(भाग 1 – हवेली में पहला कदम)
आज मैं इस डायरी की शुरुआत कर रहा हूँ।
मैं नहीं जानता कि इसे कभी कोई पढ़ पाएगा या नहीं।
लेकिन अगर पढ़े… तो यह मेरी आख़िरी गवाही होगी।
दिन 1
आज मैं “शवपुर हवेली” पहुँचा।
गाँव के बाहरी हिस्से में यह हवेली अकेली खड़ी है।
दीवारों पर काई और जाले चिपके हैं।
टूटी हुई खिड़कियों से अँधेरा झाँक रहा था।
गाँव वालों ने मुझे चेतावनी दी थी –
“उधर मत जाना… वो हवेली श्रापित है।”
लेकिन मैं इतिहासकार हूँ।
मेरा काम है पुरानी इमारतों और रहस्यों की सच्चाई ढूँढना।
डरने से सच्चाई नहीं मिलती।
मैंने अपनी लालटेन उठाई और भीतर कदम रख दिया।
भीतर जाते ही अजीब सी ठंडक महसूस हुई।
मानो हवा भी यहाँ मर चुकी हो।
सीढ़ियों पर चलते समय हर कदम की आवाज़ गूँज रही थी।
जैसे हवेली मुझे देख रही हो।
कमरों में टूटी हुई कुर्सियाँ, बिखरे काँच और पुरानी तस्वीरें थीं।
एक तस्वीर खास थी – उसमें एक आदमी काले वस्त्र पहने खड़ा था।
उसकी आँखें सीधी मेरी ओर घूर रही थीं।
नीचे नाम लिखा था – “तांत्रिक राघव।”
मेरी रीढ़ में ठंडक उतर गई।
दिन 2
रातभर मैं हवेली के मुख्य कमरे में रहा।
खिड़कियों से हवा आती रही, पर अजीब बात यह थी…
दरवाज़े अपने आप चरमराकर खुलते-बंद होते रहे।
लगता था जैसे कोई अदृश्य शक्ति यहाँ टहल रही हो।
मैंने सब कुछ डायरी में लिखा।
सोचा – शायद यह मेरी कल्पना हो।
पर आधी रात को किसी ने मेरा नाम फुसफुसाया।
“अरविंद…”
मैं जाग उठा।
चारों ओर सन्नाटा था।
लेकिन हवा में किसी की साँसें महसूस हो रही थीं।
दिन 3
आज हवेली का पिछला हिस्सा देखा।
वहाँ भारी लकड़ी का एक दरवाज़ा था।
उस पर मोटी लोहे की ज़ंजीरें लिपटी हुई थीं।
लगता था जैसे सदियों से इसे खोला ही नहीं गया।
दरवाज़े पर हल्के-हल्के खरोंच के निशान थे।
जैसे कोई भीतर से बार-बार बाहर निकलने की कोशिश करता रहा हो।
मैंने हाथ लगाया तो दरवाज़ा ठंडा नहीं, बल्कि जलता हुआ महसूस हुआ।
मानो आग की दीवार हो।
मैं डरकर पीछे हट गया।
दिन 4
गाँव में एक बुज़ुर्ग मिले।
उनका नाम गोविंद था।
उन्होंने मुझे पहचान लिया और बोले –
“तुम हवेली में ठहरे हो?”
मैंने हाँ कहा।
उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा –
“वो हवेली श्रापित है।
वहाँ एक तांत्रिक रहता था, राघव नाम का।
उसने अमरता पाने के लिए नरबलि दी थी।
गाँव वालों ने उसे मार दिया और तहख़ाने में कैद कर दिया।
लेकिन उसकी आत्मा कभी मरी नहीं।
अब भी वहीं है।”
मैंने पूछा – “तो दरवाज़ा क्यों बंद है?”
