अध्याय 1 — भुला हुआ स्टेशन
राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा के पास,
सूखी ज़मीनों और वीरान जंगलों के बीच एक पुराना रेल स्टेशन था — कालसराय जंक्शन।
यह स्टेशन अब किसी मानचित्र में नहीं मिलता,
क्योंकि आधिकारिक तौर पर इसे 1985 में बंद कर दिया गया था।
लेकिन…
गाँव के बुजुर्ग कहते हैं,
“रात के ठीक 12 बजे, वहाँ एक ट्रेन अब भी रुकती है।”
अध्याय 2 — अनिल की जिज्ञासा
अनिल, एक युवा पत्रकार, अजीब घटनाओं पर लेख लिखता था।
एक दिन उसे कालसराय की कहानी मिली —
“भूतिया ट्रेन, गायब यात्री, और एक स्टेशन मास्टर जो 40 साल बाद भी ड्यूटी पर है…”
उसने तय किया कि वो खुद वहाँ जाकर देखेगा।
गाँव वालों ने उसे रोका —
“बेटा, आधी रात तक वहाँ रुके तो सुबह नहीं देख पाओगे।”
लेकिन अनिल ने कैमरा, टॉर्च, और नोटबुक उठाई…
और अकेले कालसराय के लिए निकल पड़ा।
अध्याय 3 — रास्ते का सन्नाटा
रात 11 बजे अनिल स्टेशन पहुँचा।
टूटा हुआ वेटिंग हॉल, ज़ंग लगे बोर्ड पर धुंधला-सा लिखा —
“कालसराय जं.”
हवा में अजीब-सी सीलन की गंध थी।
दूर तक कोई इंसान नहीं दिख रहा था…
बस, प्लेटफ़ॉर्म पर एक पुराना लालटेन टिमटिमा रहा था।
अनिल ने सोचा —
“शायद कोई चौकीदार होगा।”
अध्याय 4 — स्टेशन मास्टर
प्लेटफ़ॉर्म के एक छोर पर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था,
पुरानी खाकी वर्दी, लाल पगड़ी, और हाथ में हरी झंडी।
“आप यहाँ के स्टेशन मास्टर हैं?”
अनिल ने पूछा।
बूढ़ा मुस्कुराया —
“हाँ… और मेरी ट्रेन आने वाली है।”
अनिल ने हँसकर कहा —
“लेकिन ये स्टेशन तो बंद है…”
बूढ़े की मुस्कान गायब हो गई।
“बंद है… लेकिन हमारे लिए नहीं।”
अध्याय 5 — ट्रेन का आगमन
रात के ठीक 12 बजे,
दूर से सीटी की आवाज़ आई।
पटरियाँ काँपने लगीं, हवा में धुआँ भरने लगा।
धीरे-धीरे एक काली, पुरानी भाप इंजन वाली ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आकर रुकी।
लेकिन… इसमें सवार यात्री इंसान जैसे नहीं लग रहे थे।
उनके चेहरे फीके, आँखें गहरी काली, और चाल धीमी-धीमी थी।
बूढ़ा स्टेशन मास्टर हरी झंडी लहराने लगा।
अध्याय 6 — रहस्यमय यात्री
एक महिला, पुराने ज़माने की साड़ी में, अनिल के पास आई।
उसने धीमी आवाज़ में कहा —
“क्या तुम भी सफ़र करोगे? टिकट चाहिए?”
अनिल हक्का-बक्का रह गया।
“ये ट्रेन कहाँ जाती है?”
