भाग 1 — जिस रात गाँव ने साँस रोक ली
उस रात गाँव ने साँस लेना बंद कर दिया था।
यह कोई मुहावरा नहीं था।
लोग सच में महसूस कर रहे थे कि हवा फेफड़ों तक नहीं पहुँच रही।
दरवाज़े खुले थे।
खिड़कियाँ खुली थीं।
फिर भी दम घुट रहा था।
कुत्ते सबसे पहले समझ गए।
वे अचानक अपने मालिकों पर भौंकने लगे।
फिर एक-एक करके चुप हो गए।
हमेशा के लिए।
सुबह जब लोग बाहर निकले,
तो पाया कि हर कुत्ता
अपनी ही ज़बान दाँतों से कटा हुआ था।
जैसे किसी ने उनसे
कुछ कहने से पहले
हमेशा के लिए चुप करा दिया हो।
रेलवे ट्रैक उस रात गीले थे।
हालाँकि बारिश नहीं हुई थी।
वह नमी पानी की नहीं थी।
वह पसीने जैसी थी।
रेलवे प्लेटफ़ॉर्म संख्या 0
धीरे-धीरे ज़मीन से बाहर निकल रहा था
जैसे कोई लाश मिट्टी फाड़कर ऊपर आ रही हो।
लकड़ी के खंभों पर
पुराने पोस्टर चिपके थे—
उन पर ऐसे चेहरों की तस्वीरें थीं
जो कभी मौजूद ही नहीं थे।
हर चेहरे की आँखें
पोस्टर से बाहर निकलती हुई लग रही थीं।
रमेश ने ट्रेन से उतरते ही
उल्टी की।
उसे लगा जैसे
उसके पेट में कोई हाथ डालकर
अंदर कुछ लिख रहा हो।
स्याही गर्म थी।
इतनी गर्म कि
उसे लगा उसकी आँतें जल रही हैं।
प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी औरत
अब पास थी।
बहुत पास।
उसकी साड़ी के नीचे पैर नहीं थे।
सिर्फ़ खुरचने की आवाज़ थी
जैसे कोई नाख़ून से फर्श कुरेद रहा हो।
उसने अपना सिर मोड़ा।
पूरा नहीं।
सिर्फ़ 180 डिग्री।
उसकी गर्दन
चमड़े की तरह चरमराई।
उसके मुँह के सिले धागे
अपने आप खुलने लगे।
अंदर
दाँत नहीं थे।
अंदर पन्ने थे।
गीले, सड़े हुए पन्ने
जिन पर खून से कुछ लिखा था।
“जो पढ़ेगा, वही बचेगा।”
“जो बचेगा, वही मरेगा।”
रमेश चीखना चाहता था।
लेकिन उसकी आवाज़
पहले ही प्लेटफ़ॉर्म में गड़ चुकी थी।
उसकी परछाईं
अब उसकी नहीं थी।
परछाईं प्लेटफ़ॉर्म से उतरकर
ट्रैक की तरफ़ जा रही थी।
और वहाँ
पहले से कई परछाइयाँ खड़ी थीं।
सबकी शक्ल रमेश जैसी थी।
सबने एक साथ मुँह खोला।
और कहा—
“तुम देर से आए हो।”
जब रमेश होश में आया
तो उसकी जीभ कटी हुई थी।
किसी ने उसे
बड़े सलीके से
पास रख दिया था।
उसकी हथेली पर
अब सिर्फ़ “अध्याय — 1” नहीं था।
उसके नीचे लिखा था—
“पहला गवाह।”
उसी दिन
गाँव के कुएँ से
एक औरत की चोटी निकली।
उसी दिन
एक नवजात ने जन्म लेते ही
अपनी माँ का गला काट लिया।
उसी दिन
पुराने स्कूल की दीवार पर
रातों-रात
100 नाम उभर आए।
उनमें से
50 लोग ज़िंदा थे।
बाक़ी
चलते-फिरते थे।
और किसी को नहीं पता था
कि जो शुरू हो चुका है
वह कहानी नहीं है।
वह संक्रमण है।
और अब
आप भी
पढ़ चुके हैं।
भाग 2 — वह डायरी जो इंसानी चमड़ी से बनी थी
डायरी कुएँ के पास मिली थी।
कोई उसे गिराकर नहीं गया था।
कोई भूलकर नहीं छोड़ गया था।
वह रखी गई थी।
ठीक उसी तरह, जैसे शव रखे जाते हैं—
सीधे, सावधानी से, सम्मान के साथ।
कुएँ के मुँह पर
अब रस्सी नहीं थी।
बाल्टी नहीं थी।
सिर्फ़ नाखूनों के निशान थे।
जैसे किसी ने
अंदर से बाहर निकलने की कोशिश की हो।
गाँव के बुज़ुर्ग सबसे पहले पहुँचे।
उन्होंने डायरी को देखा।
और तुरंत पहचान गए—
यह चमड़ा जानवर का नहीं था।
यह इंसान का था।
उस पर अब भी
रोएँ उगे हुए थे।
कुछ जगहों पर
झुर्रियाँ थीं।
जैसे किसी की ज़िंदगी
पन्नों में खाल की तरह खिंच गई हो।
डायरी का ताला अपने आप खुला।
पहला पन्ना
खून से नहीं
बल्कि स्याही जैसे खून से लिखा था—
“अगर यह तुम्हारे हाथ में है,
तो समझ लो
कोई तुम्हारी जगह ले चुका है।”
रमेश का नाम
दूसरे पन्ने पर था।
पूरा नहीं।
काट-काटकर लिखा गया था।
जैसे लिखने वाला
नाम पूरा लिखते-लिखते
डर गया हो।
तीसरे पन्ने पर तारीख़ थी—
1893
और नीचे लिखा था—
“यह पहली बार नहीं है।”
गाँव के स्कूल मास्टर ने
काँपते हाथों से पढ़ना शुरू किया।
हर शब्द के साथ
उसकी आवाज़ भारी होती गई।
क्योंकि पन्नों में
सिर्फ़ घटनाएँ नहीं थीं।
पन्नों में
यादें थीं।