उन्होंने काँपते हुए कहा –
“वो दरवाज़ा तांत्रिक की कैदगाह है।
अगर वो खुल गया…
तो पूरा गाँव नष्ट हो जाएगा।”
दिन 5
रात को सोते समय फिर वही फुसफुसाहट सुनाई दी।
इस बार आवाज़ और पास से आई।
“अरविंद… मुझे आज़ाद करो…”
मैंने आँखें खोलीं।
कमरे में कोई नहीं था।
लेकिन दीवार पर परछाई हिल रही थी।
और वो परछाई मेरी नहीं थी।
दिन 6
आज मैंने तहख़ाने वाले दरवाज़े पर ध्यान से देखा।
ज़ंजीरों में हल्की दरारें आ गई थीं।
क्या यह सच में समय से टूटी हैं?
या कोई भीतर से इन्हें तोड़ रहा है?
दरवाज़ा अचानक काँप उठा।
मैं घबरा गया और तुरंत भाग गया।
लेकिन मेरे कानों में वही आवाज़ गूँजती रही –
“ज़्यादा देर तक मत रोक पाओगे…”
दिन 7
अब हवेली मुझे अपने कब्ज़े में ले रही है।
मैं निकलने की कोशिश करता हूँ,
पर हर बार रास्ता मुझे वापस इसी हवेली में ला देता है।
जैसे यह जगह भूलभुलैया बन चुकी हो।
दिन 8
रात को खिड़की से देखा –
बाहर पूरा गाँव सो रहा था।
लेकिन हवेली की छत पर कोई आकृति घूम रही थी।
काले कपड़ों में लिपटा, चेहरा ढका हुआ।
उसकी आँखें आग की तरह जल रही थीं।
जब मैंने ध्यान से देखा, तो वह धीरे-धीरे मेरी ओर झुक गई…
और अचानक गायब हो गई।
दिन 9
आज मुझे तहख़ाने से जोर-जोर की चीखें सुनाई दीं।
लगता था जैसे कई लोग एक साथ तड़प रहे हों।
मैंने दरवाज़े के पास जाकर कान लगाया।
भीतर से सिसकियाँ, रोना और किसी के हँसने की आवाज़ आ रही थी।
वह हँसी इंसानी नहीं थी।
वह शैतानी थी।
दिन 10
अब मैं डर के मारे सो भी नहीं पा रहा।
हर रात मेरे कमरे में कोई अदृश्य ताक़त घूमती रहती है।
कभी दरवाज़ा अपने आप खुलता है, कभी खिड़की।
कभी मेरे पैरों के पास किसी का हाथ महसूस होता है।
लेकिन जब आँख खोलता हूँ – वहाँ कुछ नहीं होता।
दिन 11
आज सुबह उठा तो पाया कि मेरी डायरी रातभर अपने आप लिखी गई है।
पन्नों पर काले अक्षर खुदे हुए थे –
“दरवाज़ा खोलो… वरना मौत तुम्हें ढूँढ लेगी।”
ये शब्द मैंने नहीं लिखे थे।
पर ये मेरी डायरी में थे।
दिन 12
गाँव वापस जाने की कोशिश की।
पर जैसे ही मैं हवेली से बाहर निकला,
गाँव की पगडंडी अचानक धुंध से भर गई।
मैं चलता रहा, लेकिन हर बार वही हवेली सामने आ जाती।
लगता है जैसे मैं किसी जाल में फँस गया हूँ।
दिन 13
आज तहख़ाने वाले दरवाज़े पर खून के धब्बे दिखाई दिए।
वो ताज़ा थे, जैसे अभी-अभी किसी ने वहाँ चोट खाई हो।
मुझे लगा शायद कोई जानवर होगा।
लेकिन तभी भीतर से किसी बच्चे की रोने की आवाज़ आई।
वो मदद माँग रहा था।
“कृपया… दरवाज़ा खोल दो…”
मेरा दिल काँप गया।
लेकिन मैंने हिम्मत करके दरवाज़ा नहीं खोला।
दिन 14
रात को कमरे की दीवार पर किसी ने खून से लिखा –
“तू ही चुना गया है।”
मैं काँप गया।
क्या सच में यह हवेली मुझे चुन चुकी है?