वो मुस्कुराई —
“जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।”
अध्याय 7 — आखिरी डिब्बा
अनिल का दिल तेजी से धड़कने लगा।
लेकिन पत्रकार का जिज्ञासु मन उसे रोक नहीं पाया।
वो कैमरा लेकर ट्रेन के आखिरी डिब्बे में चढ़ गया।
अंदर धुँधला-सा धुआँ था।
सीटों पर लोग चुपचाप बैठे थे —
कुछ के शरीर में छेद थे, कुछ की गर्दन टेढ़ी,
और कुछ के कपड़े खून से सने थे।
जैसे ही अनिल ने तस्वीर लेने के लिए कैमरा उठाया,
एक यात्री ने फुसफुसाया —
“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”
अध्याय 8 — वापसी का दरवाज़ा
अनिल ने उतरने की कोशिश की,
लेकिन दरवाज़ा बाहर से बंद हो चुका था।
ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।
खिड़की से उसने देखा —
स्टेशन मास्टर अब प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं था…
वो ट्रेन के इंजन पर चढ़ चुका था।
अध्याय 9 — अंधेरे की सुरंग
ट्रेन एक लंबी सुरंग में दाखिल हुई।
जैसे ही अंधेरा पूरी तरह घिरा,
यात्रियों के चेहरे बदलने लगे —
अब वे इंसान नहीं, बल्कि हड्डियों के ढाँचे थे।
एक ने अनिल की तरफ हाथ बढ़ाया,
उसकी हड्डीदार उंगलियाँ ठंडी और सख़्त थीं।
“अब तुम हमारे साथ हमेशा रहोगे…”
अध्याय 10 — स्टेशन मास्टर का सच
अचानक ट्रेन रुक गई।
स्टेशन मास्टर अंदर आया और बोला —
“तुम्हें नहीं लेना चाहिए था…
लेकिन अब तुम लेट हो चुके हो।”
अनिल ने कांपते हुए पूछा —
“ये ट्रेन कहाँ जाती है?”
स्टेशन मास्टर ने हँसकर कहा —
“कालसराय का मतलब जानते हो?
क़ाल का सराय… मौत का ठिकाना।”
अध्याय 11 — चलती ट्रेन में अजनबी
ट्रेन फिर से चल पड़ी।
अनिल खिड़की से बाहर झाँकने की कोशिश कर रहा था,
लेकिन बाहर सिर्फ काला धुआँ और अंधेरा था,
जैसे ट्रेन किसी दुनिया से बाहर की जगह जा रही हो।
उसके सामने वाली सीट पर एक बूढ़ी औरत बैठी थी।
उसका चेहरा झुर्रियों से भरा,
लेकिन उसकी आँखें…
सीधे अनिल के सीने में उतर रही थीं।
वो बोली —
“तुम्हारे पास अभी भी एक मौका है…
अगले स्टेशन पर उतर जाओ।”
अध्याय 12 — अगला स्टेशन?
अनिल ने डरते हुए पूछा —
“अगला स्टेशन कहाँ है?”
बूढ़ी औरत की आवाज़ गहरी हो गई —
“वापसी का कोई स्टेशन नहीं…
लेकिन कुछ लोग छलांग लगाकर बचते हैं।”
उसी समय डिब्बे के दूसरे छोर से एक चीख गूँजी।
अनिल ने देखा —
एक यात्री, जो अभी कुछ पल पहले जिंदा था,
अब सिर्फ धुएँ का गुबार बन चुका था।
अध्याय 13 — रहस्यमयी टिकट
बूढ़ी औरत ने अनिल की हथेली में एक पुराना, पीला काग़ज़ रखा।
उस पर लाल स्याही से लिखा था — “कालसराय से मुक्ति”।
“जब समय आए, इसे फाड़ देना…
लेकिन उससे पहले, तुम जो देखोगे… वो तुम्हारे साथ हमेशा रहेगा।”
अनिल ने काग़ज़ जेब में रख लिया।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये सच में मदद है या कोई और जाल।
अध्याय 14 — गुमशुदा डिब्बा
ट्रेन एक झटके से रुकी,
और जब फिर चली…
अनिल ने महसूस किया कि बीच का एक डिब्बा गायब हो चुका था।
सीटें खाली थीं, लेकिन हवा में फुसफुसाहट गूँज रही थी।
“हम यहाँ हैं… बस दिखाई नहीं दे रहे।”
अनिल का कैमरा अपने आप चालू हो गया और फ्लैश हुआ।
तस्वीर में दर्जन भर चेहरे थे…
लेकिन वहाँ असल में कोई नहीं था।
अध्याय 15 — अगमपुर का प्लेटफ़ॉर्म
ट्रेन एक छोटे-से स्टेशन पर रुकी — अगमपुर।
प्लेटफ़ॉर्म पर टूटा हुआ घड़ी टॉवर था,
और वहाँ खड़े सभी यात्री बिना पलक झपकाए ट्रेन को देख रहे थे।
स्टेशन मास्टर चिल्लाया —
“सिर्फ चुने हुए उतर सकते हैं!”