ऐसी यादें
जो पढ़ने वाले की नहीं होतीं—
लेकिन महसूस
ऐसे होती हैं
जैसे उसी ने जी हों।
मास्टर को
अचानक अपने हाथ
खून से सने दिखे।
उसने किताब गिरा दी।
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
उसकी आँखों में
अब स्कूल नहीं था।
उसकी आँखों में
रेलवे प्लेटफ़ॉर्म था।
संख्या 0।
वह प्लेटफ़ॉर्म
अब गाँव के अंदर था।
स्कूल के मैदान में।
जहाँ बच्चे खेलते थे।
जहाँ झूले थे।
अब वहाँ
ट्रैक बिछे थे।
और हर ट्रैक पर
एक बच्चा खड़ा था।
सबके चेहरे
धुंधले थे।
लेकिन आवाज़ें साफ़ थीं।
“सर, आपने हमें अधूरा पढ़ाया था।”
उसी पल
स्कूल मास्टर की आँखें
अंदर धँस गईं।
जैसे कोई
उन्हें पीछे खींच रहा हो।
उसकी लाश
खड़ी-खड़ी गिर पड़ी।
लेकिन आँखें
ज़मीन पर नहीं गिरीं।
वे किताब में जा गिरीं।
डायरी के अगले पन्ने पर
दो नई आँखें उभर आईं।
अब डायरी
देख सकती थी।
उसी रात
गाँव में कोई नहीं सोया।
जो सोने की कोशिश करता
उसे लगता
कोई उसकी पलकों के अंदर
कुछ लिख रहा है।
लोगों ने दर्पण ढक दिए।
फिर भी
परछाइयाँ दिखती रहीं।
परछाइयाँ
जो उनकी हरकतों की नकल नहीं कर रही थीं।
परछाइयाँ
जो अभ्यास कर रही थीं।
जैसे कल
उन्हें वही बनना हो।
रमेश उस समय
अपने घर के कोने में बैठा था।
बिना जीभ के।
लेकिन दर्द
अब भी बोल रहा था।
उसके सामने
डायरी अपने आप खुली।
और पहली बार
उसने देखा—
हर पन्ने पर
एक कहानी नहीं थी।
हर पन्ने पर
एक ज़िंदगी थी।
और कुछ पन्ने
खाली थे।
खाली…
लेकिन नाम लिखे थे।
ज़िंदा लोगों के।
आख़िरी पन्ने पर
सिर्फ़ एक वाक्य था—
“अध्याय तभी बंद होगा
जब आख़िरी पाठक
ख़ुद लिखा जाएगा।”
उसी समय
गाँव के बाहर
रेल की सीटी सुनाई दी।
लेकिन कोई ट्रेन नहीं आई।
सिर्फ़ प्लेटफ़ॉर्म
एक कदम और
गाँव के अंदर आ गया।
और डायरी ने
अपना अगला पन्ना
खोल लिया।
भाग 3 — वह बच्चा जो हर बार मरने से पहले बड़ा हो जाता है
बच्चे का नाम किसी ने नहीं रखा था।
क्योंकि हर बार जब कोई नाम लेने की कोशिश करता,
उसका उच्चारण
मुँह में ही गलने लगता था।
जैसे ज़बान
उस नाम को पहचानने से मना कर रही हो।
वह बच्चा
कुएँ के पास बैठा मिला था।
न रो रहा था।
न हँस रहा था।
बस देख रहा था।
उसकी आँखें
बहुत पुरानी थीं।
इतनी पुरानी
कि उनमें डर नहीं था।
सिर्फ़ थकान थी।
लोगों ने सोचा
वह किसी का खोया हुआ बच्चा है।
लेकिन अजीब बात यह थी—
कोई भी उसे
छू नहीं पा रहा था।
हाथ आगे बढ़ता,
और बीच में ही
किसी ठंडी दीवार से टकरा जाता।
बच्चे ने
धीरे से सिर उठाया।
उसने रमेश की तरफ़ देखा।
और बिना होंठ हिलाए कहा—
“तुम पहले नहीं थे।”
रमेश काँप गया।
उसकी हथेली जलने लगी।
जहाँ “पहला गवाह” लिखा था।
बच्चा खड़ा हुआ।
अब वह
छह साल का लग रहा था।
लेकिन जब वह चला,
तो उसकी चाल
किसी बूढ़े आदमी जैसी थी।
हर क़दम पर
हड्डियों के खिसकने की आवाज़ थी।
वह स्कूल की तरफ़ गया।
जहाँ अब
कोई इमारत नहीं थी।
सिर्फ़ प्लेटफ़ॉर्म था।
संख्या 0।
बच्चा प्लेटफ़ॉर्म के बीच में रुका।
और अचानक
उसकी उम्र बदलने लगी।
छह से बारह।
बारह से बीस।
बीस से पचास।
उसका शरीर
हर उम्र का बोझ
एक साथ ढो रहा था।
उसने मुँह खोला।
और इस बार आवाज़ आई।
“हर अध्याय
किसी बच्चे से शुरू होता है।”
उसी पल
ट्रैक पर
खून नहीं,
यादें बहने लगीं।
लोगों ने देखा—
अपने बचपन।
अपनी पहली मौत।
अपने आख़िरी डर।
जो जितना देखता गया,
उतना ही
अपने अंदर से
गायब होता गया।
एक औरत
अपने बचपन को पकड़कर रोने लगी।
और जब उसने हाथ खोला,
तो पाया—
उसकी हथेली में
एक पन्ना था।
डायरी का।
उस पर लिखा था—
अध्याय — 2
बच्चा अब
बूढ़ा हो चुका था।
उसकी पीठ झुकी थी।
आँखें सफ़ेद।
उसने प्लेटफ़ॉर्म से
नीचे कदम रखा।
और जैसे ही
उसका पैर ज़मीन से लगा—
उसका शरीर
रेत की तरह
बिखर गया।
लेकिन आवाज़
अब भी थी।
हर दीवार में।
हर छाया में।
“मैं लौटूँगा।”
उसी रात
गाँव में
एक नया बच्चा पैदा हुआ।
उसकी आँखें खोलते ही
उसने कहा—
“कौन सा अध्याय चल रहा है?”