दिन 15
आज मुझे हवेली की लाइब्रेरी मिली।
सैकड़ों पुराने ग्रंथ, किताबें और तंत्र-मंत्र से जुड़ी पांडुलिपियाँ थीं।
एक किताब सबसे अलग थी।
उस पर लिखा था – “रक्त-सिद्धि तंत्र।”
पन्ने खोलते ही मेरी उँगलियों से खून टपका।
जैसे किताब ने मेरी नसें चूस ली हों।
अंदर पहला मंत्र लिखा था –
“जो तहख़ाने को खोलेगा, वही अगला वाहक बनेगा।”
दिन 16
अब मैं समझ रहा हूँ।
हवेली मुझे बाहर नहीं जाने दे रही।
वह चाहती है कि मैं दरवाज़ा खोलूँ।
मेरा डर धीरे-धीरे जिज्ञासा में बदल रहा है।
क्या सच में तांत्रिक राघव अब भी जिंदा है?
क्या वो कैद से मुक्त होना चाहता है?
दिन 17
रात को मुझे सपना आया।
मैं तहख़ाने के भीतर खड़ा था।
चारों ओर जंजीरों से जकड़ी लाशें थीं।
वे सब मुझे घूर रही थीं।
उनकी आँखें लाल थीं।
और बीच में राघव खड़ा था –
उसकी हड्डियाँ बाहर झाँक रही थीं,
लेकिन चेहरा हँस रहा था।
वह बोला –
“अरविंद… तू मेरा उत्तराधिकारी बनेगा।”
मैं चीखकर उठ गया।
दिन 18
सुबह उठते ही मैंने देखा कि मेरी गर्दन पर तीन खरोंचें हैं।
जैसे किसी ने नाखून गाड़ दिए हों।
लेकिन कमरे में कोई नहीं था।
क्या सपना सच में सपना था?
या मैं वाकई तहख़ाने में गया था?
दिन 19
गाँव का बुज़ुर्ग गोविंद आज हवेली के बाहर मिला।
उसने मुझे देखकर चिल्लाया –
“तुरंत निकल जाओ!
वो हवेली तुम्हें अपना बना लेगी!”
मैंने कहा – “मैं फँस चुका हूँ, निकल नहीं सकता।”
उसने मेरी आँखों में झाँका और काँप गया।
“राघव का असर तुझ पर हो चुका है।”
दिन 20
अब तहख़ाने का दरवाज़ा हर रात अपने आप हिलता है।
ज़ंजीरें टूट रही हैं।
भारी ताले में दरार आ गई है।
भीतर से राघव की हँसी गूँजती है।
मैं डरता हूँ,
लेकिन फिर भी मैं हर रात उस दरवाज़े के पास खिंच जाता हूँ।
जैसे कोई अदृश्य धागा मुझे खींच रहा हो।
दिन 21
आज पहली बार मैंने दरवाज़े की झिरी से भीतर झाँका।
अंधेरे में सिर्फ दो जलती आँखें दिखीं।
वे सीधी मेरी ओर देख रही थीं।
फिर आवाज़ आई –
“बस एक धक्का… और मैं मुक्त हो जाऊँगा।”
मैं तुरंत पीछे हट गया।
दिन 22
मेरे हाथ-पाँव काँपते रहते हैं।
भूख खत्म हो गई है।
शरीर कमजोर हो रहा है।
लेकिन अजीब बात है –
रात को मेरी ताक़त अचानक बढ़ जाती है।
मैं दरवाज़े पर हाथ रखता हूँ,
तो ज़ंजीरें खुद-ब-खुद ढीली हो जाती हैं।
दिन 23
आज मैंने देखा कि मेरी परछाई गायब हो गई है।
दीवार पर कुछ भी नहीं था।
