कहानी: पथरीला स्टेशन

पहाड़ी रास्ता शहर से बहुत दूर जाकर खत्म हुआ। गाँवों की आख़िरी रोशनी के बाद सब कुछ खामोश रहता—केवल चारों ओर विस्तृत पत्थर और पेड़ों की परछाइयाँ जो रात में लंबी होती चली जातीं। रास्ते का आख़िरी मोड़ था—एक सुनसान रेलवे प्लेटफ़ॉर्म, जिसे लोग “पथरीला स्टेशन” कहते थे। नाम पर वही पथर था: प्लेटफ़ॉर्म का पत्थर, जिसकी सतह ऐसी चिकनी थी जैसे किसी ने उम्र भर उसे रगड़ा हो। कोई भी ताज़ा रंग, कोई नयी पेंट नहीं—सिर्फ़ धूल और परतें जो साल-दर-साल जमा हुई थीं।

किसी पुरानी रेल-मानचित्र में यह स्टेशन दर्ज था—पर उसके आसपास पटरी बिना किसी व्यवस्थित ट्रैक के कहीं खो जाती थी। गाँव वालों की कहानियाँ अलग-अलग थीं: कुछ कहते थे कि यहाँ ट्रेनें आती थीं — पर कई लोग कहते कि ट्रेनें इसी स्टेशन पर पहुँचकर खामोश हो जाती थीं; यात्री उतरते, पर वे अपने अतीत के साथ लौटते नहीं। कुछ कहते थे कि रात के बीच में प्लेटफ़ॉर्म पर क़दम से क़दम मिलाकर चलते कुछ लोग दिखते हैं—पर पास जाकर उनके पास पहुँचते ही वे पत्थर बन जाते।

यही पथरीला स्टेशन एक दिन रात के अँधेरे में एक यात्री को अपने पास खींच लाया—नाम था सामीरा। बड़े शहर में उसने नौकरी छोड़ी थी, रिश्तों की दुविधा और जीवन की थकान ने उसे यहाँ खींच लाया। उसके पास एक छोटा बैग था, एक डायरी और एक पुराना परिवार चित्र। वह कोशिश में थी—कहानी जाने की, किसी बात का सच समझने की—या शायद खुद को समझाने की कि जिन बातों से वह भाग रही थी, वे अब और आगे नहीं पीछा कर पाएंगी।

प्लेटफ़ॉर्म पर उतरते ही सामीरा को अजीब-सा ठंडा एहसास हुआ—न तो मौसम बहुत ठंडा था, न ही गर्म; पर उसकी त्वचा पर एक तरह की सुन्नी-सी ठंडक उतर आई। उसने देखा कि स्टेशन पर एक बूढ़ा आदमी बैठा है—वह स्टेशन मास्टर जैसा नहीं दिखता था; उसकी आंखें धुंधली थीं और चेहरे पर कई रेखाएँ थीं, पर फिर भी उसमें कोई कड़कपन नहीं, सिर्फ़ ऐसी गंभीरता जो किसी ने बरसों सीखी हो। वह उस तरफ़ नहीं देख रहा था—बल्कि सामने की पटरी की ओर, जहाँ दिखता था कि रात की हवा पत्थरों के बीच सरक रही है।

सामीरा ने उससे पूछा—“यहाँ कौन-से लोग आते हैं?” बूढ़े ने धीमे शब्दों में कहा—“वे जो अपनी चीज़ों को पूरा करना भूल गए।” उसके शब्दों में कोई दंड नहीं था—बल्कि एक सूक्ष्म सूचना थी, जैसे किसी ने उसे किसी पुराने नियम की तरह अपनाया हो। सामीरा ने आगे पूछा—“और जो लौटते हैं?” बूढ़े ने आँखें उठाकर उसे देखा और बोला—“जो लौटते हैं, पर वे लौटते कैसे हैं—यह अलग बात है।” वह आगे कुछ नहीं कहा; उसकी ओर से चुप्पी ही पर्याप्त थी कि सामीरा को समझ आ जाए—यह एक ऐसी जगह थी जो सवाल उठाती थी।