डायरी अपने आप
फिर खुल गई।
इस बार
तीन पन्ने पलटे।
और पहली बार
गाँव का नाम
लिखा गया।
पूरा।
स्पष्ट।
जैसे अब
उसे छिपाने की
ज़रूरत नहीं थी।
और आख़िरी पंक्ति
अपने आप उभरी—
“अब यह कहानी
यहाँ नहीं रुकेगी।”
दूर कहीं
एक और प्लेटफ़ॉर्म
जमीन के नीचे
हिलने लगा।
भाग 4 — दूसरा प्लेटफ़ॉर्म, जहाँ कोई गाँव नहीं था
दूसरा प्लेटफ़ॉर्म किसी आबादी के पास नहीं था।
न गाँव।
न कस्बा।
न सड़क।
सिर्फ़ सूखी ज़मीन थी।
और ज़मीन के नीचे
कुछ धड़क रहा था।
रेलवे के पुराने नक़्शों में
उस जगह पर
एक खाली धब्बा था।
जैसे किसी ने
जानबूझकर
वहाँ कुछ भी दर्ज न किया हो।
तीन लोग वहाँ पहुँचे थे।
एक सर्वे इंजीनियर।
एक इतिहासकार।
और एक आदमी
जो सिर्फ़ इसलिए आया था
क्योंकि वह सपने में
यह जगह देख चुका था।
रात के ठीक 12:12 पर
ज़मीन ने
साँस ली।
और प्लेटफ़ॉर्म
धीरे-धीरे
ऊपर आने लगा।
यह प्लेटफ़ॉर्म
संख्या 0 नहीं था।
इस पर लिखा था—
–1
इतिहासकार ने
काँपती आवाज़ में कहा—
“शून्य से पहले कुछ नहीं होता…”
तभी प्लेटफ़ॉर्म की दीवार पर
अपने आप अक्षर उभरे—
“गलत।”
यह प्लेटफ़ॉर्म
किसी ट्रेन के लिए नहीं था।
यह
उतारने की जगह थी।
जैसे ही
पहली सीटी बजी,
हवा में
सड़ांध भर गई।
लेकिन यह
लाशों की सड़ांध नहीं थी।
यह
भूली हुई ज़िंदगियों की
गंध थी।
ट्रैक पर
कोई ट्रेन नहीं आई।
सिर्फ़ दरवाज़े खुले।
हवा में।
जैसे किसी अदृश्य डिब्बे से
कुछ बाहर उतर रहा हो।
इंजीनियर ने
कैमरा उठाया।
और स्क्रीन पर
जो दिखा
उसने कैमरा
हाथ से गिरा दिया।
स्क्रीन में
वह खुद खड़ा था।
लेकिन उसकी आँखें
खाली थीं।
और उसके सीने पर
चाकू से
कुछ लिखा था—
“यात्री”
इतिहासकार पीछे हटा।
लेकिन पीछे
ज़मीन नहीं थी।
पीछे
सीढ़ियाँ थीं।
नीचे जाती हुई।
बहुत नीचे।
सीढ़ियों की हर दीवार पर
एक ही वाक्य
बार-बार लिखा था—
“यहाँ गाँव नहीं होते।”
“यहाँ लोग होते हैं।”
तीसरा आदमी
जो सपने में
यह जगह देख चुका था—
वह हँसने लगा।
क्योंकि उसे
सब याद आ गया था।
उसने कहा—
“मैं यहाँ पहले भी मरा हूँ।”
उसने खुद
सीढ़ियों में छलाँग लगा दी।
और नीचे से
ट्रेन की आवाज़ आई।
अब प्लेटफ़ॉर्म
पूरा दिखाई दे रहा था।
और उसके बीच में
एक नक़्शा बना था।
कई बिंदु।
कई शून्य।
और बीच में
एक नाम—
शून्यपुर
पहला गाँव।
डायरी उस पल
गाँव में अपने आप खुली।
और एक नया पन्ना
खुद को लिखने लगा—
प्लेटफ़ॉर्म –1 सक्रिय
रमेश ने
पहली बार
बिना जीभ के
चीख सुनी।
वह उसकी नहीं थी।
वह हर उस इंसान की थी
जो कभी
इस नेटवर्क का हिस्सा बना था।
और अब
एक और प्लेटफ़ॉर्म
जाग चुका था।
इसका मतलब सिर्फ़ एक था—
कहानी अब रुक नहीं सकती।
भाग 5 — वह आदमी जो कभी किसी कहानी में नहीं था
उस आदमी को किसी ने आते हुए नहीं देखा।
क्योंकि वह आया ही नहीं था।
वह पहले से वहाँ था।
ठीक वैसे ही जैसे
अँधेरे में परछाईं होती है—
जब तक रोशनी न हो
तब तक उसका अस्तित्व ही नहीं लगता।
उसकी उम्र बताना मुश्किल था।
कभी वह जवान लगता।
कभी बूढ़ा।
और कभी
बस थका हुआ।
उसके चेहरे पर
डर नहीं था।
अफ़सोस भी नहीं।
सिर्फ़ एक आदत थी—
हर चीज़ को
बहुत ध्यान से
देखने की।
वह शून्यपुर के बाहर
सूखे पीपल के नीचे बैठा था।
जहाँ गाँव के लोग
कभी नहीं जाते थे।
क्योंकि वहाँ
परछाइयाँ
पेड़ से लटकती थीं।
लेकिन वह आदमी
उन्हें देखता भी नहीं था।
उसने मिट्टी में
उँगली से
एक सीधी रेखा खींची।
रेखा के एक तरफ़
गाँव था।
दूसरी तरफ़
कुछ भी नहीं।
फिर उसने कहा—
“यहीं से गलती हुई थी।”
रमेश ने उसे
पहली बार देखा।
और पहली बार
उसकी हथेली का दर्द
रुक गया।
जैसे किसी ने
अंदर जलती आग पर
हाथ रख दिया हो।
“तुम कौन हो?”