लेकिन जब रोशनी बदली,
तो परछाई फिर उभरी।
लेकिन वह मेरी नहीं थी।
वह राघव की थी।
दिन 24
अब मैं समझ गया हूँ।
राघव मुझे अपना पात्र बना रहा है।
वह चाहता है कि मैं ही दरवाज़ा खोलूँ।
और जब दरवाज़ा खुलेगा,
तो शायद मेरी आत्मा कैद हो जाएगी…
और राघव आज़ाद हो जाएगा।
दिन 25
आज मैंने ठान लिया कि मैं यहाँ और नहीं रुकूँगा।
सुबह सूरज निकला तो भागने की कोशिश की।
लेकिन जैसे ही मुख्य द्वार से बाहर निकला,
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन गायब हो गई।
मैं गिरते-गिरते बचा।
सामने वही हवेली थी।
अब साफ हो गया –
हवेली ही मेरा जेल है।
दिन 26
रात को दरवाज़ा जोर-जोर से हिलने लगा।
ज़ंजीरें आधी टूट चुकी थीं।
भीतर से कई आवाज़ें आ रही थीं –
“हमें आज़ाद कर दो…”
“हमें बाहर निकलने दो…”
“हम सदियों से इंतज़ार कर रहे हैं…”
मैंने कान बंद कर लिए।
पर आवाज़ें मेरे दिमाग़ में गूँजती रहीं।
दिन 27
आज हवेली की छत पर राघव को देखा।
वह खुले बालों और काले वस्त्रों में खड़ा था।
हवा में उसका शरीर तैर रहा था।
उसने हाथ उठाकर मुझे इशारा किया –
“नीचे आ… दरवाज़ा खोल…”
मैं काँपता रहा।
पर मेरे कदम अपने आप तहख़ाने की ओर बढ़ने लगे।
दिन 28
अब मुझे डर नहीं लगता।
बल्कि अजीब-सा आकर्षण महसूस होता है।
जैसे मेरी रगों में उसका खून बह रहा हो।
मैं सोचता हूँ –
क्या मैं सच में दरवाज़ा खोल दूँ?
अगर ऐसा करूँ तो क्या होगा?
शायद पूरी दुनिया बदल जाएगी।
दिन 29
आज मेरी आँखें काली पड़ गईं।
आईने में देखा –
मेरे भीतर कोई और झाँक रहा है।
वो मैं नहीं हूँ।
वो राघव है।
दिन 30
दरवाज़ा अब सिर्फ एक धक्के की दूरी पर है।
ज़ंजीरें लगभग टूट चुकी हैं।
आज रात शायद सब खत्म हो जाएगा।
या फिर… सब शुरू होगा।
दिन 31
आज रात दरवाज़ा इतनी ज़ोर से काँपा कि हवेली की नींव हिल गई।
ज़ंजीरों की अंतिम कड़ियाँ चीखते हुए टूटीं।
भीतर से काले धुएँ का गुबार निकला।
उसमें कई आकृतियाँ हाथ फैलाए बाहर झपट रहीं थीं।
उनकी आँखों में सदियों की भूख थी।
दिन 32
मैं दरवाज़े के सामने खड़ा था।
मेरे हाथ अपने आप उठे।
जैसे कोई अदृश्य शक्ति मुझे चला रही हो।
दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
भीतर से इतनी ठंडी हवा आई कि मेरी साँस जम गई।
और फिर… वह बाहर आया।
राघव।
दिन 33
राघव की आँखें अंगारों की तरह जल रही थीं।
उसका चेहरा हड्डियों और मांस का मिला-जुला रूप था।