वह रात वहीं रुकी—हवाएँ नरम थीं, चाँद बादलों के पीछे था और प्लेटफ़ॉर्म पर फैले धूल-छर्रों में कहीं-कहीं पुरानी किताबों के पन्नों के-सिरों के टुकड़े थे। सामीरा ने अपनी डायरी खोली और पास के एक बेंच पर बैठकर कुछ लिखना चाहा—पर उसके शब्द अक्सर अटक जाते। वह अपने过去 की उन यादों के सामने है जिन्हें वह पढ़ना नहीं चाह रही—एक बहस, एक टूटता रिश्ता, माँ के हाथों में घड़ी की टिक-टिक, पिता की खाली चेहरा पर मुस्कान जो असल में दर्द छुपाती थी। उसने लिखा—“मैं बस देखना चाहती हूं।” और उसी क्षण उसने देखा कि प्लेटफ़ॉर्म पर तीन-चार परछाइयाँ आ कर उसके पास रुक गई थीं—लोग नहीं, पर अतीत की शिथिल आभाएँ। वे न तो पुष्ट थे, न तो पूरी तरह मरे हुए। वे बस थे—जैसे किसी किताब की लाईनों में पड़े विराम।

सामीरा परछाइयों के पास गई। उसने देखा कि उनमें से एक—एक महिला का रूप—उसकी दादी जैसा दिखता था, पर उसके चेहरे पर उम्र के बजाय खालीपन था। वह महिला उसकी तरफ़ देखने लगी और बिना बोले उसकी डायरी की ओर इशारा की। सामीरा ने अपना पन्ना पलटा—वहाँ उसके पिता का नाम लिखा था—और पन्ने के कोने पर एक तार-सा निशान था जो किसी डरावनी रात की निशानी लगता था। दादी-सी आकृति ने सिर हिलाया—मानो कराह के बिना संकेत दे रही हो—“पता लगाओ।”

उस रात प्लेटफ़ॉर्म ने उसे जगाया—वह केवल एक पर्यटक या छात्र नहीं थी; वह उस स्टेशन के हिसाब का हिस्सा बनने आई थी। अगले कई दिनों में सामीरा ने देखा कि प्लेटफ़ॉर्म सिर्फ यात्रियों का समुच्चय नहीं, बल्कि उनके अधूरे-रिश्तों, क्षमा के अभाव, और अनकहे वायदे का संग्रह था। हर रात कुछ न कुछ उभर कर आता—कोई पुरानी चिट्ठी, कोई बिगड़ा हुआ फोटो, कोई सिमटा हुआ खिलौना—और जो लोग उन चीज़ों के पास खड़े होते, वे अक्सर अपनी आवाज़ खो देते।

एक शाम सामीरा ने एक पुरानी प्रविष्टि पढ़ी—स्टेशन मास्टर की डायरी की पन्नियों में—जिस पर लिखा था कि इस स्टेशन की प्रकृति समय की धाराओं को मोड़ देती है। एक पंक्ति थी—“यहाँ जो पार लगाते हैं, वे अक्सर अपनी भाषा बदल लेते हैं।” उसने पूछा—“भाषा क्यों?” स्टेशन मास्टर ने कहा—“क्योंकि जो सत्य यहाँ प्रकट होता है, उसे शब्द चाहिए ही नहीं होते; वह तस्वीर बनकर सामने आ जाता है।” सामीरा ने महसूस किया कि उसने उन तस्वीरों को भी देखा है—जो उसके भीतर छिपी थीं—और अब इन्हीं ने उसे खींचा था।

अगले सप्ताह में, गाँव के कुछ लोग आए और सामने से कहा कि पथरीला स्टेशन पर कुछ बदल रहा है—किसी के खड़े होने से हवा कम-सी हो रही है, और रातें लंबी। सामीरा ने और जानने की कोशिश की—वह धीरे-धीरे उन परिवारों के घरों में गई जिनके सदस्य यहाँ गुम हुए थे। हर घर की दीवारों पर कुछ ना कुछ लिखा था—नाम, तारीखें, और एक साझा बात थी: सबने कुछ न कुछ अधूरा छोड़ दिया था—एक किताब, एक मर्जी, एक चुनी हुई जिद। किसी ने शादी नहीं की, किसी ने मां-बाप को माफ़ नहीं किया, किसी ने वादा तोड़ा। पथरीला स्टेशन लगा रहा था कि यह सब कुछ अपने भीतर खा रहा था—और जो लोग अपना अतीत देख कर वापस लौटे, वे अक्सर जिए होते पर अंदर खोखले।

