हिमालय का विरह 

साँसें पत्थर पर जमती थीं उस ऊँचाई पर जहाँ हवा पतली थी और रातें लंबी।
सूर्य जब भी पहाड़ी के पीछे छिपता, घाटी पर पहाड़ों की परछाई ऐसी फैल जाती कि मानो दुनिया धीमी-धीमी अपनी सांस रोक लेती। उस घाटी का नाम था चिरहोल—घर कुछ लोगों का, पर ज़्यादातर समय एक अनकही खामोशी का घर। गाँव के लोग कहते—“ऊपर जो आता है, नीचे वापस वही नहीं आता”। शहरी लोग इसे उपन्यास की पृष्ठभूमि मानते; कुछ आत्मीय लोगों की तरह, यह उनके डर का टुकड़ा था।

कहानी की नायिका का नाम था मीरा। उसने शहर की जिंदगी छोड़ दी थी—बिना किसी शोर-शराबे के—और चिरहोल के पास एक पुरानी, जर्जर हवेली में आकर रहने लगी। हवेली पर उसके दादा का नाम लिखा था—एक पर्वतारोहक जिसने सालों पहले उस घाटी में गायब होने वाले कई लोगों की कहानियाँ सुनी थीं। मीरा का इरादा एकांत में अपनी किताब पूरी करना और पिता की विरासत सँभालना था—पर उसे जल्द ही एहसास हुआ कि वह विरासत सिर्फ़ फर्नीचर या कागज़ नहीं थी; वह एक सन्नाटा, वेदना और पुराने वायदों का पुल थी।

पहली रात, मीरा ने गाँव की एक लघु मंडली में भाग लिया—बुढ़े वकील, एक युवा जिप्सी गाइड अरविंद, और मंदिर के पुजारी। बात ज़्यादा नहीं हुई; पर जो कहा गया वह घना था—“पहाड़ अपनी गिनती खुद रखते हैं। जो गिनती खत्म कर दे वो लौट आता है पर दूसरे रूप में।” मीरा ने पूछा—“कौन लौटता है? किस रूप में?” किसी ने सिर हिलाकर कहा—“कुछ लौटते तो हैं—पैरों पर परछाई, आँखों में रात की स्याही।”

मीरा को पहले कुछ पलों में सब मज़ाक लगा। उसने किताब के पन्नों पर पर्वत के पत्थरों की घटिया-सी लिखावटें जोड़ीं और सोचा कि सब पुरानी धारणा है। पर उस ही रात हवेली की खिड़कियों के नीचे कुछ अजीब-सा चल चला—धुंध ने छतों पर कवच जैसा बनकर हर आवाज़ को दबा दिया। जब मीरा ने पलक खोली, तो संकरी घाटी के बीच एक हल्की-सी रोशनी चमकती दिखी—पहले दूर, फिर पास। वह रोशनी किसी दीप की तरह नहीं थी; वह किसी चलते हुए शरीर की थी, मानो कोई लंबा-सा आदमी धीरे-धीरे नीचे की ओर उतर रहा हो।

वह सुबह तक आकर गायब हो गई—पर गाँव के एक शक्की व्यक्ति ने बताया कि उसने सुना—“कोई पुकार रहा था, पर आवाज़ में कोई शब्द नहीं था—सिर्फ़ अपनी पुकार।” मीरा ने सोचा कि परछाईंयाँ, बातें और हवाओं की गूँजें हैं; पर इसके पीछे कुछ अधिक प्रबल था—एक अतीत जो हवेली की दीवारों से फूटकर बाहर आना चाहता था।

