
और उसके पैरों के निशान…
उल्टे थे।
उसने सिर घुमाया।
सीधे…
मोहन की तरफ़।
फिर…
मुस्कुराया।
उसके दाँत इंसानों जैसे नहीं थे।
वे…
राख से बने नुकीले पत्थरों जैसे थे।
मसान ने पहली बार बोला।
लेकिन उसकी आवाज़…
एक नहीं थी।
सैकड़ों आवाज़ें…
एक साथ बोल रही थीं।
“मोहन…”
“आ जा…”
“तेरी माँ बुला रही है…”
“तेरा पिता…”
“तेरा दोस्त…”
हर आवाज़…
किसी अपने की थी।
मोहन के पैर खुद-ब-खुद आगे बढ़ने लगे।
दादा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
अचानक…
हवा चलने लगी।
श्मशान की सारी राख हवा में उड़ गई।
ऐसा लगा…
हज़ारों चेहरे राख के बीच दिखाई दे रहे हों।
हर चेहरा…
कुछ कहना चाहता था।
फिर…
सभी चेहरे एक साथ चीखे।
इतनी तेज़…
कि पेड़ों से पक्षी नीचे गिर पड़े।
दादा ने जेब से मंदिर का दिया निकाला।
उसे जलाया।
और ज़मीन पर रख दिया।
जैसे ही उसकी लौ जली…
मसान पीछे हट गया।
वह पहली बार डरता हुआ दिखाई दिया।
दादा चिल्लाए—
“भागो!”
दोनों भागे।
पीछे से…
भारी कदमों की आवाज़ आती रही।
लेकिन किसी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अगली सुबह…
श्मशान बिल्कुल शांत था।
गोविंद कभी नहीं मिला।
लेकिन…
उस जगह…
जहाँ पिछली रात दादा ने दीपक रखा था…
आज भी…
हर पूर्णिमा की रात…
एक छोटा-सा दीपक अपने-आप जल उठता है।
गाँव वाले कहते हैं…
जब तक वह दीपक जलता रहेगा…
मसान घाट की सीमा पार नहीं करेगा।
लेकिन…
अगर किसी रात…
वह दीपक नहीं जला…
तो…
मसान…
गाँव के भीतर आएगा।
और सबसे पहले…
उसी घर का दरवाज़ा खटखटाएगा…
जिसने यह कहानी पढ़ते समय सोचा था—
“भूत-वूत कुछ नहीं होते…”
उस रात…
अगर आपको अपने किसी बहुत प्रिय व्यक्ति की आवाज़ सुनाई दे…
तो…
कभी भी दरवाज़ा मत खोलिए।