शिवपुर का शापित बंगला

अध्याय 1 — गाँव का रहस्य

शिवपुर…
एक छोटा-सा गाँव, जहाँ सूरज ढलते ही सन्नाटा चुपचाप गलियों में उतर आता था।
यहाँ के लोग दिन में हँसते-खेलते दिखते थे,
पर रात होते ही अपने-अपने घरों में दुबक जाते।

गाँव के बीच से होकर एक पगडंडी जाती थी, जो
सीधे पुराने, टूटे-फूटे, बेलों से ढके एक बंगले तक पहुँचती थी।
लोग उसे “काला बंगला” कहते थे।
कहते हैं, वहाँ आधी रात को औरत की चीखें सुनाई देती हैं,
खिड़कियों में किसी का साया हिलता-डुलता है,
और कभी-कभी दरवाज़े अपने आप बंद हो जाते हैं।

गाँव के बुजुर्ग बच्चों को चेतावनी देते —
“शाम ढलने के बाद उस तरफ मत जाना… वहाँ जो है, वो इंसान नहीं है।”


अध्याय 2 — अजय की जिज्ञासा

अजय, शहर से आया हुआ एक युवक, शिवपुर में अपने चाचा के घर रुका था।
वो पेशे से फोटोग्राफर था और अजीबो-गरीब जगहों की तस्वीरें लेने का शौक़ीन।

एक शाम, उसने गाँव के कुछ लड़कों से उस काले बंगले के बारे में सुना।
उनकी कहानियों में डर था, लेकिन अजय की आँखों में चमक थी।
उसने ठान लिया कि वो उस बंगले की रात में तस्वीरें लेगा।

“डर किस बात का? भूत-वूत कुछ नहीं होता,”
अजय ने हँसते हुए कहा।
लेकिन गाँव के लोग बस सिर हिला कर चुप हो गए।


अध्याय 3 — पहला कदम

अगली रात, अजय अपने कैमरे, टॉर्च और ट्राइपॉड के साथ बंगले की ओर चल पड़ा।
रात का समय था, आसमान में चाँद बादलों से छिपा था।
सिर्फ जुगनुओं की हल्की-हल्की रोशनी आसपास झिलमिला रही थी।

बंगले के पास पहुँचते ही हवा ठंडी हो गई।
चारों ओर सन्नाटा…
सिर्फ पुराने पेड़ों की टहनियों की सरसराहट सुनाई दे रही थी।

अजय ने गेट को धक्का दिया।
गेट चरचराते हुए खुला… आवाज इतनी तेज़ कि अजय को लगा मानो पूरी रात ने उसकी हरकत सुन ली हो।


अध्याय 4 — अंदर की दहलीज़

अंदर घुसते ही अजय ने देखा —
टूटी हुई सीढ़ियाँ, फर्श पर बिखरे पुराने बर्तन,
और दीवारों पर धुंधली तस्वीरें, जिनकी आँखें उसे घूरती सी लग रही थीं।

उसने कैमरा निकाला और तस्वीरें लेना शुरू किया।
पहली फ्लैश के साथ ही उसे ऐसा लगा जैसे ऊपर की मंज़िल पर कोई साया हिला हो।
टॉर्च की रोशनी डालकर उसने देखा —
वहाँ कुछ नहीं था।

लेकिन उसके कानों में बहुत हल्की-सी… एक औरत के रोने की आवाज़ आई।


अध्याय 5 — पहली मुलाक़ात

अजय ने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ाया।
लकड़ी की सीढ़ियाँ उसके भार से चरमराईं।
ऊपर पहुँचकर उसने दाईं ओर के कमरे का दरवाज़ा खोला।

कमरे में अंधेरा था।
जैसे ही उसने टॉर्च घुमाई,
कोने में एक सफ़ेद साड़ी में खड़ी औरत दिखाई दी…
उसका चेहरा ढका हुआ था… और पाँव ज़मीन से थोड़े ऊपर।

अजय का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
उसने कैमरे का बटन दबाया —
फ्लैश की रोशनी फैली और जब फिर अंधेरा हुआ…
वो औरत गायब थी।