दूसरी रात मीरा ने किताब लिखने के बजाय हवेली के तहखाने में जाया—वहाँ दादा की पुरानी डायरी पड़ी थी। पन्ने पीले और खरोंचे हुए—पर एक पन्ने पर उसने पढ़ा: “ऊपर जो गुम हुआ, उसने आस-पास की कहानी में घुसना सीखा। अगर तुम दरवाजा खोलो, तो वह तुम्हारी ही आवाज़ बनकर लौटेगा।” मीरा ने सोचा—यह सब अंधविश्वास है। फिर भी उसकी उँगलियाँ पन्ने पर थम गयीं—क्यूँकि डायरी में किसी दिन लिखा था—“अगर तू आकर भी चुप रहती है, तो तू भी वही बन जाएगी।”

हवेली की दीवारें अचानक अत्यंत गूंज उठीं—न सिर्फ आवाज़ें, पर पुरानी तस्वीरें—दादा के साथी, गाँव के लोगों के चेहरे—एक-एक उभर आए। मीरा के भीतर बेचैनी जगी। उसने गाँव वालों से और बातें कीं—एक पुरानी महिला ने कहा कि पर्वत में एक प्राचीन स्थान है—‘खून बिल’—जहाँ अन्धेरे में कोई व्यवस्था है; लोग कहते कि वह जगह समय-समय पर ‘लौटती’ आत्माओं को रास्ता दिखाती है जो अपनी अधूरी बातें नहीं पूरी कर पाईं।

मीरा ने यह तय कर लिया कि वह खुद जाएगी—वह रात से डर कर पीछे नहीं हटेगी। अगले दिन सुबह, उसने अरविंद को साथ लेने का निर्णय किया—जिप्सी गाइड जो घाटी और रास्ते दोनों जानता था। अरविंद ने चेतावनी दी—“ऊपर के रास्ते में बहुत से निशान हैं—लोग यहाँ उभरते हैं, पर सब वापस आते नहीं। ऊपर से लौट कर आने वालों के चेहरे बदल जाते हैं—नए नाम, पुराना दर्द।” मीरा की आँखों में बदलाव था—यह डर नहीं, चुनौती थी। उसने महसूस किया कि उसकी किताब का सार यही होगा—और उसकी किताब को सच्चाई की गाँठ खोलनी थी।

वे दोनों चढ़ाई पर निकले। पगडंडी तंग थी, और ऊपर पहुँचना देर से कठिन। रास्ते में पत्थर पर कुछ रंग-पत्थर बिखरे—जैसे कि किसी ने वहाँ रक्त से कुछ रेखाएँ बना दी हों। अरविंद ने कहा कि वह प्राचीन रीति-रिवाज की निशानियाँ हैं—लोग जो ऊपर जाते थे, अपने नाम के ठप्पे छोड़ देते थे। जब वे ‘खून बिल’ के निकट पहुँचे, तो हवा में एक अजीब-सा झुकाव था—नहीं ठंडी, न गर्म—एक तरह का द्योतक जो कहता था—“यहाँ कुछ पूरा नहीं हुआ।”

और फिर उन्होंने देखा—एक चौक पर, पर्वत की छोटी घाटी में, कई जले हुए वस्त्र और टूटे हुए बर्तन रखे थे—जैसे किसी ने जल्दबाज़ी में अपने अस्तित्व को त्याग दिया हो। मीरा की नज़र एक पत्थर पर पड़ी—उस पर किसी ने नाम लिखे थे—नाम जो उसे अजीबतः प्रिय लगे: “अनिरुद्ध, झुम्का, लेला”। कुछ नामों के आगे तारिख़ थीं—पुरानी तारिख़ें, पर उनके आसपास ताज़ा-सा दिखती थीं, मानो हाल ही में किसी ने उन्हें छुआ हो। अरविंद चुप था—वह जानता था कि कई लोगों की कथाएँ यहाँ मिलकर किसी बड़ी कहानी का हिस्सा बन जाया करती हैं। उसने चेताया—“जितना दूर जाना है, उतना ही सच सामने आएगा।”