सामीरा का संकल्प बन गया—वह जानना चाहती थी कि क्यों यह जगह इतनी जोर से खिंचती है। उसने स्टेशन मास्टर से पूछा—“अगर कोई यहां आकर अपनी कमी स्वीकार कर दे, क्या वह मुक्त हो सकता है?” बूढ़े ने आँखों में गम लिये उत्तर दिया—“कुछ लोग मुक्त हो जाते हैं; कुछ लोग यहाँ रह जाते हैं—कभी-कभी मुक्ति की कीमत उनकी यादों का हिस्सा होती है।” सामीरा ने पूछा—“और वह हिस्सा क्या होता है?” मास्टर ने कहा—“जो तुम सच मानकर जीती हो—उसका एक टुकड़ा।” सामीरा ने जाना कि यहाँ की मुक्ति भारी पड़ती थी—क्योंकि कभी-कभी सच्चाई स्वीकार करने की कीमत आत्म-भुलावे से बड़ी होती है।

रातों में स्टेशन की परछाइयाँ जीवन के पुराने वर्गों को उठा लातीं—एक विवाह का झुमका, एक खोया हुआ चश्मा, एक फूल जो मुरझाने के बाद भी किसी तहखाने में बचा रहता। सामीरा ने उन तस्वीरों को अपने कैमरे में कैद किया—पर कैमरे की फ़ाइलें उस पर नस-बदल कर रखतीं; प्रत्येक तस्वीर में किसी न किसी का चेहरा गायब होता चला जाता। जब उसने किसी तस्वीर में अपनी ही परछाईं देखी, तो देखा कि वहाँ उसकी आँखों के अंदर उसने अपने पिता का चेहरा देखा था—आँखें उस तरह खाली और अर्थहीन कि देख कर उसके अंदर एक दहा गया सतह फूट पड़ी।

उस रात उसने फैसला किया कि वह खुद का सामना करेगी—रात के बीच एक उस डिब्बे की ओर चली गई जो स्टेशन के पुराने मानचित्र में निशानबद्ध था—डिब्बा नंबर 7। कहा जाता था कि डिब्बा 7 में जो भी अतीत आता, उसे अपना सत्य मिल जाता—या खोपड़ी का हल्का सा हिस्सा। सामीरा ने दरवाज़ा खोला—डिब्बा उस तरह खुला जैसा कोई पुराना कमरे का दरवाज़ा हो—अंदर अँधेरा था परनाज़ुक सी रोशनी ने उसे बुलाया। डिब्बे के अंदर एक बेंच पर उसकी माँ की सिलाई वाली रुमाल रखी थी—ठीक वैसी ही जैसे सालों पहले। उसे देखकर सामीरा का मन भर आया—यही वह रिश्ता था जिस पर उसने हमेशा चोट पहुंचाई थी—वही अपमान और वही चुप्पी। उसकी माँ की यादें उसे उबार रही थीं—पर अब वे पथरीले स्टेशन की भाषा में थीं—न कोई पछतावा, न कोई बहाना; सिर्फ़ एक अनुरोध—“देखो।”

डिब्बा के भीतरी हिस्से में वह घड़ी भी थी—जिसकी टिक-टिक उसकी नींद को चीर कर रख देती थी। उस घड़ी की सुई कुछ अजीब स्थिति में रकी थी—वही समय जब उसने घर छोड़ने का फ़ैसला किया था। सामीरा ने उसे देखा और समझ गई—उस घड़ी ने उसकी ज़िन्दगी की समय-सुई को रोक दिया था। उसने हाथ बढाकर घड़ी छू ली—और उसी वक्त उसके भीतर एक पूरानी याद की बूँद फूट पड़ी—वह याद जिसमें उसने अपने पिता से आख़िरी बार बात कर के मत्था फेर लिया था। वह याद उसे खा गई—पर डिब्बा के प्रकाश में वह स्मृति कुछ अलग कर गयी—वो अब एक चेहरा बनकर अपनी ओर मुड़ी, और कहा—“मुझे सुनो।”