अध्याय 6 — सच्चाई का अंश

अजय नीचे भागा और हाँफते हुए बाहर निकलने लगा,
तभी पीछे से दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
उसने पूरी ताकत लगाकर उसे खोला,
लेकिन दरवाज़ा टस से मस नहीं हुआ।

तभी…
उसके पीछे एक ठंडी हवा का झोंका आया,
और किसी ने फुसफुसाकर कहा —
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”

अजय ने मुड़कर देखा —
वही औरत, लेकिन अब उसका चेहरा नज़र आ रहा था…
आधा जला हुआ, आँखें लाल, और होंठों से खून टपकता हुआ।

अध्याय 7 — ठंडा स्पर्श

अजय उस औरत के चेहरे को देखकर जड़ हो गया।
उसकी साँसें रुक-सी गईं…
वो चीखना चाहता था, लेकिन गला सूख चुका था।

औरत धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी…
उसके पाँव अब भी ज़मीन को नहीं छू रहे थे।
कमरे की हवा और ठंडी हो गई…
इतनी ठंडी कि अजय की उंगलियाँ सुन्न होने लगीं।

अचानक…
उसका हाथ अजय के कंधे पर आया।
एक बर्फ़ जैसे ठंडा स्पर्श…
और कान में धीमी, पर स्पष्ट आवाज़ —
“मुझे मेरा बच्चा वापस चाहिए…”


अध्याय 8 — अतीत की झलक

अजय के आँखों के सामने अचानक धुंध छा गई।
कमरा गायब हो गया…
अब वह किसी पुराने समय में खड़ा था।

उसने देखा —
वही औरत, सफ़ेद साड़ी में, गर्भवती।
उसके पति का चेहरा गुस्से से भरा हुआ था।
वो आदमी किसी से कह रहा था —
“ये बच्चा मेरा नहीं है… इसे खत्म कर दो!”

फिर…
चीखें…
खून…
और औरत का शव, इसी बंगले के कुएँ में फेंक दिया गया।

अजय का दिल धड़कने लगा —
ये कोई सपना नहीं था, ये उस आत्मा का अतीत था।


अध्याय 9 — वापसी

अचानक धुंध हट गई…
अजय फिर से उसी अंधेरे कमरे में खड़ा था।
लेकिन अब वो औरत करीब थी…
उसकी आँखें अजय की आँखों में धँसती जा रही थीं।

“तुम्हें मेरी मदद करनी होगी…”
उसने कहा, और अजय का कैमरा अपने आप ज़मीन पर गिर गया।

अजय ने हिम्मत करके पूछा —
“मैं… मैं क्या करूँ?”

वो बोली —
“उस कुएँ को खोलो… और मेरा बच्चा ढूँढो।”


अध्याय 10 — कुएँ का रास्ता

अजय ने टॉर्च उठाई और बंगले के पिछवाड़े की ओर बढ़ा।
वहाँ जंग लगी लोहे की जाली से ढका एक पुराना कुआँ था।
जाली पर मोटी-मोटी बेलें लिपटी थीं।

जैसे ही उसने जाली हटाने की कोशिश की…
पीछे से किसी ने जोर से उसका हाथ पकड़ लिया।

अजय ने मुड़कर देखा —
एक बूढ़ा आदमी, लाल आँखें, हाथ में लोहे की छड़ी।
वो गुर्राते हुए बोला —
“ये दरवाज़ा कभी मत खोलना… वरना तुम भी ज़िंदा नहीं बचोगे।”


अध्याय 11 — मना किया गया सच

अजय ने बूढ़े से पूछा —
“तुम कौन हो?”

बूढ़ा हँस पड़ा —
“मैं यहाँ का चौकीदार हूँ… पिछले 40 साल से।”
फिर उसने धीमे स्वर में कहा —
“जिस दिन ये कुआँ खुलेगा… गाँव में खून की बारिश होगी।”

अजय ने कहा —
“लेकिन यहाँ किसी का बच्चा है…”

चौकीदार की आँखें फैल गईं —
“तो उसने तुम्हें देख लिया है… अब तुम कहीं नहीं बचोगे।”


अध्याय 12 — आधी रात का समय

अजय वापस बंगले के भीतर गया।
वो औरत अब सीढ़ियों के पास खड़ी थी…
उसकी उंगलियों से खून टपक रहा था।