रात वहाँ ही बिताना पड़ा—कमज़ोर आग के आसपास वे बैठे। चाँद की रोशनी पत्थरों पर तेज़-सी चमकने लगी। अचानक, घाटी की ओर से एक पतला अँधेरा निकला—पहले घुटनों के ऊपर, फिर कमर तक—और फिर एक चेहरा, मानो कोई ठंडी, फीकी मुस्कान। मीरा की रूह काँप गयी—वह चेहरा आकर उनके पास बैठ गया। वह जीवित नहीं था, पर स्थिर भी नहीं—एक बीच का स्वरूप। उसने कहा—शब्द नहीं, पर उसकी आँखों ने बात की—“किसी ने नाम बदला”—और वह गायब हो गया। अरविंद ने मीरा की तरफ देखा—उसकी आँखें ज्वलंत थीं—“तुमने पूछा कि कौन लौटता है—वही लौटता है जो अपने नाम से जुदा रह गया।”

उस रात मीरा सपनों में गयी—खुद की मर्यादा टूटती दिखी, पिता की लाश, और दादा का हाथ—पर सबसे डरावना सपना यह था कि वह अपने आप को किसी और के चेहरे में देख रही थी—किसी महिला के आँखों में जो उसकी ही बात कह रही थी। सुबह उठते ही उसने डायरी निकाली—क्या किसी ने गाँव में उसके दादा की डायरी पर कुछ लिखा था? पन्नों के बीच एक नया कागज़ मिला—एक छोटा सा नोट—“यदि तुम जानना चाहती हो, तो अपनी आवाज़ साथ ले कर आना।” मीरा समझ चुकी थी—यह घाटी, हवेली, और ‘खून बिल’ सिर्फ़ स्थान नहीं—यह एक परीक्षा थी। और अब वह परीक्षा शुरू हो चुकी थी।

मीरा और अरविंद ने उस दिन घाटी के और भीतर प्रवेश किया। रास्ता और भी संकरा होता गया—जंगल ख़त्म हुआ, बर्फ़-सी परतें और चट्टाने निकली। हवा में उस तरह की स्थिरता थी जो किसी मृत समय की निशानी हो। वे एक पत्थर पर ठहरे—उस पत्थर पर किसी ने नाम उकेरे थे; पर एक नाम बार-बार दोहराया जा रहा था—“लीना—लीना—लीना।” मीरा के भीतर कुछ ठंडा उतर गया; उसने सोचा—लीना कौन थी? क्या यह कोई गाँव की लड़की थी जिसे गाँव ने भूला दिया?

जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, उन्हें कुछ नया मिला—एक छोटा सा शिविर, जले हुए कपड़े, और एक पुरानी घंटी। घंटी पर धूल नहीं थी—बल्कि कुछ गहरे निशान। अरविंद ने कहा—“ये निशान महज़ समय के नहीं हैं—ये संघर्ष के निशान हैं।” मीरा को अचानक एक पुरानी स्मृति आई—दादा की एक कथा जिसमें कहा गया था कि कभी पर्वत ने लोगों से समझौता माँगा—किसी की याद के बदले कोई नाम लेना। क्या यही वह समझौता था?

वे ‘खून बिल’ की भीतरी बात पर पहुँचे—एक छोटा सा तालाब जैसा गड्ढा, जिसके पानी जल-जैसे काला था। पास ही कुछ पत्थरों पर पकी हुई लकड़ियाँ रखी थीं—जिन पर नाम लिखे थे। मीरा ने देखा—उन पंक्तियों में एक नाम बार-बार मिटाया गया था—फिर फिर से लिखा गया—“मीरा”? उसने दिल थाम लिया—किसने उसका नाम लिखा? क्या घाटी उसे पहले ही जानती थी? अरविंद ने कहा—“यहाँ हर नाम सिर्फ़ भाषा नहीं; वह किसी रिश्ते का वजन है—जो तुम चूक गए हो।” मीरा को भीतर महसूस हुआ—यह घाटी उसका सामना नहीं कर रही थी; वह उसे अपने भीतर छुपी चीज़ों का आइना दिखा रही थी।