सामीरा ने रोना शुरू कर दिया—पर वह रोना खाली नहीं था; वह वह चीख थी जो सालों से उसके भीतर दबा थी। उसकी आँखें खुलीं—वह देख पाई कि उसके पिता की परछाई अब उसके सामने नहीं, उसके भीतर थी। और तब उसने लिखा—डायरी में—उस दिन की सच्चाई जिसे उसने नहीं माना था। उसने लिखा कि उसने घायल पिता को अस्पताल में अकेला छोड़ा था; उसने लिखा कि वह अतीत को देखा और भागी; उसने लिखा कि उसने अपनी माँ की सलाह को टाल दिया और शादी कर ली। उसने वही शब्द लिखे जो उसकी आत्मा की जंजीरें खोलते। जैसे ही उसने आखिर में एक वाक्य पूरा लिखा—“मैंने डर के कारण भागा”—डिब्बे की रोशनी फीकी पड़ी और एक हल्की सी तरफ़ की हवा चली—सारी परछाइयाँ जैसे पीछे हट गईं—और प्लेटफ़ॉर्म पर धूल फिर से बैठने लगी।

सुबह चढ़ी तो प्लेटफ़ॉर्म पर कुछ बदला हुआ था। बूढ़ा स्टेशन मास्टर उसे देखकर मुस्कुरा उठा—वह चुप था पर आँखों में नरमाई थी। डायरी अभी भी हाथ में थी; उसमें कुछ नई लाइनें जोड़ी गई थीं—उनका लेखन साफ़ और स्थिर था: “सामीरा—स्वीकृति स्वीकार की।” सामीरा ने देखा—उसका नाम अब स्टेशन की दीवारों पर ज्यों का त्यों लिखा नहीं था; वह वहाँ से उतर चुका था—और एक नई जगह पर कहीं पाँव रख रहा था। उसने महसूस किया कि उसका भीतर जो खालीपन था—वह अब अलग था; वह सन्नाटा वहाँ था, पर वह अब उससे तंग नहीं था। उसने जाना कि पथरीला स्टेशन ने उसे आज़ाद किया—मगर कीमत कुछ ऐसी थी जिसे वह अपनी स्मृतियों में सँजो कर रखेगी।

भाग 1 यहीं समाप्त होता है—पर कहानी खत्म नहीं। यह स्टेशन और भी यात्रियों की तलाश करता है। पर सामीरा की मुक्ति एक संकेत है: कुछ लोग सच की कीमत चुकाकर बाहर निकल जाते हैं। पर क्या हर किसी की कीमत चुक पाती है? अगले भाग में हम देखेंगे कि पथरीला स्टेशन कैसे उन सच्चाइयों को और भी गहराई से खोलता है—जहाँ कुछ यात्री मुफ्त नहीं जाते, बल्कि स्टेशन उन्हें एक नई पहचान दे देता है—कभी दया, कभी सजा।

सामीरा प्लेटफ़ॉर्म छोड़कर गाँव की छोटी सी सड़क पर चल दी थी—पर उसके जाने के साथ ही स्टेशन ने अपनी आँखें दूसरी ओर मोड़ी। अब उसकी निगाह एक नए आगंतुक पर टिकी—नाम था विराज। विराज एक युवा था—छवि में ठंडा, पर भीतर ज्वाला। वह पुरानी किताबों का दुकानदार था, शहर में लाइब्रेरी का एक कोना संभालता था। उसके अंदर एक गहरा जख्म था—किसी ने उसकी बहन को अपमानित किया था, और उसने न्याय पाने की जगह खुद ही न्याय किया था—उसने किसी को चोट पहुँचाई, और वह कर्म अब उसके पीछे भाग रहा था।