“समय कम है… आधी रात होते ही मैं वापस उसी कुएँ में चली जाऊँगी… हमेशा के लिए।”
उसने कहा।

अजय का मन डगमगाने लगा।
एक तरफ चौकीदार की चेतावनी,
दूसरी तरफ उस आत्मा की करुण पुकार।

आधी रात में, चाँद बादलों से निकल आया।
और बंगले में अचानक दरवाज़े अपने आप बंद होने लगे…


अध्याय 13 — कुएँ का खुलना

अजय ने हार मान ली…
वो दौड़कर गया और जाली को तोड़ दिया।
जैसे ही जाली गिरी, कुएँ के भीतर से एक भयानक बदबू आई।

उसने टॉर्च की रोशनी नीचे डाली —
पानी में एक छोटा-सा सफ़ेद कपड़ा तैर रहा था।

अजय ने रस्सी से नीचे उतरना शुरू किया।
नीचे पहुँचकर उसने वो कपड़ा उठाया…
और पाया —
वो एक पुराने जमाने का बच्चों का झूला था, जिसमें हड्डियाँ पड़ी थीं।


अध्याय 14 — अंत का आरंभ

जैसे ही उसने हड्डियों को छुआ,
पूरा बंगला काँपने लगा।
हवा में चीखें गूँजने लगीं…
काले धुएँ के बादल कुएँ से बाहर निकलने लगे।

ऊपर देखा —
वही औरत, अब मुस्कुरा रही थी…
लेकिन वो मुस्कान इंसानी नहीं थी,
उसमें एक दानवी खुशी थी।

“धन्यवाद… अब मैं आज़ाद हूँ।”
उसने कहा।

लेकिन अचानक उसकी आँखें और भी भयानक हो गईं —
“अब इस गाँव के सभी बच्चों की बारी है…”


अध्याय 15 — शिवपुर की रात

अजय ने ऊपर चढ़ने की कोशिश की…
लेकिन रस्सी अपने आप जलने लगी।
नीचे कुएँ का पानी खून में बदल चुका था।

बाहर, गाँव में बच्चों के रोने और चीखने की आवाज़ें आने लगीं।
बंगले की खिड़कियों से लाल रोशनी निकलने लगी।

और उस रात…
शिवपुर में एक भी बच्चा ज़िंदा नहीं बचा।


अध्याय 16 — आज तक…

कहते हैं, शिवपुर अब पूरी तरह वीरान है।
काले बंगले के कुएँ से अब भी बच्चों के रोने की आवाज़ आती है।
और कभी-कभी, रात में कोई अजनबी वहाँ तस्वीर लेने आता है…
तो गाँव के किनारे खड़ा बूढ़ा चौकीदार उसे चुपचाप देखता है…
और जानता है —
“अब एक और आत्मा उस बंगले में फँस जाएगी।”

अध्याय 17 — कुएँ के अंदर की रात

अजय कुएँ में लटकते हुए चीख रहा था।
रस्सी जलकर आधी रह गई थी, नीचे खून का पानी उबल रहा था।
उसने पूरी ताकत लगाकर दीवार पकड़ने की कोशिश की,
लेकिन दीवार पर काई लगी थी — हाथ फिसल गए।

ऊपर से उस औरत की हँसी गूँज रही थी —
“तुम सोचते थे मैं मासूम हूँ?
नहीं… मैं तो बस इंतज़ार कर रही थी…”

अजय समझ चुका था —
उसने गलती से एक ऐसी आत्मा को मुक्त कर दिया है,
जो सिर्फ अपने बदले के लिए जिंदा थी।


अध्याय 18 — अदृश्य हाथ

अचानक कुएँ के अंदर से अदृश्य हाथ निकले…
उन्होंने अजय की गर्दन पकड़ ली और नीचे खींचने लगे।
अजय के पैर खून में डूबने लगे।

जैसे ही उसका चेहरा पानी के करीब पहुँचा,
पानी में उसका प्रतिबिंब बदल गया —
वहाँ अजय की जगह वही औरत का चेहरा दिख रहा था,
जो उसे घूरकर मुस्कुरा रही थी।

उसने कान में फुसफुसाया —
“अब तुम मेरे हो…”