रात गहराने लगी। मेहराबों की तरह पहाड़ अँधेरे में दमकने लगे। अचानक, तालाब की सतह पर कुछ हलचल हुई—छोटी-छोटी उलझी परछाइयाँ उठीं और तालाब के किनारे पर जमा होकर किसी जुलूस की तरह बन गईं। वे परछाइयाँ जीवित नहीं लग रही थीं—बल्कि ऐसे लग रहा था जैसे किसी ने लोगों की यादें इकठ्ठा की हों। उनमें से एक परछाई सामने आयी—उसकी मुद्रा मीरा की माँ जैसी थी; पर चेहरा अलग। वह हाथ बढ़ाकर मीरा की डायरी छूने लगी—और डायरी के पन्ने अपने आप पलटने लगे। पन्नों पर एक नई पंक्ति उभर आई—“जिसने नाम छुपाया, वही लौटने को मजबूर है।”

मीरा के पांव ज़मीन पर जकड़ गए। अरविंद ने झट से सुरक्षात्मक मुद्रा ली—पर वह भी अंदर से परेशान था। उस रात शक्ति ने केवल बातें नहीं कीं; उसने इतिहास से बात कराई। पर वही इतिहास एक उजागर सच्चाई के साथ आया—वही सच्चाई जो मीरा ने अपनी किताब के लिए खोजी थी। दीवालों से निकलते चेहरे, पुरानी तस्वीरें, और पन्नों पर लिखी गई बातों ने एक कहानी कही—कि कैसे कई बरस पहले गाँव के कुछ लोग एक बड़े हादसे की चपेट में आये थे; वे लोग मरने के बजाय “लौट आये” पर किसी और रूप में। उनका पड़ाव यह था कि उन्होंने अपने नामों की शपथों का विनिमय कर लिया—याद के बदले, पहचान। और जो पहचान छोड़ दी गई, वह पहचान आगे की पीढ़ी के भीतर किसी और के चेहरे पर बैठ गयी—हर नाम का बोझ किसी न किसी ने उठाया था।

हवा अचानक तेज हुई, और आकाश पर बादल गुज़रते हुए उस तरह उखड़ते कि लगता था मानो पहाड़ खुद सांस ले रहा हो। मीरा ने तय किया—वह अपने अतीत से जुड़ी हर चीज़ सामने रखेगी। उसने उन पत्रों और तस्वीरों को निकाला जो उसके पास थे—उसने हर चीज़ का सामना किया—अपने पिता के आरोप, अपने दादा के अधूरे वायदें, अपनी माँ की उम्मीदें जिन्हें उसने तोड़ा था। उसने उन सबको खुल कर पढ़ा और स्वीकार किया। उस स्वीकार्यता का असर चौंकाने वाला था—तालाब की परछाइयाँ धीरे-धीरे पिघलने लगीं और तालाब की सतह चमक उठी—ऐसी तरह की, मानो कोई बोझ हल्का हुआ हो।

पर पथ हमेशा आसान नहीं होता। जब मीरा ने अपने पिता के अंतिम पन्नों को पढ़ा—एक कहानी खुली जिसमें उसके पिता ने गाँव की पुरानी रीति में भाग लिया था—एक वादा, जिसे निभाया नहीं गया। गाँव के कुछ बुज़ुर्गों का आरोप था कि उस वादे की वजह से कई परिवार टूटे थे। मीरा की गर्दन में चोट सी उठी—क्या उसका दादा वादा तोड़कर किसी का हक़ छीनने का कर्तव्य निभाया था? उस सत्य ने उसकी पहचान हिलाकर रख दी। उसने देखा कि कई नाम, जिन पर उसका अपने दिमाग की पुष्टि थी, असल में किसी और के दर्द से जुड़े थे। वह रो पड़ी—आँखों के पीछे यादें बार-बार चलने लगीं—उसके पिता की गलती, दादा की निंदा, पर सबसे ऊपर—उसकी खुद की भागदौड़ जिसमें उसने किसी को सही मा’ना नहीं दिया।