विराज यहाँ आया था एक संकेत द्वारा—उसने शहर में एक अजीब चिट्ठी पायी थी: “किसी स्थान पर जो समय काटा गया, वहाँ उत्तर है।” चिट्ठी में कोई संकेत नहीं था पर उस जगह का नाम था—“पथरीला स्टेशन”। विराज की आँखों में वह ठंडक और बड़ी पक्का से थी—इकतरफीय तर्क और दूसरी तरफ़ विनाश; उसे वह सही ठंडक देती थी जो उसके भीतर की आग को बुझा सकी। पर स्टेशन ने उसे वैसा ही देखा जैसा वह था—न फ़ैसला किया, न दया दी; बस उसे परखा।

विराज ने प्लेटफ़ॉर्म पर कदम रखा। बूढ़ा स्टेशन मास्टर बैठा हुआ था—पर उसकी आँखें पहले की तरह शांत नहीं थीं; उनमें कुछ पेचीदा चमक थी—मानो वह किसी पहेली के अंतिम टुकड़ो का इंतज़ार कर रहा हो। विराज ने मास्टर से कहा—“मैं这里 आया हूँ सच जानने।” मास्टर ने बोला—“सच वो नहीं जो तुमने सुना है; सच वो है जो तुमने खुद से छुपाया है।” विराज की पीठ सख्त हो गई—उसने कहा—“मैंने जो किया, वह सही था।” मास्टर ने आँसू न दिखते हुए कहा—“किसी भी दण्ड में सच्चाई नहीं, पर भोग में मिलती है। तुम चुनो—या स्टेशन चुनेगा।” विराज ने अपनी गर्दन आगे बढ़ाकर देखा—उसके जूतों पर मिट्टी की परत थी, पर वह मिट्टी किसी और की थीं—किसी रात की जो उसने अपने हाथों से बनाई थी।

ट्रेन रात को नहीं आई; आने में कुछ हफ्ते लगे—लेकिन पथरीला स्टेशन समय के नियमों से जुदा था। कुछ यात्रियों के लिये ट्रेन अगले ही दिन आ जाती थी, और कुछ के लिये महीनों बाद। विराज ने वहीं रुका और प्लेटफ़ॉर्म पर रातें बिताईं। उसने देखा कि कुछ लोग आते और जाते—पर उनमें कुछ थे जो लौट कर परछाइयाँ बन कर चलते। विराज ने पाया कि स्टेशन का मौन किसी चीज़ का संकेत था—जब वह चरम पर होता, तो कोई घोघो-सा तकाजा होता—“दिखा दो।”

एक रात विराज के पास एक बूढ़ा आदमी आया—उसके हाथ में एक लकड़ी की पेटी थी। उसकी आँखें सफेद थी पर उसकी आवाज़ धारदार थी—“मैंने अपनी गलती लोगों से छुपा ली थी। अब यहाँ आकर मुझे उसे देखने की ज़रूरत है।” विराज ने पूछा—“तुम किसकी गलती की बात कर रहे हो?” बूढ़े ने कहा—“मैंने एक लड़के की ज़िन्दगी छीन ली थी—पर मैंने उसे बताया नहीं।” विराज भीतर झटका खाया—क्योंकि वही लड़का वह था जिसकी बहन पर विराज का क़दम टूट पड़ा था। यह जानकर विराज का धक्का और गहरा हुआ—वह समझने लगा कि इस स्टेशन के आ जाने का मकसद केवल सजा नहीं, बल्कि उन छुपी हुई कड़ियों को जोड़ना है जिनसे लोग एक-दूसरे से जुड़े हैं। वह महसूस करने लगा कि उसे केवल अपना अपराध नहीं, बल्कि दूसरों की चुप्पियाँ और उनकी हिस्सेदारी भी समझनी होगी।

विराज ने रातों-दिन तक थक कर देखा—और उसने अपनी डायरी निकाली। उसने लिखा—“मैंने जो किया, उसने मुझे बदल दिया। पर क्या बदलाव ठीक था?” उसने समझा कि यहाँ का सत्य इतनी तरह का है कि हर अपराध का दोहरा सच मौजूद रहता है—वही जिसने अपराध किया और वही जिसने उसे दबा दिया। रात के एक कोने में विराज ने देखा कि प्लेटफ़ॉर्म पर एक पथरीली दीवार पर सैकड़ों नाम लिखे हुए हैं—कुछ नए, कुछ पुराने—और उनके पास छोटे-छोटे चिन्ह थे—कुछ पर एक तिलक, कुछ पर फीका फूल, कुछ पर आँसू जैसी निशानियाँ। विराज ने अपना नाम नहीं देखा—उसने पहली बार असली डर अनुभव किया—वह डर जिसका नाम उसका खुद का था, पर वह उसे नाम देने से डरता था।

