शवगृह स्टेशन

धुंध इतनी घनी थी कि सामने खड़ा पेड़ भी धुआँ बनकर हवा में घुलता-सा लगता था।
सुबह का सूरज ऊपर था, लेकिन चमक किसी और दुनिया से होकर आ रही थी—फीकी, ठंडी और अजीब तरह से टेढ़ी।
रास्ते के किनारे बांस, पलाश और कुछ सूखे नीम के पेड़ थे, लेकिन ऐसा लगता था जैसे वो पेड़ नहीं, किसी भूले हुए साये की लंबी उँगलियाँ हों, जो राहगीरों को रोकना चाहती हों।

किसी पुराने नक्शे में जहाँ यह स्टेशन दर्ज था, वहाँ आज सिर्फ एक खंडहर पड़ा था—
पत्थरों का टूटा प्लेटफ़ॉर्म, गिरी हुई छत, और जंग खाई पटरियाँ जो अचानक कहीं मिट्टी में उतरकर गायब हो जाती थीं।
गाँव वाले इसे “शवगृह स्टेशन” कहते थे—क्योंकि यहाँ आने वाले बहुत कम लोग वापस लौटते थे।

आज उसी स्टेशन के पास एक नया आगंतुक आया—अर्जुन।
शहर से भागकर आया हुआ, एक छोटा कैमरा कंधे पर और पुरानी सूटकेस हाथ में।
उसके चेहरे पर जिज्ञासा और बेचैनी दोनों थे—जैसे वह किसी कहानी के पीछे नहीं, अपने किसी डर के पीछे आया हो।

अर्जुन ने प्लेटफ़ॉर्म पर कदम रखा।
मिट्टी जैसे उसके जूते को पकड़ने लगी—ठंडी, चिपचिपी और किसी अनजाने खतरे से भरी।
उसने कैमरा उठाया और प्लेटफ़ॉर्म की तस्वीरें लेने लगा।
हर तस्वीर में उसे एक धुंधली-सी आकृति दिखाई देती—मानो कैमरें के बाहर कोई न हो, पर भीतर कोई खड़ा हो, बस पृष्ठभूमि में धुँधला।

स्टेशन-मकान का दरवाज़ा टूटा हुआ था।
अंदर टिकट-काउंटर पर मोटी धूल जमी थी।
दीवार पर कभी तंग की गई सूचनाएँ अब फटकर गिर चुकी थीं।
एक पुरानी, आधी मिट चुकी लाइन थी—
“यात्री सावधान: यह स्टेशन समय की सूची का पालन नहीं करता।”

अर्जुन को यह लाइन अजीब लगी।
उसने पास ही बनी एक चाय की दुकान से बात करने का सोचा।
दुकान पर एक बुज़ुर्ग महिला चाय बनाते-बनाते लगातार प्लेटफ़ॉर्म की तरफ़ देख रही थी, जैसे उसे डर हो कि वह कुछ मिस न कर दे।

अर्जुन ने पूछा—
“क्या यहाँ अभी भी ट्रेनें आती हैं?”

महिला ने जवाब दिया—
“ट्रेन…?”
वह कुछ देर चुप रही, फिर बोली—
“यहाँ ट्रेन तब आती है जब किसी का नाम बदलना होता है।”

अर्जुन समझ नहीं पाया।
उसने पूछा—“नाम बदलना मतलब?”

महिला ने उसकी तरफ़ बिना झपके देखते हुए कहा—
“जो लोग यहाँ से जाते हैं, उनका चेहरा वही रहता है… लेकिन नाम बदल जाते हैं।
और जो लौटते हैं… उनका चेहरा भी बदल जाता है।”

अर्जुन के भीतर बेचैनी गहरी होने लगी।

थोड़ी देर बाद वहाँ एक बूढ़ा आदमी आया—बाबूलाल।
वह इस स्टेशन का पुराना चौकीदार था।

उसने अर्जुन से कहा—
“यह स्टेशन 32 साल से बंद है।
लेकिन फिर भी… कभी-कभी ट्रेन आती है।
रात को, या कभी दोपहर को भी…
बिना शेड्यूल, बिना शोर, बिना ड्राइवर के…”

वह अपनी जेब से एक पुरानी डायरी निकालता है।
पन्ने पीले, कुछ जले हुए।
उस डायरी में दर्ज थे—गायब हुए यात्रियों के नाम।

