उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव, सोनोवाड़ी, में एक पुराना मंदिर था। यह मंदिर गाँव के बाहर, एक घने जंगल में स्थित था। पहले यह मंदिर बहुत प्रसिद्ध था, लेकिन समय के साथ यह बुरी तरह से जर्जर हो गया और अब वहाँ जाने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी। गाँववालों का कहना था कि यह मंदिर कभी एक सिद्ध स्थल हुआ करता था, जहाँ लोग अपनी समस्याओं का हल पाते थे। लेकिन अब यहाँ कुछ और था – एक अजीब सी खामोशी और डरावनी बातें।
गाँव के बुजुर्ग बताते थे कि रात के समय मंदिर से अजीब सी आवाजें आती थीं, जैसे किसी की चीखें या फिर किसी का जोर-जोर से हंसना। कुछ लोग तो यह भी कहते थे कि जिन्होंने रात में मंदिर जाने की कोशिश की, वे कभी वापस नहीं लौटे। इस मंदिर को लेकर गाँव में एक डर और रहस्य फैल गया था।
यह कहानी एक युवा लड़के, समीर, की है। समीर एक साहसी और जिज्ञासु लड़का था, जो पुराने मंदिरों और धरोहरों के बारे में पढ़ता था। जब उसने सुनी यह भूतिया कहानी, तो उसने ठान लिया कि वह उस मंदिर का राज़ जरूर उजागर करेगा। समीर ने पहले गाँववालों से सुनी हुई बातों को नकारते हुए यह तय किया कि वह इस मंदिर में जाएगा और खुद देखेगा कि वहां क्या है।
एक रात समीर अकेले ही मंदिर की ओर बढ़ा। गाँव से बाहर निकलते ही उसे जंगल की घनी सियाही और ठंडी हवा महसूस हुई। जैसे-जैसे वह मंदिर के पास पहुँचा, उसे एक अजीब सी खामोशी ने घेर लिया। चाँद की रोशनी में मंदिर की कटी-फटी छत और दरवाजे बहुत भयानक दिख रहे थे। समीर ने डर को नकारते हुए मंदिर का दरवाजा खोला।
जैसे ही उसने दरवाजा खोला, अंदर से एक सर्द हवा का झोंका आया और मंदिर की दीवारों पर कुछ हल्की सी खरोंचों की आवाज़ सुनाई दी। समीर ने अंदर कदम रखा, और अचानक एक अजीब सी गंध ने उसका गला घोंट लिया। मंदिर का अंदरूनी हिस्सा बहुत ही अंधेरा और गंदा था। दीवारों पर खून के धब्बे थे और जमीन पर कुछ अजीब सी आकृतियाँ बनी हुई थीं।
वह धीरे-धीरे मंदिर के भीतर गया और देखा कि एक पुराना वेदी था, जिस पर एक कटा-फटा मूर्ति रखी हुई थी। तभी, अचानक वह मूर्ति अपनी जगह से हिलने लगी। समीर के होश उड़ गए, लेकिन उसने अपने डर को काबू किया और वह मूर्ति के पास गया। जैसे ही उसने मूर्ति को छुआ, एक जोरदार चीख सुनाई दी, और वह मूर्ति अंधेरे में समा गई।
“तुम यहाँ क्यों आए हो?” एक गहरी और डरावनी आवाज़ समीर के कानों में गूंजने लगी। समीर ने चारों ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं था। तभी, उसे वह मूर्ति फिर से दिखाई दी, लेकिन अब वह मूर्ति एक औरत के रूप में बदल चुकी थी। उसके चेहरे पर एक भयानक मुस्कान थी, और उसकी आँखें पूरी काली थीं।
समीर ने घबराकर पूछा, “तुम कौन हो?” और उसने अपनी आवाज़ को शांत रखने की कोशिश की।
औरत ने अपनी कटी-फटी आवाज़ में कहा, “मैं यहाँ की देवी हूँ। मेरे साथ एक धोखा हुआ था, और मैं अब इस मंदिर में फंसी हुई हूँ। जो भी यहाँ आता है, उसे मैं अपनी चपेट में ले लेती हूँ।” औरत की आवाज़ अब और भी तेज़ हो गई, और समीर ने महसूस किया कि वह अब एक भयानक जाल में फंस चुका था।
समीर ने डर के बावजूद अपना साहस बढ़ाया और औरत से कहा, “मैं तुम्हारी मदद करूंगा।”
लेकिन औरत ने हंसी में कहा, “तुम मेरी मदद नहीं कर सकते, क्योंकि तुम अब मेरे जाल में फंस चुके हो। अब तुम भी इस मंदिर के हिस्सा बन जाओगे।”
समीर ने समझ लिया कि अब उसे इस भूतिया मंदिर से निकलने का कोई रास्ता नहीं था, लेकिन तभी उसने याद किया कि गाँववालों ने बताया था कि इस मंदिर को एक पुराना साधू चलाता था, जिसने इस देवी को कभी यहाँ बंद कर दिया था। अगर वह उस साधू के बारे में कुछ जान सके, तो शायद वह देवी को शांति दिला सके।
अर्जुन ने मंदिर की दीवारों पर लिखे कुछ पुराने मंत्रों को पढ़ना शुरू किया, और जैसे ही उसने मंत्र का उच्चारण किया, देवी की आकृति धुंधली होने लगी। कुछ समय बाद, देवी की आवाज़ धीरे-धीरे शांत हो गई और मंदिर में हल्की सी रौशनी आनी लगी। समीर ने महसूस किया कि वह अब इस खौ़फनाक जगह से निकल सकता था।
