अरण्य के भीतर

अध्याय 1 — सफ़र की शुरुआत

बरसात का मौसम था।
चार दोस्त — रवि, निखिल, सीमा और प्रिया — ने सोचा कि
शहर की भीड़-भाड़ से दूर एक वीकेंड ट्रिप पर जाएँगे।

निखिल के पास एक पुरानी जीप थी।
सबने तय किया कि इस बार वो अरण्य वन्यजीव अभयारण्य जाएंगे,
जहाँ बहुत कम लोग जाते हैं।

गाँव के लोगों ने चेतावनी दी —
“बारिश में वहाँ मत जाना… रात को रास्ते ग़ायब हो जाते हैं।”
लेकिन दोस्तों ने हँसकर इसे अंधविश्वास मान लिया।


अध्याय 2 — जंगल का प्रवेश द्वार

शाम 6 बजे,
जीप जंगल के गेट तक पहुँची।
बारिश की हल्की बूँदें गिर रही थीं,
और आसमान में बादलों की गड़गड़ाहट गूँज रही थी।

गेट पर एक बूढ़ा चौकीदार बैठा था।
उसने चारों को घूरकर देखा और कहा —
“अंदर जाना है तो सूरज ढलने से पहले लौट आना…
वरना अरण्य तुम्हें अपना लेगा।”


अध्याय 3 — भीतर की खामोशी

जैसे ही जीप ने कच्चा रास्ता पकड़ा,
जंगल की आवाज़ें बदलने लगीं।
दिन में चहचहाने वाले पक्षी चुप थे,
बस कहीं दूर से पानी की तेज़ धार बहने की आवाज़ आ रही थी।

सीमा ने धीरे से कहा —
“मुझे ये जगह अजीब लग रही है…”

निखिल ने मजाक किया —
“अरे, ये तो रोमांच है। डर मत।”


अध्याय 4 — रास्ते का बदलना

लगभग 40 मिनट बाद,
उन्होंने सोचा कि वापसी का समय हो गया है।
लेकिन…
वो जिस रास्ते से आए थे, वो कहीं दिख नहीं रहा था।

कच्चा ट्रैक अब दो हिस्सों में बँट चुका था —
एक बाईं ओर, जो और गहरा जंगल था,
और एक दाईं ओर, जो दलदली ज़मीन की तरफ जाता था।

किस ओर जाएँ, कोई समझ नहीं पा रहा था।


अध्याय 5 — अजनबी की मदद

तभी,
पेड़ों के बीच से एक आदमी आया।
उसके कपड़े फटे हुए थे,
चेहरा मिट्टी से सना, और आँखें लाल।

“आप लोग रास्ता ढूँढ रहे हैं?” उसने पूछा।

रवि ने जल्दी से कहा —
“हाँ, जीप का रास्ता भूल गए हैं।”

अजनबी मुस्कुराया —
“मैं ले चलता हूँ… लेकिन एक शर्त है —
रास्ते में पीछे मुड़कर मत देखना।”


अध्याय 6 — अनदेखी परछाइयाँ

चारों उसके पीछे-पीछे चलने लगे।
बारिश तेज़ हो चुकी थी।
कभी-कभी पत्तों के बीच से उन्हें लगता,
कोई उनका पीछा कर रहा है।

प्रिया ने कान में कहा —
“रवि, तुम्हें भी कदमों की आवाज़ सुनाई दे रही है?”
रवि ने सिर हिलाया।

लेकिन उन्होंने पीछे नहीं देखा…
क्योंकि अजनबी की शर्त याद थी।


अध्याय 7 — झोपड़ी

करीब आधे घंटे बाद,
वे एक टूटी-फूटी झोपड़ी के सामने पहुँचे।
अजनबी ने कहा —
“यहाँ रात बिताओ… सुबह मैं रास्ता दिखा दूँगा।”

उसने झोपड़ी का दरवाज़ा खोला और अंदर चला गया।
अंदर अंधेरा और सीलन थी,
लेकिन जमीन पर पहले से चार बिछौने बिछे हुए थे…
मानो कोई उनका इंतज़ार कर रहा हो।


अध्याय 8 — रात की फुसफुसाहट

मध्यरात्रि के आसपास,
सीमा की नींद खुली।
उसने देखा —
अजनबी कोने में बैठा है, और खुद से कुछ बड़बड़ा रहा है।

“ये सब आज लौट जाएँगे… नहीं, इन्हें यहीं रखना होगा…”
उसकी आवाज़ फटी हुई थी।

सीमा ने रवि को जगाया।
जब दोनों ने कोने की तरफ देखा…
वो जगह खाली थी।


अध्याय 9 — गुमशुदा दोस्त

सुबह,
प्रिया गायब थी।
उसका बिछौना ठंडा था,
और दरवाज़ा आधा खुला हुआ।

निखिल पागलों की तरह उसका नाम पुकारने लगा।
तभी,
जंगल के अंदर से किसी महिला की हँसी सुनाई दी —
लेकिन वो हँसी प्रिया की नहीं थी।


अध्याय 10 — सच्चाई का पता

रवि ने झोपड़ी के पीछे देखा।
वहाँ गीली मिट्टी में कई पुराने पैरों के निशान थे,
जो दलदल की ओर जा रहे थे।

कुछ कदम बाद,
उसे एक टूटा हुआ ब्रेसलेट मिला —
जो कल रात प्रिया के हाथ में था।

सीमा ने काँपते हुए कहा —
“हम यहाँ से अभी निकलते हैं…”

अध्याय 11 — दलदल की तरफ़

चारों में अब सिर्फ़ तीन बचे थे —
रवि, निखिल, और सीमा।

निखिल पागलपन की हालत में था —
“मुझे प्रिया चाहिए… मैं उसे ढूँढूँगा!”