और तभी तालाब की गहराई से एक आवाज़ निकली—वह आवाज़ मानवीय थी पर भारी—“नाम बदल दिए गए, वादे अधूरे हैं।” मीरा ने घबराकर पूछा—“मैं क्या करूँ?” आवाज़ ने कहा—“स्वीकार करो, और बाधाओं को पूरा करो। जो तुमने अधूरा छोड़ा उसे पूरा करो।” मीरा ने ठान लिया—वह गाँव लौटेगी और दादा के नाम पर जो भी अनुचित हुआ था, उसे मान्य करेगी; जो किसी ने खोया था उसे पुनर्स्थापित करेगी। पर इसके साथ उसने एक और निर्णय लिया—वह ‘खून बिल’ के निकट जहाँ नाम लिखे थे, वहां से उन नामों को हटा कर, उनकी जगह अपनी आवाज़ का नाम लिखेगी—नाम जिसे वह घिसट कर ले आई थी और अब उसे वापस करती थी।

वह अगले दिन गाँव पहुँची और चिरहोल की पंचायत के सामने खड़ी हुई। उसने सारी बात बतायी—क्या उसने देखा—किस तरह नामों का विनिमय हुआ था, और कौन-कौन प्रभावित थे। लोग पहले गुस्से में आये—फिर डर में—पर जब मीरा ने उनके साथ अपने पन्नों और तस्वीरों की नक़ल दिखाई, तब गाँव में कुछ सच्चाइयाँ खुलीं—किसी के वादे टूटे थे, किसी ने अपना नाम किसी और को सौंप दिया था। पचपन वर्षों की चुप्पी टूट गयी। कई लोग झूठे सच के नीचे दबे हुए थे—और कई ने माफी मांगी। मीरा ने हर परिस्तिथि की मरम्मत करने की कोशिश की—किसी के दहेज़ लौटाए गए, किसी के हिस्से वापस दिए गए। कुछ रिश्ते ठीक हुए, कुछ नहीं—पर सबसे बड़ी बात यह थी कि लोगों ने अपने नामों को वापस माँगा—और कुछ ने उसे देना भी सीखा—वे जानते थे कि नाम कभी-कभी बोझ बन जाते हैं।

हवेली की दीवारों से पुरानी परछाइयाँ गायब होने लगीं—धीरे-धीरे चिरहोल में एक नई सुबह आई। तालाब की सतह चमकी—पर अभी भी उसकी गहराई में उस रात की यादें संचित थीं। मीरा ने जाना कि उसने केवल अपने परिवार का नाम नहीं बचाया—उसने एक घाटी को मुक्त कराया—या कम-से-कम उसे स्वीकार करना सिखाया। पर उसे यह भी समझ आ गया कि कुछ नाम ऐसे होते हैं जो खुले नहीं, वे बस बदलते रहते हैं—और कभी-कभी बदलने का मतलब यह भी होता है कि कोई नई पीढ़ी वह बोझ उठाती है।

कहानी की अंतिम छवि थोड़ी मिश्रित थी—मीरा चाँद की रोशनी में पहाड़ की ओर देख रही थी। उसकी आँखों में संतोष था पर उन पलों में एक उथल-पुथल भी थी—क्योंकि उसने जाना कि हर जगह कुछ नाम छूट जाते हैं, और कुछ वापस आते हैं। पर इस बार जिन नामों ने वापस आने का साहस किया, उन्होंने उस घाटी को हिला दिया; और जहाँ पहाड़ हिलें, वहाँ जीवन भी बदलता है। मीरा ने डायरी पर एक पंक्ति लिखी—“हिमालय ने मुझे सिखाया: कुछ सच्चाइयाँ इतनी भारी होती हैं कि उन्हें पूरा करने के लिये हमें खुद को बाँटना पड़ता है। पर अगर हम बाँट लें, तो बचने वालों की सँभाल हो सकती है।”

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