समीर की आँखों के सामने अब मंदिर का माहौल बदल चुका था। पहले जो गहरी खामोशी और अंधेरा था, वह अब हल्की सी रौशनी से भर गया था। देवी की भयानक आकृति अब धीरे-धीरे गायब हो रही थी, और समीर ने महसूस किया कि शायद उसने कोई महत्वपूर्ण कदम उठाया है। उसने मंत्र का उच्चारण किया था, और अब उसे उम्मीद थी कि देवी की आत्मा को शांति मिल चुकी होगी।
लेकिन जैसे ही उसने मंदिर के भीतर देखा, उसकी नज़र फिर से उस पुरानी वेदी पर पड़ी। वहां कुछ अजीब था। वेदी की सतह पर एक पुराना ताबीज पड़ा हुआ था, जो पहले समीर ने नहीं देखा था। ताबीज की चमक हल्की सी थी, और उसकी आँखों में कुछ आकर्षित कर रहा था। समीर ने वह ताबीज उठाया, और जैसे ही उसने उसे अपने हाथों में महसूस किया, उसके अंदर एक तीव्र सी ऊर्जा दौड़ने लगी। उसकी आँखों के सामने धुंध छाने लगी, और वह किसी और दुनिया में खींचा सा महसूस करने लगा।
तभी, अचानक मंदिर के भीतर से एक ज़ोरदार आवाज़ आई, “तुमने वह ताबीज उठा लिया!” समीर ने मुड़कर देखा, और देखा कि देवी की आकृति फिर से प्रकट हो रही थी। उसकी आँखें अब पूरी काली थीं और उसका चेहरा घृणित हो चुका था। “तुमने मेरी शक्ति को छीन लिया है,” देवी ने कहा। “अब तुम मेरी शांति का कारण नहीं बन सकते।”
समीर ने डर के बावजूद कहा, “मैं तुम्हारी मदद करना चाहता था, लेकिन अब तुम और तुम्हारी शक्ति मुझे पकड़ चुकी हो।”
देवी की हंसी और भी तेज़ हो गई। “तुम्हारे जैसे कई लोग यहाँ आए, लेकिन कोई भी मेरे जाल से बचकर नहीं निकला। अब तुम भी मेरे साथ इस मंदिर के भीतर फंसोगे।”
समीर अब समझ चुका था कि वह इस मंदिर से बाहर निकलने के लिए कुछ खास करना होगा। देवी की शक्ति के आगे उसे असहाय महसूस हो रहा था, लेकिन उसने मन ही मन एक और योजना बनाई। उसे याद आया कि इस मंदिर के पास एक पुराना पुस्तकालय था, जहाँ पुराने ग्रंथ और तंत्र-मंत्रों का संग्रह था। उसने तय किया कि अगर वह उस पुस्तकालय तक पहुँचकर कुछ तंत्र-मंत्रों का पता कर पाए, तो शायद वह देवी की आत्मा को शांति दिला सके।
समीर ने बिना देर किए, मंदिर के अंदर से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढने की कोशिश की। वह धीरे-धीरे उस पुराने पुस्तकालय की ओर बढ़ा, लेकिन जैसे-जैसे वह वहाँ पहुंचा, उसे महसूस हुआ कि वह कहीं खो चुका था। मंदिर का आंतरिक रास्ता अब उसे अजीब सा महसूस होने लगा था, और वह भ्रमित हो गया था। चारों ओर अंधेरा था, और उसे ऐसा लग रहा था कि कोई उसे पीछा कर रहा है।
वह पुस्तकालय के दरवाजे तक पहुँचा, और जैसे ही उसने दरवाजा खोला, एक हल्की सी आवाज़ आई। “तुम मेरी किताबें क्यों खोलने आए हो?” समीर ने मुड़कर देखा, और देखा कि वह वही भूतिया आकृति फिर से सामने खड़ी थी। “तुम क्या चाहते हो?” समीर ने डरते हुए पूछा।
आकृति ने कहा, “तुमने उन किताबों का राज़ नहीं जाना। लेकिन अब तुम नहीं बच सकते।”
समीर ने डर को नकारते हुए एक किताब उठाई और उसमें से कुछ मंत्र पढ़ने लगा। जैसे ही उसने मंत्र पढ़ना शुरू किया, पुस्तकालय की हवा में एक बदलाव आया। चारों ओर से हल्की रोशनी फैलने लगी, और देवी की भूतिया आकृति भी अब धुंधली होने लगी। समीर को महसूस हुआ कि उसने सही रास्ता खोज लिया था।
आकृति ने चिल्लाते हुए कहा, “तुमने यह क्या किया? तुम मुझे शांति नहीं दे सकते!” लेकिन समीर ने अपनी आवाज़ ऊँची की और मंत्र का उच्चारण जारी रखा।
कुछ समय बाद, देवी की आकृति पूरी तरह से गायब हो गई, और मंदिर में शांति छा गई। समीर ने महसूस किया कि उसने देवी की आत्मा को शांति दे दी थी, और अब वह मंदिर से बाहर निकल सकता था। जैसे ही वह मंदिर से बाहर निकला, उसे एहसास हुआ कि जो डर उसे अंदर था, वह अब खत्म हो चुका था।
समीर ने पीछे मुड़कर देखा, और मंदिर अब वैसा नहीं था जैसा पहले था। वह अब शांत, सुरक्षित और सामान्य लग रहा था। समीर ने गाँव लौटते हुए अपने अनुभव के बारे में किसी को नहीं बताया, क्योंकि उसे यह समझ में आ गया था कि कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिनके बारे में हमें चुप रहना चाहिए।
वह जानता था कि कभी-कभी डर का सामना करने से हमें अपनी शक्ति का अहसास होता है, और शांति की खोज के लिए हमें साहस दिखाना पड़ता है।