एक-एक कर यात्री उतरने लगे,
और जैसे ही प्लेटफ़ॉर्म पर पैर रखते,
वे धूल में बदल जाते।
अध्याय 16 — छलांग का प्रस्ताव
बूढ़ी औरत ने फिर कहा —
“ये तुम्हारा मौका है… कूद जाओ!”
अनिल का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
उसने खिड़की से बाहर देखा —
नीचे सिर्फ धुँध और काले पानी जैसा कुछ था।
“अगर कूदा और मर गया तो?”
अनिल ने पूछा।
वो बोली —
“अगर नहीं कूदा… तो मरकर भी चैन नहीं मिलेगा।”
अध्याय 17 — इंजन का रहस्य
अनिल ने तय किया कि उसे सच्चाई जाननी है।
वो धीरे-धीरे डिब्बों से होते हुए इंजन की तरफ बढ़ा।
जैसे ही इंजन का दरवाज़ा खोला,
उसकी साँस रुक गई —
स्टेशन मास्टर इंजन चला रहा था,
लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं,
और शरीर आधा पारदर्शी।
“स्वागत है… अब तुम मेरे स्थायी यात्री हो,”
उसने कहा।
अध्याय 18 — आत्माओं का सौदा
स्टेशन मास्टर ने बताया —
“हर सौ साल में, मुझे सौ आत्माएँ ले जानी होती हैं…
वरना मैं खुद नर्क में चला जाऊँगा।”
अनिल कांप गया —
“तो तुम मुझे उनमें शामिल करोगे?”
वो हँसा —
“नहीं… तुम मेरी जगह लोगे।”
अध्याय 19 — शक्ति का हस्तांतरण
अचानक ट्रेन के डिब्बे खाली होने लगे,
सिर्फ धुआँ और ठंड रह गई।
स्टेशन मास्टर ने अनिल का हाथ पकड़ा,
और उसकी हथेली में जलता हुआ टिकट रख दिया।
“अब ये ट्रेन तुम्हारी है,”
उसने कहा,
और उसका शरीर धुएँ में बदल गया।
अध्याय 20 — अनचाहा मालिक
अनिल इंजन की सीट पर बैठा था,
लेकिन उसकी उंगलियाँ अपने आप लीवर खींच रही थीं।
ट्रेन अंधेरे में और तेज़ दौड़ने लगी।
उसकी आँखें जलने लगीं,
और वो समझ गया —
अब वो खुद इस श्राप का हिस्सा बन चुका है।
अध्याय 21 — पहला शिकार
कुछ घंटों बाद, ट्रेन एक अनजान स्टेशन पर रुकी।
वहाँ एक अकेला यात्री खड़ा था,
कंधे पर बैग, चेहरा थका हुआ।
अनिल ने खुद को बोलते सुना —
“ट्रेन में आइए… बहुत देर हो रही है।”
यात्री चढ़ गया।
दरवाज़ा बंद होते ही, अनिल ने महसूस किया —
पहला शिकार मिल गया है।
अध्याय 22 — कालसराय की गूंज
हर बार जब ट्रेन रुकती,
एक नया यात्री चढ़ता, और फिर हमेशा के लिए गुम हो जाता।
अनिल के दिमाग़ में अब भी बूढ़ी औरत के शब्द गूँज रहे थे —
“जो देखोगे… वो तुम्हारे साथ हमेशा रहेगा।”
अध्याय 23 — अंतिम सच
कई साल बाद, एक पत्रकार कालसराय की खोज में आया।
वो प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचा,
जहाँ एक जवान स्टेशन मास्टर खाकी वर्दी में हरी झंडी लिए खड़ा था।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी…
वो अनिल था।
अध्याय 24 — श्राप का चक्र
पत्रकार ने पूछा —
“ये स्टेशन तो बंद है, फिर आप…?”
अनिल ने धीरे से कहा —
“बंद है… लेकिन हमारे लिए नहीं।”
दूर से ट्रेन की सीटी आई,
और कालसराय का चक्र एक बार फिर शुरू हो गया।
अध्याय 25 — कभी न लौटने वाली यात्रा
कहते हैं, आज भी आधी रात को कालसराय जंक्शन पर एक काली ट्रेन आती है।
अगर आपने गलती से उसमें कदम रख दिया,
तो आपका टिकट एक तरफ़ा होगा…
और शायद, अगली बार प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा स्टेशन मास्टर आप होंगे।