लेकिन उसकी हँसी…
वह हँसी इंसान की नहीं थी।
हवेली की दीवारें तक काँप उठीं।
वह बोला –
“आख़िरकार… मैं लौट आया।”
दिन 34
मेरे शरीर ने मेरा साथ छोड़ दिया।
मेरे हाथ काँप रहे थे, लेकिन मैं भाग नहीं पाया।
राघव ने मेरा माथा पकड़ा और फुसफुसाया –
“अब तू मेरा है।”
अचानक मेरी आँखों में अंधेरा छा गया।
मैं गिर पड़ा।
दिन 35
जब होश आया, मैं तहख़ाने के भीतर था।
चारों ओर हड्डियों के ढेर पड़े थे।
वे सब पहले वाले थे, जिन्होंने दरवाज़ा खोला था।
और अब… मैं भी उनमें से एक बनने वाला था।
राघव ने मुझे ज़ंजीरों से बाँध दिया।
दिन 36
राघव ने अपनी कहानी सुनाई।
वह बोला –
“मैं मौत से भी बड़ा तांत्रिक हूँ।
मुझे हवेली ने कैद किया था, इंसानों ने नहीं।
अब मैं आज़ाद हूँ।
और तू… मेरा वाहक बनेगा।”
उसकी आवाज़ मेरे दिमाग़ में गूँज रही थी।
दिन 37
मैंने ज़ंजीरों से छूटने की कोशिश की।
लेकिन जैसे ही हिला, मेरी त्वचा जलने लगी।
यह साधारण ज़ंजीर नहीं थी।
यह शापित लोहे की थी।
राघव हँसता रहा –
“भागने की कोशिश मत कर।
अब तू ही मेरी आत्मा का पात्र है।”
दिन 38
रात को मैंने महसूस किया कि मेरे शरीर में कुछ बदल रहा है।
मेरी नसों में काला धुआँ दौड़ने लगा।
मेरे हाथों पर अजीब चिन्ह उभर आए।
राघव बोला –
“ये तेरी नई पहचान है।
अब तू इंसान नहीं… मेरा शिष्य है।”
दिन 39
मेरी आँखें अब अँधेरे में भी सब देख लेती हैं।
मेरे कान दूर-दराज़ की आवाज़ें सुन सकते हैं।
लेकिन साथ ही मेरे भीतर एक भूख बढ़ रही है।
खून की भूख।
मैं डर गया हूँ… कहीं मैं सच में राक्षस न बन जाऊँ।
दिन 40
आज गाँव के दो लोग हवेली के पास आए।
वे शायद मुझे ढूँढने आए थे।
राघव ने मुझे आदेश दिया –
“जा, उन्हें भीतर बुला।”
मैंने विरोध किया।
पर मेरे पैरों ने मेरी नहीं सुनी।
मैंने उन्हें हवेली में बुला लिया।
और अगले ही पल… उनकी चीखें हवेली में गूँज उठीं।
दिन 41
रात को नींद नहीं आई।
उनकी चीखें अब भी मेरे कानों में गूँज रही हैं।
मैंने सोचा – काश मैं बचा पाता।
पर मेरा शरीर अब मेरा नहीं रहा।
मैं कठपुतली बन चुका हूँ।
दिन 42
आज मैंने आईने में खुद को देखा।
मेरे चेहरे पर राघव का चेहरा उभर आया।
कभी मैं था, कभी वह।
अब पहचान धुंधली हो रही है।
मैं कौन हूँ?
अरविंद… या राघव?
दिन 43
राघव बोला –
“बस कुछ और दिन, फिर तेरा शरीर पूरी तरह मेरा हो जाएगा।”
मैंने चिल्लाकर कहा – “नहीं!”