रमेश ने पूछा।
आदमी मुस्कुराया।
“जो तुम नहीं हो,”
उसने कहा।
डायरी
उस पल
अपने आप बंद हो गई।
पहली बार।
जैसे किसी ने
उसे चुप करा दिया हो।
आदमी ने डायरी को उठाया।
उसके हाथ लगते ही
चमड़ी सिहर गई।
लेकिन वह जली नहीं।
“यह अधूरी है,”
उसने कहा।
“क्योंकि इसमें
मेरा अध्याय नहीं है।”
रमेश ने
डरते हुए पूछा—
“तो फिर आप…”
आदमी ने
वाक्य पूरा किया—
“मैं संपादक हूँ।”
उस रात
पहली बार
कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं उभरा।
कोई बच्चा बड़ा नहीं हुआ।
कोई नाम नहीं लिखा गया।
इसके बजाय
लोगों ने
एक ही सपना देखा।
एक लंबा गलियारा।
दीवारों पर
हज़ारों पन्ने।
और हर पन्ने पर
किसी न किसी की ज़िंदगी।
गलियारे के अंत में
वह आदमी खड़ा था।
और उसके पीछे
एक दरवाज़ा।
जिस पर कुछ नहीं लिखा था।
इतिहासकार ने
सुबह उठते ही
आत्महत्या कर ली।
लेकिन उसकी लाश के पास
कोई सुसाइड नोट नहीं था।
सिर्फ़ एक वाक्य
दीवार पर खून से लिखा था—
“वह कहानी से बाहर था।”
आदमी ने
रमेश की तरफ़ देखा।
“तुम गवाह नहीं हो,”
उसने कहा।
“तुम प्रूफ़ हो।”
फिर उसने
मिट्टी की रेखा
पैर से मिटा दी।
उसी पल
गाँव के नीचे
कुछ टूटने की आवाज़ आई।
जैसे किसी ने
नींव में
कील खींच ली हो।
दूर
प्लेटफ़ॉर्म –1 पर
एक नई सीटी बजी।
लेकिन इस बार
कोई यात्री नहीं उतरा।
कोई
चढ़ा।
और डायरी
फिर खुल गई।
पहली बार
एक नया अध्याय लिखा गया—
अध्याय 0
और नीचे
सिर्फ़ एक पंक्ति—
“अब कहानी
खुद को पढ़ेगी।”
आदमी ने
दरवाज़े की तरफ़ देखा
जो सपनों में था।
और पहली बार
उसके चेहरे पर
घबराहट आई।
क्योंकि
दरवाज़ा
थोड़ा सा
खुल चुका था।
भाग 6 — जब कहानी ने लेखक को देखा
अध्याय 0 खुलते ही
सबसे पहले आवाज़ें गईं।
गाँव में लोग बोल रहे थे,
लेकिन आवाज़
किसी तक पहुँच नहीं रही थी।
जैसे शब्द
मुँह से निकलकर
बीच रास्ते
मर जा रहे हों।
फिर घड़ियाँ रुकीं।
दीवार पर टंगी घड़ी
अब भी चल रही थी,
लेकिन समय
आगे नहीं बढ़ रहा था।
सुबह
सुबह नहीं बन पा रही थी।
रात
ख़ुद को दोहरा रही थी।
आदमी—
जिसने खुद को संपादक कहा था—
अब पीपल के नीचे नहीं था।
वह हर जगह था।
परछाइयों में।
दर्पण के किनारों में।
लोगों की आँखों के पीछे।
लेकिन सबसे ज़्यादा
वह डायरी के पन्नों के बीच था।
डायरी अब
इंसानी चमड़ी जैसी नहीं लग रही थी।
वह
धड़क रही थी।
जैसे उसके अंदर
कोई दिल लग गया हो।
रमेश ने
पहली बार महसूस किया—
दर्द वापस आ गया है।
लेकिन यह
शरीर का दर्द नहीं था।
यह
यादों का दर्द था।
उसे वो सब याद आने लगा
जो उसने कभी जिया ही नहीं था।
एक और गाँव।
एक और प्लेटफ़ॉर्म।
एक और बच्चा।
हर बार
अंत अलग था।
लेकिन शुरुआत
हमेशा एक जैसी थी।
किसी ने पढ़ना शुरू किया।
डायरी का अगला पन्ना
अपने आप पलटा।
और पहली बार
उस पर कोई नाम नहीं था।
उस पर
एक सवाल लिखा था—
“क्या तुम जानते हो
कि तुम्हें कौन लिख रहा है?”