अध्याय 19 — चौकीदार की आखिरी कोशिश

ऊपर खड़ा चौकीदार सब देख रहा था।
उसने लोहे की छड़ी कुएँ में डाली और मंत्र पढ़ने लगा।
कुएँ से भयानक चीख निकली,
और अदृश्य हाथ पीछे हट गए।

चौकीदार ने अजय को ऊपर खींचा,
दोनों ज़मीन पर गिर पड़े।

“तुम्हें यहाँ से तुरंत जाना होगा,”
चौकीदार ने कहा,
“वो अब सिर्फ बच्चों के पीछे नहीं… तुम्हारे पीछे भी आएगी।”


अध्याय 20 — गाँव का खून

अजय और चौकीदार बंगले से बाहर भागे।
गाँव की गलियों में लाल पानी बह रहा था —
वो खून था।

हर घर के दरवाज़े खुले थे,
लेकिन अंदर सिर्फ सन्नाटा।
कोई इंसान, कोई जानवर… कुछ भी नहीं।

अचानक एक झोंपड़ी के अंदर से बच्चे के रोने की आवाज़ आई।
अजय भागा, लेकिन अंदर पहुँचते ही देखा —
वहाँ बच्चा नहीं, बल्कि वही औरत बैठी थी…
उसके हाथ में बच्चे का कटे सिर का खिलौना।


अध्याय 21 — मंदिर का रास्ता

चौकीदार ने अजय को खींचा —
“उसे रोकने का सिर्फ एक तरीका है —
गाँव के किनारे पुराना शिव मंदिर,
जहाँ उसका असली शव दफ़न है।”

दोनों भागते-भागते मंदिर पहुँचे।
मंदिर वीरान था,
दीवारों पर टूटे त्रिशूल और फटे झंडे पड़े थे।

मंदिर के बीच ज़मीन पर एक जगह काला निशान था।
“यहीं उसे जलाया गया था… आधा ही…
बाकी शरीर अब भी ज़िंदा है…”

चौकीदार ने कहा।


अध्याय 22 — आखिरी मंत्र

अजय ने कैमरे का फ्लैश मंदिर के चारों ओर घुमाया,
तभी औरत का साया सामने आ गया।
उसकी आँखें जल रही थीं,
और बाल हवा में उड़ रहे थे।

“तुम मुझसे बच नहीं सकते,”
उसने कहा।

चौकीदार ने ज़मीन पर सिंदूर से गोला बनाया और अजय को उसके अंदर खड़ा कर दिया।
फिर मंत्रोच्चार शुरू हुआ।

औरत चीखने लगी…
उसकी चीख इतनी तेज़ थी कि अजय के कान से खून निकलने लगा।


अध्याय 23 — बलिदान

मंत्र अधूरा था —
उसे पूरा करने के लिए किसी को अपना जीवन देना था।

चौकीदार ने अजय की तरफ देखा —
“मेरा समय आ गया…
तुम जाओ… और कभी पीछे मत देखना।”

उसने गोले से बाहर कदम रखा और अपने सीने में लोहे की छड़ी घोंप दी।
खून की धार निकली,
और उसी के साथ औरत का शरीर जलने लगा।

उसकी चीखों से पूरा मंदिर काँप उठा।


अध्याय 24 — आज़ादी या जाल?

अजय ने आखिरी बार पीछे देखा —
औरत का शरीर राख बन चुका था।
वो बाहर निकला और गाँव छोड़कर चला गया।

लेकिन…
जैसे ही वो शिवपुर से बाहर आया,
उसे सड़क किनारे वही बच्चा दिखा,
जो उसने कुएँ में देखा था…

बच्चा मुस्कुराया और बोला —
“माँ बुला रही है…”


अध्याय 25 — अंत का सच

सालों बाद, कोई उस गाँव में गया,
तो वहाँ सिर्फ एक टूटा हुआ कैमरा मिला।
उस कैमरे में आखिरी तस्वीर थी —
अजय, सफ़ेद साड़ी में, बिना पलक झपकाए खड़ा,
और उसकी आँखें लाल थीं…

कहते हैं, अब “काले बंगले” में दो आत्माएँ हैं —
एक औरत, और उसके साथ उसका नया साथी… अजय।

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