एक सुबह, मास्टर ने विराज को बुलाया और कहा—“टिकट लेना होगा या दीवार पर नाम ले लेना होगा।” विराज ने पूछा—“टिकट क्या?” मास्टर ने कहा—“यहाँ टिकट केवल पहचान के विरोध में मिलता है—क्या तुम अपना पुराना नाम बदलना चाहोगे? क्या तुम उसे स्वीकार करोगे?” विराज ने कहा—“मैंने जो पढ़ा वो सच था। मैंने उस लड़के को नहीं मारा— पर मेरी उदासी ने उसे मारा।” मास्टर ने धीरे से कहा—“उस उदासी का बोझ या तो तुम वहाँ छोड़ कर जाओ, या वह तुम्हें यहाँ रखेगा।”

विराज ने सोचा—क्या वह अपनी बहन को फिर से देखना चाहेगा? वास्तव में उसे क्या चाहिए—बदला या माफी? उसने यह पहेली हल करने की कोशिश की। किसका दर्द अधिकार रखता है—उसका जो चोट पहुँचाता है या उस परिवार का जो चुप रहा? पथरीला स्टेशन ने उसे यह प्रश्न दिया; जवाब उसकी पसंद था। विराज ने अंत में अपने पाप का सामना करने का निर्णय लिया; उसने कमरे की दीवार के सामने खड़े होकर अपने हाथ जोड़े—उसने उस रात की पूरी कहानी बताई जब उसने अपना कदम उठाया था; उसने बताए कि किस प्रकार उसकी बहन ने अपमान झेला और कैसे उसने अपने हाथों से उसका बदला लिया। उसने बताया कि उसने सबको चुप रखा और खुद को न्याय का आदर्श मान लिया। उसकी आवाज़ कठोर नहीं थी—सिर्फ़ थकी हुई—पर फिर भी उसके शब्द उसके भीतर के जहर को बहाते रहे। जब उसने सारी सच्चाई कही, तो प्लेटफ़ॉर्म पर लिखे कुछ नाम धीरे-धीरे फीके पड़ने लगे। उसकी बहन का नाम, जो उसके भीतर तपता रहा, थोड़ा शांत हुआ। विराज ने महसूस किया कि यहीं—कुछ अचंभित—उसने एक चीज़ खोई, पर कुछ पाया—एक छोटी सी राहत, पर यह राहत पूर्ण नहीं थी।

पर स्टेशन ने उसकी कीमत माँगी—मुक्ति के बदले उसे अपनी आवाज़ खोनी पड़ी। विराज ने महसूस किया कि बाहर निकलने पर वह लोगों से बात करते हुए भी अलग हो जाएगा—क्योंकि उसने अपने भीतर जो सच छिपाया था, वह अब दूसरों को नहीं बता सकेगा। वह जीवन से लौट गया पर उसकी बोली पतली हो गई—वह अब अपने आप को औरों के सामने नहीं रख पाया। उसने जाना कि यहाँ से लौटते हुए उसकी आत्मा ने कुछ हिस्सा छोड़ दिया था—उसका वह हिस्सा जो बदले की आग में जलकर तड़पता था। वह संतुलन था—एक प्रकार की शांति जो पूर्ण नहीं थी, पर टिकाऊ थी।