वो बिना सोचे-समझे दलदल की ओर भागने लगा।
रवि और सीमा पीछे-पीछे दौड़े।

जैसे-जैसे वो दलदल के पास पहुँचे,
एक बदबूदार, सड़ी हुई हवा ने उन्हें घेर लिया।


अध्याय 12 — दलदल की आँखें

दलदल के पानी में बुलबुले उठ रहे थे।
तभी…
दो पीली-सी चमकती आँखें सतह पर उभरीं।

निखिल चिल्लाया —
“प्रिया! तुम हो न?”

लेकिन पानी से जो निकला…
वो इंसान नहीं था।
काले कीचड़ से ढका, लंबे बालों वाला,
चेहरे पर सूखी त्वचा लटक रही थी।


अध्याय 13 — हमला

वो भूतिया आकृति बिजली की गति से निखिल की तरफ़ बढ़ी।
रवि ने उसका हाथ खींचा,
लेकिन दलदल कीचड़ में उनके पैर फँस गए।

सीमा ने पास पड़ी एक सूखी डाल उठाई और पूरी ताकत से उस आकृति पर मारी।
एक भयानक चीख गूँजी,
और वो आकृति पानी में वापस समा गई।


अध्याय 14 — बूढ़े की वापसी

तभी,
पीछे से वही बूढ़ा चौकीदार आ गया,
जिसने गेट पर चेतावनी दी थी।

“तुमने मेरी बात नहीं मानी… अब जंगल तुम्हें छोड़ने वाला नहीं।”

उसने जल्दी से एक मुट्ठी पीली मिट्टी दलदल में फेंकी,
और पानी शांत हो गया।


अध्याय 15 — छिपी कहानी

बूढ़े ने उन्हें पास की एक चट्टान पर बैठाया।
उसकी आवाज़ भारी थी —

“सालों पहले यहाँ एक शिकारी अपनी पत्नी और बेटी के साथ रहता था।
एक दिन, कुछ यात्रियों ने उसकी बेटी का अपहरण किया…
वो दलदल में मारी गई।
तब से, उनकी आत्माएँ रास्ता भटकाने और लोगों को दलदल में खींचने लग गईं।”


अध्याय 16 — दूसरी रात

बारिश थम चुकी थी,
लेकिन जंगल की खामोशी और भी डरावनी हो गई थी।

बूढ़े ने कहा —
“रात का सफ़र मना है।
सूरज उगने तक पास की पहाड़ी पर रुकना होगा।”

तीनों ने चुपचाप उसकी बात मानी।
लेकिन रात के बीच…
फिर वही महिला की हँसी गूँजी।


अध्याय 17 — निखिल का गायब होना

सुबह,
अब निखिल भी ग़ायब था।
उसकी जगह, बस एक गीला, कीचड़ से सना जैकेट पड़ा था।

सीमा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“हम सब ख़त्म हो जाएँगे, रवि…”

रवि ने कसम खाई —
“नहीं, मैं तुम्हें लेकर यहाँ से निकलूँगा।”


अध्याय 18 — जंगल का असली चेहरा

जैसे-जैसे वे पहाड़ी से नीचे उतर रहे थे,
जंगल बदल रहा था।
पेड़ मुड़कर अजीब आकार ले रहे थे,
जड़ें साँपों जैसी हिल रही थीं।

सीमा ने धीरे से कहा —
“ये जंगल… ज़िंदा है।”


अध्याय 19 — आत्माओं का घेरा

अचानक,
सैकड़ों परछाइयाँ पेड़ों के बीच से निकल आईं।
सबकी आँखें पीली, और चेहरे विकृत।

सीमा और रवि ने पीछे हटने की कोशिश की,
लेकिन वो हर दिशा से घिर चुके थे।

तभी,
एक परिचित चेहरा सामने आया —
वो प्रिया थी…
लेकिन उसकी आँखों में इंसानी चमक नहीं थी।


अध्याय 20 — अंत या शुरुआत?

प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा —
“तुम दोनों अब अरण्य के हो…”

उसके शब्दों के साथ ही,
सीमा का हाथ बर्फ़ की तरह ठंडा हो गया।
रवि ने देखा — उसकी आँखें भी पीली हो चुकी थीं।

अब जंगल में बस रवि अकेला इंसान था…
और वो भी धीरे-धीरे पीला होने लगा।


अंतिम पंक्तियाँ

आज भी,
बरसात की रातों में अगर आप अरण्य जंगल में जाते हैं,
तो आपको चार लोगों की हँसी सुनाई देती है।
कोई कहता है — वो दोस्त हैं, जो हमेशा खोए रहेंगे।
कोई कहता है — वो नए शिकार की तलाश में हैं।

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