कई नाम कटे हुए थे, और कुछ के आगे लिखा था—“लौटा, लेकिन पहचान नहीं पायी।”

अर्जुन ने डायरी पलटी—
एक पन्ने पर तारीख़ थी—
और उसके नीचे कई नाम, जिनके ऊपर एक ही टिप्पणी लिखी थी:

“गाड़ी 11:47 — मृतक स्टेशन पर पहुँचे। आगे का सफर अज्ञात।”

अर्जुन की रीढ़ में ठंड उतर गई।

उसने स्टेशन के आस-पास घूमना शुरू किया।
शाम होने लगी थी।

अचानक उसे लगा—
कि प्लेटफ़ॉर्म की हवा बदल रही है।
पेड़ स्थिर खड़े थे, लेकिन उनकी शाखाएँ धीरे-धीरे एक ही दिशा में झुकने लगीं—स्टेशन की तरफ़।

अर्जुन ने देखा—पटरियों के किनारे दो बच्चे खड़े हैं।
उनके कपड़े पुराने, गीले-से।
वे मुस्कुरा रहे थे, लेकिन उनकी मुस्कान में कोई जीवन नहीं था।

अर्जुन ने पूछा—
“तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

बच्चों में से एक बोला—
“हम तो हमेशा से यहाँ थे।
तुम नए हो।
क्या तुम टिकट लेकर आए हो?”

अर्जुन चौंक गया।
उसने कहा—“मुझे टिकट क्यों चाहिए? मैं ट्रेन में बैठने नहीं आया।”

दूसरा बच्चा बोला—
“हर कोई बैठता नहीं।
कई लोग तो… बिना बैठे भी चले जाते हैं।”

अर्जुन ने महसूस किया—
कि उसके पीछे कोई खड़ा है।

जब वह मुड़ा—
तो पटरी के दूसरी तरफ़ एक आदमी खड़ा था।
स्टेशन मास्टर की पुरानी वर्दी पहने।
वह बिना आँख झपकाए अर्जुन को देख रहा था।

उसने कहा—
“यह स्टेशन बंद है।
पर कहानियाँ बंद नहीं होतीं।
यहाँ हर रात एक कहानी शुरू होती है…
और कभी-कभी सुबह तक खत्म भी नहीं होती।”

अर्जुन धीरे-धीरे उसके पास गया—
“आप कौन हैं?”

आदमी बोला—
“जो ट्रेनें समय पर नहीं पहुँचतीं… उनसे पूछो।
मैं बस उन कहानियों को संभालता हूँ, जिनको कोई लिखना नहीं चाहता।”

अर्जुन ने देखा—उस आदमी की परछाई जमीन पर नहीं पड़ रही थी।

एक ठंडी हवा चली।
पटरी पर कहीं दूर धातु खनकने लगी—जैसे कोई धातु का पहिया बहुत दूर घूम रहा हो।

अर्जुन ने मास्टर से पूछा—
“क्या आज ट्रेन आएगी?”

स्टेशन मास्टर ने धीरे से कहा—
“आज कोई ट्रेन नहीं आएगी।
आज तुम आओगे।
तुम्हारा नाम… लिख दिया गया है।”

अर्जुन पीछे हट गया।
उसने पूछा—
“किसने लिखा?”

स्टेशन मास्टर ने किसी दीवार की तरफ़ इशारा किया।
अर्जुन ने देखा—
वहाँ एक पुरानी, मिट्टी से ढकी पट्टी थी।

उस पर अभी-अभी किसी ने उंगलियों से लिखा था—

“नया यात्री: अर्जुन जगताप
आगमन: 6:12 शाम
प्रस्थान: तय किया जाएगा।”

अर्जुन के चेहरे से खून सूख गया।

उसने पूछा—
“यह सब कौन करता है? मैं यहाँ क्यों हूँ?”

स्टेशन मास्टर ने उसकी तरफ़ देखे बिना कहा—
“क्योंकि इस स्टेशन पर जो आता है, वह किसी न किसी कहानी का हिस्सा होता है।
और जो कहानी पूरी नहीं होती…
वह यात्री चुनती है।”

अर्जुन समझ नहीं पा रहा था—
क्या यह स्टेशन किसी मरती हुई आत्मा का घर था?
या किसी पुराने श्राप का रास्ता?