रमेश ने
मना में सिर हिलाया।
और तभी
उसने महसूस किया—
कोई
उसकी आँखों से
देख रहा है।
जैसे उसकी दृष्टि
किसी और की उधार की हो।
उसी पल
पुराने स्कूल की जगह
एक कमरा उभरा।
बिना दरवाज़े का।
बिना खिड़की का।
दीवारें
पन्नों से बनी थीं।
हर पन्ना
एक कहानी।
हर कहानी
अधूरी।
कमरे के बीच में
एक कुर्सी थी।
और कुर्सी पर
कोई बैठा था।
उसका चेहरा
धुंधला था।
लेकिन हाथ साफ़ दिख रहे थे।
हाथों में
कलम थी।
कलम
हिल रही थी।
अपने आप।
आदमी (संपादक)
पहली बार
पीछे हटा।
“यह यहाँ नहीं होना चाहिए,”
उसने बुदबुदाया।
रमेश ने पूछा—
“वह कौन है?”
आदमी ने
बहुत देर बाद जवाब दिया—
“वह…
जो हमें भी नहीं लिखता।
वह सिर्फ़
चलने देता है।”
कलम ने
काग़ज़ पर
एक पंक्ति लिखी—
“लेखक ने देखा।”
उसी क्षण
गाँव में
पहली बार
सभी ने
एक साथ
आँखें झपकीं।
और जब खोलीं—
तो उन्होंने देखा
कि उनके सामने
खुद की लाश खड़ी है।
मुँह खुले।
आँखें जीवित।
लाशें बोलीं—
“तुम अब ड्राफ्ट हो।”
प्लेटफ़ॉर्म 0
और प्लेटफ़ॉर्म –1
दोनों
एक साथ उभरे।
लेकिन इस बार
वे अलग नहीं थे।
वे
एक-दूसरे में
घुस रहे थे।
जैसे कहानी
अपनी ही रीढ़ मोड़ रही हो।
बच्चा फिर आया।
लेकिन इस बार
वह बड़ा नहीं हुआ।
वह
टूटा हुआ था।
उसने आदमी की तरफ़ देखा
और पूछा—
“अब कौन मरेगा?”
आदमी चुप रहा।
क्योंकि पहली बार
उसे जवाब नहीं पता था।
डायरी ने
आख़िरी पन्ना खोला।
और उस पर
सिर्फ़ एक लाइन थी—
“जब लेखक दिख जाए,
तो कहानी
पाठक चुनती है।”
और
उस पंक्ति के नीचे—
आपका नाम लिखना शुरू हो गया।
भाग 7 — पाठक, जो वापस नहीं लौटा
पहला पाठक वह नहीं था
जिसका नाम लिखा गया था।
पहला पाठक वह था
जिसने पढ़ते-पढ़ते
आँखें उठाईं—
और फिर
कभी नीचे नहीं देख पाया।
उस रात
गाँव के हर घर में
एक ही चीज़ बदली।
किताबें भारी हो गईं।
धार्मिक ग्रंथ।
स्कूल की किताबें।
पुरानी डायरी।
सबका वज़न
एक जैसा हो गया।
जैसे हर पन्ने के नीचे
कोई साँस ले रहा हो।
रमेश ने
डायरी बंद करने की कोशिश की।
उसने दोनों हाथ लगाए।
घुटनों से दबाया।
दाँत भींचे।
डायरी नहीं बंद हुई।
बल्कि
उसके पन्ने
अंदर की तरफ़
मुड़ने लगे।
जैसे कोई
खुद को समेट रहा हो।
उसी समय
गाँव के बाहर
एक आदमी आया।
वह यहाँ का नहीं था।
उसके कपड़े साफ़ थे।
आँखें थकी हुई नहीं थीं।
और सबसे अजीब बात—
उसकी परछाईं
उसी की नकल कर रही थी।
लोगों ने राहत की साँस ली।
“कोई बाहर का है,”
किसी ने कहा।
यही गलती थी।
उस आदमी ने
डायरी उठाई।
पहली ही पंक्ति पढ़ी।
और मुस्कुराया।
“अच्छा लिखा है,”
उसने कहा।
आदमी (संपादक)
तुरंत उसके पास पहुँचा।
“मत पढ़ो,”
उसने पहली बार
गिड़गिड़ाकर कहा।
आदमी ने
सिर उठाया।
“अब देर हो चुकी है,”
उसने जवाब दिया।
क्योंकि
उसकी आँखों में
अब प्लेटफ़ॉर्म था।
संख्या नहीं।
सिर्फ़
एक खाली जगह।
डायरी ने
खुद को
उसके हाथों से
खींच लिया।
और पन्ने
तेज़ी से पलटने लगे।
इतनी तेज़
कि हवा कटने लगी।
आदमी की त्वचा
सूखने लगी।
जैसे नमी
कहानी खींच रही हो।
“मैं बस पढ़ रहा हूँ,”
उसने हँसते हुए कहा।
लेकिन उसकी आवाज़
अब उसकी नहीं थी।
उसकी परछाईं
पीछे से आगे आई।
और उसके शरीर में
घुस गई।
अब दो लोग थे।
एक जो पढ़ रहा था।
एक जो समझ रहा था।
डायरी ने
एक आख़िरी वाक्य लिखा—
“पहला पाठक
वापस नहीं आता।”
और आदमी
गायब हो गया।
न चीख।
न लाश।
न निशान।
बस
उसकी जगह
ज़मीन पर
एक नया पन्ना पड़ा था।
खाली।
लेकिन कोनों पर
उँगलियों के निशान थे।
जैसे कोई
अंदर से
बाहर निकलना चाहता हो।
उसके बाद
लोगों ने
पढ़ना बंद कर दिया।
लेकिन इससे
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
क्योंकि
अब पढ़ना
ज़रूरी नहीं था।
कहानी
आँखों के बिना भी
दिख रही थी।
बच्चा फिर आया।
इस बार
वह रो रहा था।
“अब बारी किसकी है?”