लेकिन वह हँसा और बोला –
“तेरी चीखें अब तेरी नहीं रहीं।
वे भी मेरी हो चुकी हैं।”
दिन 44
आज तहख़ाने से और भी आत्माएँ बाहर निकलीं।
वे सब हवेली में घूम रही थीं।
दीवारों से खून टपक रहा था।
गाँव की ओर से ढोल-नगाड़ों की आवाज़ आई।
शायद लोग फिर से तांत्रिक को कैद करने की कोशिश करेंगे।
पर अब… बहुत देर हो चुकी है।
दिन 45
मेरे भीतर का इंसान धीरे-धीरे मर रहा है।
मैंने डायरी का ये पन्ना आख़िरी बार लिखा।
अगर कोई इसे पढ़े तो समझ लेना –
हवेली अब खुल चुकी है।
राघव लौट आया है।
और मैं…
मैं अब सिर्फ उसका पात्र हूँ।
दिन 46
आज पहली बार हवेली की दीवारें खुद रोने लगीं।
उनसे टपकता खून ज़मीन में समा गया।
और फिर धरती से धुआँ उठने लगा।
राघव बोला –
“यह संकेत है।
अब हवेली का श्राप गाँव तक पहुँचेगा।”
दिन 47
गाँव के चौकीदार ने हवेली से उठते धुएँ को देखा।
उसने ढोल बजाकर लोगों को बुलाया।
सारे गाँव वाले इकट्ठा हुए।
कोई बोला – “वहाँ से शैतान उठ रहा है।”
कोई बोला – “अरविंद को बचाना होगा।”
लेकिन किसी की हिम्मत हवेली में जाने की नहीं हुई।
दिन 48
राघव ने मुझे हवेली की सबसे ऊँची मीनार पर खड़ा किया।
उसने मेरे हाथ फैलाए।
और मेरी आँखों से काला धुआँ निकलकर आसमान में भर गया।
पूरा गाँव उस धुएँ से ढक गया।
बच्चे रोने लगे।
पशु भागने लगे।
और औरतें मंदिर में शरण लेने लगीं।
दिन 49
गाँव के पुजारी पंडित शिवनारायण ने कहा –
“यह कोई साधारण भूत नहीं है।
यह तांत्रिक राघव है।
हमें मिलकर इसे रोकना होगा।”
उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन करने का आदेश दिया।
गाँव वाले काँपते हुए लकड़ियाँ और घी लाने लगे।
दिन 50
राघव ने मुझे कहा –
“जा, उस यज्ञ को रोक।”
मेरे पैरों ने गाँव की ओर कदम बढ़ा दिए।
गाँव वाले मुझे देखकर चौंक गए।
वे बोले – “अरविंद! तू जिंदा है!”
लेकिन मेरी आँखें…
वे मेरी नहीं थीं।
दिन 51
मैंने यज्ञ की आग पर हाथ रखा।
आग तुरंत बुझ गई।
गाँव वाले दहशत में भागने लगे।
पंडित शिवनारायण ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।
लेकिन उनकी आवाज़ काँप रही थी।
मैं उन पर झपटा…
पर तभी मंदिर की घंटियाँ बज उठीं।
दिन 52
घंटियों की आवाज़ सुनते ही मेरे भीतर का अरविंद चीख उठा।
एक पल के लिए मेरा शरीर रुक गया।
मैंने खुद को रोका और कहा –
“भागो… सब भागो…”
गाँव वाले भाग गए।
पर राघव मेरी चीख पर हँस रहा था।
“तू बेकार कोशिश कर रहा है, अरविंद।”
दिन 53
गाँव अब वीरान हो गया है।
सिर्फ हवेली और मंदिर की घंटियाँ बजती हैं।
पंडित शिवनारायण ने तय किया कि वे अगली पूर्णिमा पर हवेली में प्रवेश करेंगे।
वे बोले – “यह हमारी अंतिम कोशिश होगी।”
गाँव वालों की आँखों में डर और उम्मीद दोनों थे।
दिन 54
राघव ने हवेली के तहख़ाने को और बड़ा कर दिया।
दीवारें टूटकर खुद-ब-खुद फैल रही थीं।
अब तहख़ाना हवेली से निकलकर ज़मीन के नीचे पूरे गाँव तक फैल रहा है।
उसने कहा –
“जल्द ही पूरा गाँव मेरा कैदख़ाना होगा।”