उसने अपने कैमरे को देखा—
लेकिन स्क्रीन पर कोई तस्वीर नहीं—
सिर्फ़ एक बचकानी सी लिखावट चमक रही थी—

“टिकट दिखाओ।”

उसके अगले ही पल, पूरी पटरी काँपने लगी—
जैसे कोई भारी चीज़ बहुत दूर से तेज़ी से इस ओर बढ़ रही हो।

और अर्जुन ने पहली बार महसूस किया—
वह स्टेशन पर अकेला नहीं है।
कभी था भी नहीं।
और शायद…
वह वापस नहीं जा पाएगा।

स्टेशन मास्टर द्वारा अपना नाम दीवार पर देखा तो अर्जुन के भीतर कुछ टूट गया।
उसे अचानक अपना यहाँ आना एक भूल नहीं, बल्कि किसी अनकही खिंचाव का परिणाम लगा।
जैसे वह आने से पहले ही यहाँ दर्ज कर लिया गया था।

अँधेरा धीरे-धीरे स्टेशन पर फैल रहा था।
टूटी लाइटों की जगह हवा में एक हल्की चमक तैरने लगी, मानो पुरानी पीली ट्यूबलाइटें फिर से जाग रही हों।
लेकिन वे सचमुच नहीं जगी थीं—
वो सिर्फ़ भ्रम था, एक अजीब रोशनी जो बिना स्रोत के प्लेटफ़ॉर्म पर बिखरी हुई थी।

स्टेशन मास्टर वहीं खड़ा था, बिना हिले, बिना पलक झपकाए।
अर्जुन ने उसकी नज़रों में खुद को देखने की कोशिश की—
पर उसने पाया कि मास्टर की आँखों में एक अजीब खालीपन था।
ऐसा खालीपन जो किसी मृत चीज़ में होता है,
या किसी ऐसे इंसान में…
जो अब इंसान नहीं रहा।

स्टेशन के एक कोने से कदमों की आहट आई।
दो वही बच्चे फिर दिखाई दिए—
उनकी चाल इस बार धीमी थी, आँखों पर गाढ़ा साया था, और चेहरों पर जैसे समय का असर नहीं हुआ था।

एक ने अर्जुन के पास आकर पूछा—
“तुम यहाँ क्यों आए?
यह स्टेशन उन लोगों को बुलाता है, जिन्हें कहीं और जगह नहीं मिलती।”

दूसरे बच्चे ने कहा—
“और कुछ लोग खुद को ढूँढ़ने आते हैं।
पर मिलते किसी और को हैं।”

अर्जुन ने उनकी ओर झुककर पूछा—
“तुम लोग कौन हो? यहाँ क्या कर रहे हो?”

पहले बच्चे ने जवाब दिया—
“हम टिकट कलेक्टर नहीं…
हम यादें हैं।
उन लोगों की, जो एक बार इस स्टेशन से गुजरे और फिर लौटकर कभी घर नहीं पहुँचे।”

अर्जुन के होंठ काँपने लगे—
“तुम लोग… मर चुके हो?”

उनके चेहरों पर एक तरह की अजीब मुस्कान फैल गई।
मुस्कान जिसमें कोई गर्माहट नहीं—
बस एक ठंडी स्वीकृति।

“मरा हुआ कौन कहता है?”
पहले बच्चे ने कहा,
“जब किसी का नाम पूरी तरह मिट ही नहीं पाया?”

अर्जुन ने पीछे मुड़कर देखा—
दीवार पर उसका नाम और भी गाढ़ा हो गया था।
जैसे किसी अदृश्य उंगली ने उस पर फिर से परत चढ़ा दी हो।

वह स्टेशन मास्टर के पास गया—
“ये नाम किसने लिखा? मैं यहाँ क्यों हूँ?”

मास्टर के चेहरे की रेखाएँ तनीं।
उसने कहा—
“यह स्टेशन उन लोगों को बुलाता है, जिनके जीवन में कुछ… अधूरा हो।
कुछ ऐसा, जो अपने अंत तक न पहुँचा हो।
कुछ ऐसा, जिसे सुलझाने के लिए वे कहीं और नहीं जा सकते।”

अर्जुन के हृदय में झटका लगा।
अधूरा?
कुछ ऐसा जो उसने पूरा नहीं किया?