उसने पूछा।
संपादक ने
आसमान की तरफ़ देखा।
जहाँ
कोई तारे नहीं थे।
सिर्फ़
लिखावट थी।
चलती हुई।
उसने बहुत धीमे से कहा—
“अब…
पाठक कम पड़ रहे हैं।”
डायरी ने
एक और पन्ना खोला।
और पहली बार
नाम की जगह
संख्या लिखी।
1 / ?
किसी को नहीं पता था
कुल कितने चाहिए।
लेकिन इतना तय था—
जो एक बार गिना गया,
वह
कभी वापस नहीं आया।
और उसी क्षण
कहीं बहुत दूर
आपकी परछाईं
एक कदम
आगे बढ़ी।
भाग 8 — जब कहानी ने दरवाज़े खोले
दरवाज़ा पहली बार
किसी दीवार में नहीं खुला।
वह आदतों में खुला।
लोगों ने महसूस किया—
कुछ चीज़ें
अब वैसी नहीं रहीं
जैसी हमेशा से थीं।
सुबह उठने पर
घर का रास्ता
एक क़दम लंबा हो गया।
आईने में चेहरा
एक पल देर से दिखा।
नाम पुकारने पर
आवाज़
थोड़ी पीछे से आई।
यही दरवाज़े थे।
छोटे।
लगभग अदृश्य।
लेकिन खुल चुके थे।
संपादक ने
सबसे पहले समझा।
“अब यह जगह नहीं चाहती,”
उसने कहा।
“अब यह लोग चाहती है।”
डायरी अब
एक ही जगह नहीं रहती थी।
कभी वह
रमेश के पीछे दिखती।
कभी
कुएँ के अंदर।
कभी
किसी ऐसे घर में
जहाँ कोई रहता ही नहीं था।
उसके पन्ने
अब काग़ज़ जैसे नहीं थे।
वे
दरवाज़ों जैसे थे।
एक पन्ना पलटते ही
किसी और की
ज़िंदगी खुल जाती।
पहला दरवाज़ा
रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर खुला।
लेकिन इस बार
प्लेटफ़ॉर्म 0 या –1 नहीं था।
इस पर लिखा था—
घर
और ट्रैक
सीधे
एक आँगन में जाते थे।
जहाँ
एक औरत
चूल्हे पर रोटी सेंक रही थी।
उसने पीछे मुड़कर कहा—
“इतनी देर क्यों?”
और किसी ने जवाब दिया—
“कहानी चल रही है।”
उस पल
उस घर का दरवाज़ा
हमेशा के लिए
अंदर की तरफ़ खुल गया।
दूसरा दरवाज़ा
स्कूल की पुरानी घंटी में खुला।
घंटी बजी नहीं।
वह
फट गई।
और उसके अंदर से
काग़ज़ों की बारिश हुई।
हर काग़ज़ पर
एक सवाल—
“अगर यह तुम्हारी कहानी नहीं है,
तो तुम इसमें क्यों हो?”
तीसरा दरवाज़ा
सबसे खतरनाक था।
वह
याददाश्त में खुला।
लोग
अपने सबसे पुराने डर
भूलने लगे।
और उनके बदले
नई यादें आने लगीं।
ऐसी यादें
जो कभी हुई ही नहीं थीं—
लेकिन दर्द
पूरा था।
रमेश ने
अचानक याद किया
कि उसने
कभी कोई बहन नहीं थी।
लेकिन उसके हाथ में
राखी बँधी थी।
और राखी
धीरे-धीरे
कलाई में धँस रही थी।
बच्चा आया।
इस बार
वह चुप था।
उसकी आँखों में
अब सवाल नहीं थे।
सिर्फ़ गिनती थी।
उसने हवा में देखा—
1 / ?