तभी पथरीला स्टेशन ने एक और कठिन परीक्षा रख दी—एक परिवार आया, जिसकी माँ ने अपने बेटे को खो दिया था—वह माँ रो रही थी पर उसकी आँखों में ऐसा प्रकाश था कि प्लैटफ़ॉर्म पर हर कोई सन्न रह गया। वह माँ आई और बोली—“मेरा बेटा यहाँ आया था—पर लौट कर नहीं आया। क्या आप उसे दिखा सकते हैं?” स्टेशन मास्टर ने कहा—“ऐसा तो नहीं किया जा सकता। पर तुम यदि उसे ढूँढती हो, तो तुम्हें हर उस सच को खोलना होगा जिसके साथ तुमने जिया है।” माँ ने कहा—“मैंने कभी किसी से कुछ छुपाया नहीं”—पर सच सामने आया—वह माँ ने अपने पति की जिद में सालों तक अपने बेटे को अकेला छोड़ दिया था; उसने अपने सुख को बेटे की ज़रूरत से ऊपर रखा। उसे अपनी छोटी-छोटी बहानों का सामना करना पड़ा—और जब उसने उन्हें स्वीकार कर लिया, तो रात के अँधेरे में उसका बेटा प्लेटफ़ॉर्म पर आया। माँ ने उसे देखा—पर उसकी आँखों में अब कोई पहचान नहीं थी; वह परछाई बन चुका था—न तो शांति, न ही क्रोध—बस एक खाली स्थान। माँ ने उसे गोद में लिया और कहा—“मेरा बेटा”—पर उसकी आवाज़ में अब दर्द था, पर वह दर्द शुद्ध था; उसने अपने अधूरेपन का भार मँट लिया था। वह लौट गई और अपने गाँव में नए सिरे से रहना शुरू किया—आज भी उसकी यादों में कुछ बदला हुआ था पर वह धीरे-धीरे फिर से जीवित हुई।

पथरीला स्टेशन इस तरह हर एक आने वाले के लिये न केवल सजा परखता था, बल्कि उन्हें एक ऐसा दर्पण दिखाता था, जिसमें वह व्यक्ति अपनी वास्तविकता देख सके। कुछ लोग दर्पण देखकर रो देते, कुछ उसे तोड़ देते, पर कुछ—जैसे सामीरा—उससे निकल कर एक नई दिशा ले लेते। विराज का अनुभव इस बात का सबूत था कि यहां की कीमत हर किसी के लिये अलग थी—कभी स्मृति, कभी आवाज़, कभी नाम।

फिर, कुछ महीनों के बाद, गाँव में एक अजनबी आया—वह अजनबी एक सेनानी था, उसके हाथ में निशान, उसकी आँखों में जंग का गहरा निशान। वह सीधे प्लेटफ़ॉर्म आया और बोला—“मेरे पास किस्मत की बारी थी—पर मैंने उसे मारा।” उसकी बात में कोई शून्यता नहीं थी—बल्कि ठोस अपनापन था—उसने बताया कि कैसे उसने एक समूह में दूसरों के साथ मिलकर कई लोगों की ज़िन्दगियाँ छीन लीं और अब उसे इन कृत्यों की सजा मिलनी चाहिये। प्लेटफ़ॉर्म ने उसे देखा और फिर धीरे-धीरे उसकी बातों के हिस्से को सामने रख दिया—क्योंकि इस बार पथरीला स्टेशन ने उसे केवल अपने भीतर नहीं रहने दिया; उसने उसे दूसरे यात्रियों का सामना करने के लिये रखा। वह अब लोगों के सामने एक नया चेहरा लेकर आता—जिसे लोग पहचान सकते थे पर समझ नहीं पाते थे। उस सैनिक की कहानी ने गाँव में एक और लहर पैदा की—कई ऐसे लोग आए जो अपनी गलती छुपाते थे—किसी की चुप्पी किसी की उपेक्षा का दिशाहीन प्रमाण थी।