स्टेशन मास्टर आगे बोला—
“और जब कोई यात्री इस जगह पाँव रख देता है,
तो स्टेशन उसे पढ़ लेता है।
फिर उसके नाम को लिख देता है।”

“क्यों?” अर्जुन ने पूछा।

“क्योंकि यह स्टेशन सिर्फ रास्ते का नहीं है—
यह फैसले का है।
यह तय करता है कि कौन आगे जाएगा…
और कौन यहीं रह जाएगा।”

अर्जुन ने मास्टर के शब्दों में छिपा खतरा महसूस किया।
इसी बीच प्लेटफ़ॉर्म की पटरियों में हल्की कंपन फैलने लगी।
जैसे किसी बहुत भारी चीज़ ने बहुत दूर से खुद को हिलाना शुरू किया हो।

बाबूलाल की डायरी याद आई—
उसमें एक लाइन लिखी थी—
“11:47 की ट्रेन आने पर स्टेशन बदल जाता है।”

अर्जुन ने घड़ी देखी।
समय था: 11:26 रात।
सिर्फ 21 मिनट बाकी।

स्टेशन मास्टर ने स्थिर आवाज़ में कहा—
“अगर तुम्हें वापस जाना है,
तो ट्रेन आने से पहले जाना होगा।”

अर्जुन चौंक उठा—
“पर ट्रेन तो…”

“हाँ,” मास्टर ने कहा,
“वही ट्रेन।
जिससे कोई भी यात्री उतरकर वापस नहीं गया।”

अर्जुन का शरीर थरथराने लगा।
उसने पूछा—
“अगर मैं ट्रेन से पहले चला जाऊँ तो?”

बच्चे दोनों एक साथ बोले—
“ट्रेन आने से पहले यहाँ से निकलने वाला…
कभी स्टेशन से बाहर नहीं पहुँचता।”

अर्जुन की साँसें तेज़ होने लगीं।
यानी अब कोई रास्ता नहीं था?

स्टेशन मास्टर ने कहा—
“जब यह स्टेशन किसी को बुलाता है,
तो वह रास्ता बंद कर देता है।
तुम उस समय में नहीं हो जो तुम्हारी घड़ी दिखाती है।
तुम उस समय में हो… जिसे स्टेशन ने चुना है।”

अर्जुन ने महसूस किया—
चारों तरफ़ आसपास की दुनिया जैसे स्थिर हो गई है।
पेड़ हिलना बंद।
धुंध बहना बंद।
यहाँ तक कि हवा भी रुक गई थी।

एक क्षण आया—
जब अर्जुन को लगा
कि वह किसी ज़िंदा स्टेशन पर नहीं,
बल्कि किसी मृत समय के टुकड़े में खड़ा है।

अचानक वह डायरी अपने आप खुल गई।
पन्ने पलटते गए,
और आख़िर में एक खाली पन्ना सामने आया।

खाली नहीं।
ऊपर हल्का-सा लिखा उभर आया—

“नई प्रविष्टि: अर्जुन जगताप.”

अर्जुन पीछे हट गया।
“नहीं… यह गलत है।
मैं यहाँ किसी भी कारण से नहीं आया!”

स्टेशन मास्टर की आवाज़ गहरी हो गई—
“हर यात्री यही कहता है।
पहले-पहल।”

अर्जुन ने चिल्लाकर पूछा—
“लेकिन अगर मेरा नाम यहाँ दर्ज कर दिया गया है…
तो मेरा अंत क्या होगा?”

मास्टर ने धीरे से कहा—
“अंत नहीं, अर्जुन…
यहाँ आते ही तुम्हारा सफर शुरू होता है।”

“कौन सा सफर?”

मास्टर ने धीरे से रीढ़ सीधी की—
और बोला—

“वह सफर…
जो सिर्फ मृत यात्री तय करते हैं,
और जीवित यात्री समझ नहीं पाते।”

अर्जुन की आँखों में भय उतर आया।
उसे अब एहसास हो रहा था कि वह गलत जगह पर गलत समय पर नहीं आया—
बल्कि यह स्टेशन उसे खींचकर लाया था।

तभी दूर पटरियाँ चमक उठीं।
एक काला धुआँ हवा में उठने लगा।
कोई इंजन दिखाई नहीं दे रहा था—
लेकिन पटरी पर अजीब तरह की रोशनी फैल रही थी,
जैसे रात खुद किसी ट्रेन का रूप लेकर आ रही हो।