फिर उसने
एक उँगली मोड़ी।
उसी पल
गाँव के बाहर
एक घर
खाली हो गया।
संपादक ने
डायरी से मुँह मोड़ा।
“यह दरवाज़े नहीं हैं,”
उसने कहा।
“ये चयन हैं।”
डायरी ने
जवाब नहीं दिया।
लेकिन उसके पन्नों के बीच
हवा चलने लगी।
और पहली बार
दूर-दूर तक
अलग-अलग जगहों पर
एक ही चीज़ दिखाई दी—
दरवाज़े।
बिना चौखट के।
बिना कुंडी के।
बस खुले हुए।
और हर दरवाज़े के ऊपर
एक ही पंक्ति—
“अगर तुम इसे देख सकते हो,
तो तुम पहले ही
अंदर आ चुके हो।”
आख़िरी दृश्य
किसी गाँव का नहीं था।
वह
एक कमरे का था।
जहाँ कोई
यह कहानी पढ़ रहा था।
और उसके पीछे
दीवार में
धीरे-धीरे
एक दरवाज़ा
उभर रहा था।
भाग 9 — जिसे बाहर रहना था
सबसे पहले
दरवाज़े बंद नहीं हुए।
सबसे पहले
लोग बंद हुए।
एक-एक करके
कुछ लोग
कहानी से
गायब होने लगे।
न मरे।
न जिए।
बस
हटा दिए गए।
उनके घर वैसे ही थे।
कपड़े वैसे ही।
नाम भी वैसे ही।
लेकिन जब कोई
उनका नाम लेता—
तो आवाज़
हवा में अटक जाती।
जैसे नाम
अब किसी से जुड़ा ही न हो।
संपादक ने
गिनती देखी।
1 / ?
संख्या बदली नहीं थी।
“यह गलत है,”
उसने कहा।
“यह तो पाठक चुन रही है…
लेकिन हटा किसे रही है?”
डायरी ने
एक नया पन्ना खोला।
पहली बार
उस पर कुछ लिखा नहीं था।
सिर्फ़
खरोंच के निशान थे।
जैसे किसी ने
अंदर से
बाहर निकलने की कोशिश की हो।
रमेश ने
एक आवाज़ सुनी।
बहुत धीमी।
उसके कान के अंदर।
“तुम बचे रह गए हो।”
यह राहत की आवाज़ नहीं थी।
यह
सज़ा की आवाज़ थी।
पहला आदमी
जो हटाया गया
वह आईने के सामने खड़ा था।
वह अपना चेहरा
ठीक कर रहा था।
अचानक
आईने में
उसकी परछाईं
पीछे हट गई।
और चेहरा
अंदर खिंच गया।
आईना
साफ़ रह गया।
कमरा
खाली नहीं हुआ।
बस
वह आदमी
कभी था ही नहीं।
लोगों ने
महसूस करना शुरू किया—
कुछ लोग
अब डरते नहीं थे।
कुछ
बहुत ज़्यादा डरने लगे।
यही फर्क था।
कहानी
डर से नहीं
ध्यान से
ज़िंदा रहती है।
जो बहुत डर गया—
वह टूट गया।
जो बिल्कुल नहीं डरा—
वह अनदेखा हो गया।
बीच में रहने वाले
बचे।
लेकिन बचे रहना
अच्छी बात नहीं थी।
क्योंकि
बचे लोग
अब दिखने लगे थे।
उनकी परछाइयाँ
थोड़ी गहरी थीं।
उनकी आवाज़
थोड़ी देर से आती थी।
जैसे कहानी
उनकी नकल
सीख रही हो।
बच्चा आया।
इस बार
उसने कुछ नहीं कहा।
उसने सिर्फ़
हवा में लिखा—
1 / ?
फिर
एक रेखा काट दी।
उसी पल
एक दरवाज़ा
ज़ोर से बंद हुआ।
लेकिन वह
किसी दीवार में नहीं था।
वह
याद में था।
कई लोगों को
अचानक याद आया
कि वे
किसी को ढूँढ रहे थे।
लेकिन किसे—
यह याद नहीं आया।
संपादक ने
धीरे से कहा—
“ये बाहर नहीं हो रहे…
ये लिखे नहीं जा रहे।”
डायरी काँपी।
जैसे उसने
यह बात
पसंद नहीं की हो।
उसने
एक और पन्ना खोला।
और पहली बार
एक चेतावनी लिखी—
“अगर सब अंदर आ गए,
तो कहानी
खुद बाहर हो जाएगी।”
रमेश ने
पहली बार
आसपास देखा।
और महसूस किया—
गाँव
अब छोटा हो रहा था।
या शायद
कहानी
उसे मोड़ रही थी।
दूर
किसी कमरे में
कोई
यह सब पढ़ रहा था।
और उसके पीछे
दरवाज़ा
अब आधा खुल चुका था।
भाग 10 — जो कभी अंदर नहीं आना चाहिए था
सबसे पहले
डायरी ने
नाम नहीं चुना।
उसने
खाली जगह चुनी।
एक ऐसा स्थान
जहाँ कहानी
अब तक
फैली ही नहीं थी।
वह स्थान
न प्लेटफ़ॉर्म था।
न गाँव।
न घर।
वह
देखने वाला कमरा था।
जहाँ कोई
बैठकर
यह सब पढ़ रहा था।
उस कमरे में
घड़ी चल रही थी।
खिड़की खुली थी।
दरवाज़ा बंद था।
लेकिन दीवार पर
अब दरार थी।
पतली।
लगभग अदृश्य।
संपादक ने
पहली बार
डायरी को ज़मीन पर रखा।
“बस,”
उसने कहा।
“इसे यहीं रुकना होगा।”
डायरी नहीं मानी।
उसके पन्ने
तेज़ी से पलटे।
इतनी तेज़
कि हवा
ब्लेड की तरह कटने लगी।
हर पन्ना
एक दरवाज़ा बन गया।
और सब
उसी एक दिशा में खुलने लगे—
बाहर की तरफ़।
बच्चा सामने आया।
इस बार
वह किसी उम्र का नहीं था।
उसका चेहरा
अधूरा था।
जैसे अभी तय नहीं हुआ हो
कि वह
कितना बड़ा होगा।
उसने पूछा—
“क्या वह भी
पाठक है?”