दिन 55
मैंने महसूस किया कि तहख़ाने से निकलती आत्माएँ अब घर-घर भटकने लगी हैं।
किसी के दरवाज़े पर खटखटाहट,
किसी की खिड़की से आती परछाईं।
गाँव वालों की नींद उड़ गई है।
कोई बीमार हो गया है, कोई अचानक लापता।
राघव का आतंक बढ़ता जा रहा है।
दिन 56
पंडित शिवनारायण ने आख़िरी बार सभा बुलाई।
उन्होंने कहा –
“हम या तो मरेंगे… या इसे रोकेंगे।”
गाँव के बीस बहादुर लोग मशाल लेकर तैयार हुए।
वे सब हवेली की ओर चल पड़े।
उनकी आँखों में डर था, पर कदम मज़बूत।
दिन 57
राघव ने मुझे हवेली के दरवाज़े पर खड़ा किया।
गाँव वाले मुझे देखकर रुक गए।
उन्होंने पुकारा – “अरविंद, हमें साथ चल!”
मैं चिल्लाना चाहता था – “हाँ!”
लेकिन मेरे होंठ बोले –
“यहाँ से लौट जाओ, वरना मरोगे।”
दिन 58
गाँव वाले नहीं माने।
उन्होंने मंत्र पढ़ते हुए हवेली में प्रवेश किया।
जैसे ही वे भीतर आए, दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
दीवारों से खून की धार बहने लगी।
तहख़ाने से चीखों का सैलाब उठा।
और राघव ने कहा –
“अब खेल शुरू होगा।”
दिन 59
हवेली के हर कमरे में परछाइयाँ नाच रही थीं।
मशालें खुद-ब-खुद बुझ रही थीं।
गाँव वाले मंत्र पढ़ते हुए आगे बढ़ते रहे।
वे तहख़ाने के दरवाज़े तक पहुँचे।
लेकिन जैसे ही उसे छुआ –
दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल गया।
दिन 60
तहख़ाने से हज़ारों हाथ बाहर निकले।
वे सब गाँव वालों को पकड़ने लगे।
किसी के गले पर, किसी के पैरों पर।
चीखें हवेली में गूँज उठीं।
राघव ठहाके मार रहा था।
और मैं…
मैं अंदर ही अंदर रो रहा था।
दिन 61
पंडित शिवनारायण ने अपनी आख़िरी ताक़त जुटाई।
उन्होंने अपने खून से मंत्र लिखा और हवा में उछाल दिया।
अचानक हवेली की दीवारें काँपने लगीं।
राघव का चेहरा बिगड़ गया।
उसने मुझे देखा और कहा –
“उसे मार दे!”
लेकिन मेरे हाथ… काँप रहे थे।
दिन 62
मैंने पंडित पर वार करने के बजाय राघव पर झपट्टा मारा।
एक पल के लिए मेरे शरीर ने मेरा साथ दिया।
राघव चीखा –
“धोखा! तूने मुझे धोखा दिया!”
लेकिन अगली ही साँस में…
उसने मेरे सीने में हाथ डाल दिया।
दिन 63
मैं गिर पड़ा।
मेरे चारों ओर अंधेरा था।
राघव मेरी आत्मा को खींच रहा था।
पंडित मंत्र पढ़ते रहे।
हवेली की दीवारें टूटने लगीं।
आत्माएँ चीख-चीखकर बाहर भागीं।
और मेरे कानों में बस एक ही आवाज़ गूँज रही थी –
“अरविंद… अब तू मेरा है।”
दिन 64
मैं ज़मीन पर पड़ा था।
मेरे सीने में राघव का हाथ धँसा हुआ था।
वह मेरी आत्मा खींच रहा था।
मुझे लग रहा था, सब खत्म हो गया।
दिन 65
लेकिन तभी…
हवेली की दीवारें पूरी ताक़त से हिलने लगीं।
छत से पत्थर गिरने लगे।
चीखों का तूफ़ान तहख़ाने से बाहर आया।
और सब ओर अंधेरा छा गया।
दिन 66
पंडित शिवनारायण ने अपने आख़िरी श्वास से मंत्र पढ़ा –
“ॐ क्षत्र-नाशकाय नमः…”
उनकी आवाज़ से हवेली की नींव दरक गई।
राघव बौखला उठा।
उसने कहा – “नहीं! यह असंभव है!”