कहानियों का यह चक्र चल ही रहा था जब एक दिन अजीब सा परिवर्तन हुआ—स्टेशन पर एक युवा लड़की आई, जिसका नाम था मीरा। मीरा के हाथ में एक छोटा सा बॉक्स था। बॉक्स में कोई वस्तु नहीं थी पर उसकी आँखें बोला कर रही थीं—वह आँखें किसी के खोए हुए प्रेम की निशानी थीं। उसने कहा—“मैं उस व्यक्ति को ढूँढना चाहती थी जो मेरी माँ को दुखी कर गया था—पर अब मैं यहाँ आकर अपने आप को खोज रही हूँ।” मीरा ने तुरंत महसूस किया कि इस स्थान की प्रकृति सिर्फ दूसरों की कहानियों का क्रमिक प्रदर्शन नहीं है—यह एक ऐसी मशीन थी जो कड़ियां जोड़ती थी—लोगों के अधूरे हिस्सों को परस्पर जोड़ कर उन्हें उनकी सच्चाई का सामना कराती थी। मीरा की माँ की कहानी किसी और की गलती से जुड़ी हुई थी—और जब मीरा ने उस गलती के पन्ने खोल दिये, तो उसने देखा कि कई पीढ़ियाँ आपस में जुड़ी थीं—मनमाने फैसले, पुरानी शिकायतें, और रक्त के दाग। मीरा ने सबका सामना किया और उन रिश्तों की जंजीरों को खोलना शुरू किया—जिससे गाँव में पुरानी सुलहें होने लगीं। लोग एक-दूसरे के पास जाने लगे और अपनी पुरानी चोटों को साझा करने लगे—कभी माफी हुई, कभी फिर लड़ाई, पर सब कुछ अब सामने था—छिपा नहीं रहा।

और इसी तरह पथरीला स्टेशन ने धीरे-धीरे गाँव की जिंदगी बदल दी—कुछ के लिये यह मुक्ति का मार्ग बना, कुछ के लिये सजा; पर सबसे बड़ी बात यह थी कि यह जगह उन जगहों में थी जहाँ लोग अपनी मोहर लगाए हुए सांचे खोलते—और कभी-कभी सच्चाई इतनी भारी होती कि कुछ लोग वहीँ रुक जाते। एक दिन सामीरा वापस आई—वह अब पहले जैसी नहीं थी; उसकी आँखों में किसी तरह की स्थिरता थी—जैसे किसी ने उसकी आवाज़ वापस कर दी हो—वह वहां आई और दूसरे यात्रियों को देखा और मुस्कुरा दी—उसने जहााँ छोड़ा था, वह नयी चीज़ों से वाकिफ हुई थी—वह लोगों को बताए बिना वहाँ से निकलती चली गई—पर उसके जाने से प्लेटफ़ॉर्म की नयी ऊर्जा महसूस हुई; अब वह जगह कुछ बदली थी—ज़्यादा मानवीय, कम डरावनी।

कहानी के आख़िर में, पथरीला स्टेशन ने एक अंतिम काम किया—उसने गाँव के लोगों को यह सिखाया कि सच को दबाकर रखना आसान नहीं होता; वह कहीं न कहीं निकल कर आता है; और जब वह निकलता है, तो या तो तुम्हें छीन लेता है या तुम्हें छीन कर बदल देता है। कुछ लोगों ने अपना नाम वहीं लिखवा दिया—कुछ ने उसे मिटा दिया। कुछ ने पथरीले प्लेटफ़ॉर्म को अपना मंदिर बना लिया—जहाँ वे हर साल आकर अपने रिश्तों की जाँच करते—और कुछ ने उसे भूल कर अपने पुराने जीवन में खो गए।

अंत में, विराज और मीरा और सामीरा—तीनों अपने-अपने जीवन में लौट गए, पर हर किसी के भीतर अब वह पथरीला स्टेशन एक साया बन कर पनपा था; कभी- कभार रातों में उनके सपनों में प्लेटफ़ॉर्म दिखाई देता—पर अब वह प्लेटफ़ॉर्म केवल डर नहीं देता, वह एक दर्पण था—जिसमें लोग अपने असल चेहरे देखते थे और फिर या तो बदल जाया करते थे या फिर वहीं रुक जाया करते थे।

और जहाँ तक स्टेशन का सवाल है—वह यहीं, उसी मोड़ पर खड़ा था—जैसा हमनें कहानी की शुरुआत में छोड़ा था—पथरीला प्लेटफ़ॉर्म, जीत की नहीं, बल्कि सत्य की जगह। वह अभी भी यात्रियों का इंतज़ार करता है—यही बात गाँव के बुज़ुर्ग बताते हैं और कभी-कभी एक चिट्ठी किसी युवा की जेब में आ गिरती है—“समय आने पर आना।”

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