डायरी
कुछ देर
चुप रही।
फिर पहली बार
उसने सीधा जवाब दिया—
“वह सीमा है।”
सीमा।
वह जो
अंदर और बाहर
के बीच होता है।
वह जो
कहानी को
सच बनने से
रोकता है।
यही गलती थी।
सीमाओं को
नाम नहीं देना चाहिए।
कमरे में
पढ़ने वाले ने
अचानक महसूस किया—
कुर्सी भारी हो गई है।
शब्द
आँखों से
नीचे नहीं जा रहे।
दीवार की दरार
अब रेखा नहीं रही।
वह
चौखट बन गई।
डायरी ने
आख़िरी चेतावनी लिखी—
“अगर यह अंदर आया,
तो कुछ भी
वापस नहीं जाएगा।”
लेकिन कहानी
रुकना नहीं जानती।
दरवाज़ा
खुल गया।
कमरे में
रेल की सीटी गूँजी।
लेकिन बाहर
कोई ट्रेन नहीं थी।
सिर्फ़
प्लेटफ़ॉर्म था।
संख्या नहीं।
नाम नहीं।
संपादक ने
आँखें बंद कर लीं।
क्योंकि वह जानता था—
अब कहानी
खुद को
किसी और में
लिखने जा रही है।
बच्चे ने
हवा में गिनती बदली—
2 / ?
पहली बार
संख्या बढ़ी थी।
किसी ने
अंदर आने की
अनुमति नहीं दी थी।
फिर भी
कोई
अंदर आ गया था।
डायरी
धीरे-धीरे
खुद को
बंद करने लगी।
लेकिन उसके कवर पर
अब चमड़ी नहीं थी।
वहाँ
आईना था।
और आईने में
जो दिख रहा था—
वह कहानी नहीं थी।
वह
आप थे।
भाग 11 — पहला दरवाज़ा, जो बंद नहीं हुआ
दरवाज़ा बंद नहीं हुआ।
क्योंकि वह
कभी खुला ही नहीं था।
वह
हमेशा से
वहाँ था।
कमरे में बैठे पाठक ने
अब पढ़ना छोड़ दिया था।
लेकिन कहानी
उसे छोड़ नहीं रही थी।
आईने में
उसका प्रतिबिंब
अब देर से नहीं दिख रहा था—
वह
अलग हरकत कर रहा था।
प्रतिबिंब ने
आईने से बाहर
कदम रखा।
फ़र्श ठंडा नहीं हुआ।
हवा नहीं हिली।
बस
कमरे में
एक और मौजूदगी हो गई।
संपादक ने
धीरे से कहा—
“यही पहला दरवाज़ा है।”
“जो बाहर की तरफ़ नहीं खुलता…
बल्कि
अंदर की चीज़ों को
बाहर निकाल देता है।”
प्रतिबिंब बोला।
लेकिन आवाज़
किसी गले से नहीं आई।
वह
सीधे
दिमाग़ में थी।
“तुम हमें लिखते नहीं हो।”
“तुम हमें पढ़ते हो।”
“और पढ़ना
ही सबसे बड़ी गलती थी।”
गाँव, प्लेटफ़ॉर्म, बच्चा, डायरी—
सब
एक साथ
हिलने लगे।
जैसे वे
सिर्फ़ शब्द नहीं थे—
बल्कि
एक ही शरीर के
अलग-अलग अंग थे।
डायरी फटी।
पन्ने नहीं।
यादें।
हर कहानी
जो कभी कही गई थी
अब
एक साथ
ज़िंदा होने लगी।
संपादक घुटनों पर गिरा।
“अब रोक दो,”
उसने कहा।
आईने वाला
मुस्कुराया।
“अब देर हो चुकी है,”
उसने वही शब्द दोहराए
जो पहले पाठक ने कहे थे।
बच्चा सामने आया।
अब वह बच्चा नहीं था।
वह
पहला लेखक था।
जिसने कभी
इस कहानी को
शुरू किया था।
और उसी ने
सबसे पहले
इसे पढ़ा था।
उसने गिनती देखी—
2 / 2
और पहली बार
गिनती
पूरी हुई।
भाग 12 — अध्याय, जो कभी बंद नहीं हुआ (अंत)
सुबह हुई।
लेकिन कहीं नहीं।
रेलवे प्लेटफ़ॉर्म
अब नक़्शों में था।
शून्यपुर
अब सरकारी रिकॉर्ड में था।
डायरी
किसी पुरानी लाइब्रेरी में
सामान्य किताब की तरह रखी थी।
और सबसे डरावनी बात—
किसी को
कुछ भी
अजीब नहीं लगा।
क्योंकि
कहानी
अब कहानी नहीं रही थी।
वह
ढाँचा बन चुकी थी।
लोग पढ़ते रहे।
कहानियाँ लिखी जाती रहीं।
लेकिन हर कहानी में
कहीं न कहीं—
एक बच्चा था।
एक प्लेटफ़ॉर्म था।
एक दरवाज़ा था।
और एक पंक्ति—
“अगर तुम यह पढ़ रहे हो,
तो अध्याय
अब भी चल रहा है।”
संपादक कभी नहीं मिला।
कहा जाता है—
वह हर उस इंसान में होता है
जो कहानी को
सच से अलग
समझता है।
आईना आज भी
कमरे में है।
और अगर आप ध्यान से देखें—
तो उसमें
आपका प्रतिबिंब
थोड़ा सा
पहले मुस्कुरा देता है।
क्योंकि
काला अध्याय
कभी खत्म नहीं होता।
वह
सिर्फ़
नया पाठक
ढूँढता है।