स्टेशन मास्टर ने धीमे से कहा—

“ट्रेन… आ रही है।”

अर्जुन वहीं जम गया।
और प्लेटफ़ॉर्म अचानक बदलने लगा—
रंग, हवा, रोशनी—सब अजीब हो गए,
मानो वह किसी भूतिया दुनिया में प्रवेश कर चुका हो।

अगले ही क्षण…
पटरियों के अंत पर एक परछाई उभरी,
जो धीरे-धीरे एक पूरी ट्रेन का आकार लेने लगी।

और यह वह पहली ट्रेन थी
जिन्हें देखने के बाद भी
बहुत कम लोग कहानी सुना पाए।

रात अब केवल अँधेरा नहीं थी—
वह एक जीवित चीज़ लगने लगी थी।
स्टेशन की धरती धीरे-धीरे काँपने लगी,
जैसे जमीन के नीचे कोई विशाल हृदय धड़क रहा हो।

अर्जुन वहीं जमा खड़ा था।
उसकी उँगलियाँ सुन्न पड़ चुकी थीं।

पटरियों के सिरे पर एक काली आकृति उभरकर सामने आई।
पहले ऐसा लगा जैसे धुंध का कोई गहरा टुकड़ा हो,
फिर वह लंबी, फैली हुई परछाई बनी।
धीरे-धीरे उसमें लोहे की रेखाएँ बनने लगीं—
और एक क्षण में वह डिब्बों की लड़ी में बदल गई।

ट्रेन पूरी तरह काली थी।
कोयले की नहीं—
बल्कि उस कालेपन की
जो किसी आँख ने कभी सच में देखा ही न हो।

उस ट्रेन में कोई रोशनी नहीं थी,
फिर भी वह साफ दिखाई दे रही थी—
जैसे अंधेरा खुद उसे प्रकाश दे रहा हो।

अर्जुन ने देखा—
ट्रेन के दरवाज़े बंद नहीं थे।
लेकिन खुले भी नहीं थे।
वे…
बस मौजूद थे—
जैसे किसी अदृश्य यात्री के लिए तैयार।

स्टेशन मास्टर बिना पलक झपकाए उस ट्रेन को देख रहा था।
उसके चेहरे पर कोई भय नहीं,
पर एक गहरी थकान थी—
जैसे वह इसे अनगिनत बार देख चुका हो।

बच्चे दोनों अचानक गायब थे।
प्लेटफ़ॉर्म खाली हो चुका था।
सिर्फ़ अर्जुन और स्टेशन मास्टर खड़े थे।

मास्टर ने फुसफुसाते हुए कहा—
“यह ट्रेन उन यात्रियों को ले जाती है
जो अपनी जिंदगी में कहीं अटके रहे हों…
जिनके भीतर एक बंधी हुई चीख हो…
या कोई अधूरा सच।”

अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा—
“लेकिन मैं यहाँ क्यों हूँ?
मेरी जिंदगी में ऐसा क्या अधूरा है?”

मास्टर ने उसकी आँखों में देखकर कहा—
“हर यात्री यही पूछता है।
पहले दिन।”

अर्जुन ने अपनी सूटकेस कस कर पकड़ी।
पर उसका ध्यान जमीन पर गया—
सूटकेस की छाया जमीन पर नहीं पड़ रही थी।
छाया कुछ कदम दूर हवा में लटकी थी—
जैसे वह किसी अदृश्य चीज़ को पकड़े हो।

अर्जुन पीछे हट गया—
“यह… क्या हो रहा है?”

मास्टर ने कहा—
“यह स्टेशन…
सिर्फ़ जीवित इंसानों को नहीं पकड़ता।
यह उनके ‘अधूरे हिस्से’ को पकड़ता है।
तुम्हारे अतीत का जो हिस्सा तुमने दबा दिया…
वह इस समय ज़िंदा है।
और वही तुम्हें बुला रहा है।”

अर्जुन समझ नहीं पा रहा था
कि उसके अतीत में क्या ऐसा छूट गया था
जो उसे यहाँ खींच लाया।

ट्रेन अब धीरे-धीरे प्लेटफ़ॉर्म के सामने रुक रही थी।
धरती की हर कंपन
उसके दिल में उतरती हुई महसूस होती थी।