दिन 67
मेरे भीतर का अरविंद जागा।
मेरे हाथ काँपते हुए उठे।
मैंने राघव की कलाई पकड़ ली।
और अपनी आख़िरी ताक़त से उसे तहख़ाने की ओर धकेल दिया।
वह चिल्लाता हुआ अंदर गिर पड़ा।
दिन 68
तहख़ाने से आग की लपटें उठीं।
हज़ारों हाथ राघव को पकड़ने लगे।
अब वही आत्माएँ उसे खींच रही थीं।
वह चीख रहा था –
“अरविंद! मुझे बचा ले…!”
पर मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
दिन 69
हवेली ज़ोर से काँपी।
गाँव वाले भागकर बाहर निकल आए।
पंडित शिवनारायण जमीन पर गिरे पड़े थे, पर उनके होंठ अब भी मंत्र जप रहे थे।
अचानक तहख़ाने का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
और पूरा हवेली का ढांचा ध्वस्त हो गया।
दिन 70
जब धूल बैठी…
तो हवेली की जगह सिर्फ़ मलबा था।
गाँव वाले रोते-रोते एक-दूसरे से लिपट गए।
उन्होंने कहा –
“श्राप टूट गया… राघव चला गया।”
दिन 71
लेकिन मैं?
मैं अब इंसान नहीं रहा।
मेरी आत्मा अधूरी थी।
मैं गाँव के बीच खड़ा था, पर मेरी छाया ज़मीन पर नहीं पड़ रही थी।
सब मुझे घूर रहे थे।
दिन 72
पंडित शिवनारायण ने मुझे देखा और कहा –
“बेटा, तूने गाँव को बचाया है।
पर तू अब इस धरती पर टिक नहीं पाएगा।”
मेरी आँखों में आँसू थे।
मैं अपने घर को देख रहा था…
पर मैं अब लौट नहीं सकता था।
दिन 73
गाँव वाले मेरी चिता तैयार करने लगे।
पर यह चिता मेरे शरीर की नहीं, मेरी आत्मा की थी।
उन्होंने मंत्रों के साथ अग्नि प्रज्वलित की।
मैं धीरे-धीरे उस अग्नि में समाने लगा।
और मेरे होंठों से बस एक ही शब्द निकला –
“विदा…”
दिन 74
जैसे ही मेरी आत्मा अग्नि में समाई,
हवेली का सारा मलबा खुद-ब-खुद राख में बदल गया।
गाँव में पहली बार शांति छा गई।
पंछी फिर से लौट आए।
और झील का पानी निर्मल हो गया।
दिन 75
गाँव वाले अब भी डरते हैं।
कोई हवेली की राख के पास नहीं जाता।
रात को जब हवा चलती है,
तो राख से कभी-कभी एक आवाज़ आती है –
“अरविंद…”
शायद मेरी आत्मा अब भी वहीं है।
दिन 76 (अंतिम पन्ना)
मैं यह आख़िरी पन्ना लिख रहा हूँ।
अब मेरे पास कोई और दिन नहीं बचा।
मेरी आत्मा अग्नि में समा चुकी है।
लेकिन अगर कभी कोई इस तहख़ाने की राख को छेड़ेगा…
तो राघव का श्राप…
फिर से जाग उठेगा।