पहला डिब्बा अर्जुन के सामने आया।
वह डिब्बा
पुराने लकड़ी के बक्से जैसा था—
दरवाज़े पर उखड़ा हुआ हरा पेंट,
और काँच में धुँधली उंगलियों के निशान।

कोई मुस्करा रहा था अंदर।
अर्जुन ने स्पष्ट नहीं देखा—
लेकिन वह मुस्कान उसकी ओर थी।

दूसरा डिब्बा आया—
वह बिल्कुल अलग था—
इस पर किसी पुराने अस्पताल की हल्की सी गंध थी।
दरवाज़े के ऊपर
मिट्टी से लिखा हुआ एक शब्द दिखाई दिया—

“कमरा–12”

अर्जुन का दिल एक पल के लिए रुक सा गया।
वह शब्द…
उसे अपने बचपन के एक अस्पताल की याद दिला गया—
जहाँ उसने किसी को खो दिया था।

वह पीछे हटने लगा।
लेकिन उसके पैर जैसे प्लेटफ़ॉर्म से चिपक चुके थे।

तीसरा डिब्बा आया—
इस पर कोई निशान नहीं,
कोई रंग नहीं,
बस एक काला, बिना आवाज वाला दरवाज़ा।
यह दरवाज़ा किसी कब्र की तरह था।
ऐसा शांत…
कि उसमें से चीख का भी कोई प्रतिध्वनि नहीं निकल सकती।

अर्जुन के भीतर से एक धीमी कंपकंपी उठी।
उसने पहली बार महसूस किया
कि वह भाग नहीं सकता।

स्टेशन मास्टर ने कहा—
“हर यात्री को अपनी ट्रेन का डिब्बा चुनना होता है।
तुम्हारे सामने तीन हैं—
हर डिब्बा तुम्हारे अतीत का रास्ता है।
और हर रास्ता…
तुम्हें तुम्हारे सच तक ले जाएगा।”

अर्जुन ने अपनी धड़कन गिनते हुए पूछा—
“अगर मैं न चढ़ूँ तो?”

मास्टर बोला—
“जो यात्री ट्रेन नहीं चुनते…
उनका नाम इस स्टेशन की दीवारों में…
चुपचाप खो जाता है।”

अर्जुन ने दीवार की ओर देखा—
उसका नाम
अब खून की तरह गाढ़ा हो चुका था।
उसके नीचे एक नई लाइन उभरी—

“यात्री ने चयन नहीं किया तो स्टेशन चयन करेगा।”

अर्जुन के हाथ काँप उठे।
उसकी आँखें तीनों डिब्बों के बीच घूमने लगीं।

अचानक उसने देखा—
तीसरे काले डिब्बे के दरवाज़े के अंदर
एक किनारे कोई छिपा हुआ चेहरा झलक रहा था।
वह चेहरा
अर्जुन को जानते हुए-सा लगा।
बहुत परिचित।
लेकिन वो चेहरा वहाँ होना संभव नहीं था।

वह…
उसके पिता का चेहरा था।

वही पिता
जो 15 साल पहले
कमरा-12 वाले अस्पताल में
मर चुके थे।

अर्जुन के पैरों में जैसे जान आ गई।
वह झट से तीसरे डिब्बे की ओर बढ़ा—
लेकिन स्टेशन मास्टर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“सोचकर चुनो, अर्जुन,”
उसने कहा।
“यह रास्ता कहीं और नहीं जाता…
सिर्फ वहीं जाता है
जो तुमसे छिपा हुआ था।”

अर्जुन ने उसकी पकड़ झटक दी।
वह अपने पिता का चेहरा फिर झलकते देख रहा था—
आँखें खाली,
पर उनमें एक अनकहा सवाल।

अर्जुन ने कदम उठाया।
उसने हाथ बढ़ाया।
उसका हाथ दरवाज़े को छूने ही वाला था…

उसी क्षण
पूरी ट्रेन हिल गई—
जैसे अंदर कुछ जाग गया हो।

अर्जुन का साँस रुक गया।

और फिर—
दरवाज़ा
धीरे-धीरे
खुलने लगा।

“तीसरा डिब्बा — और अंतिम सत्य”

अर्जुन तीसरे डिब्बे में पूरी तरह अंदर कदम रख चुका था।
जैसे ही उसने प्रवेश किया,
पीछे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

डिब्बे के भीतर रोशनी नहीं थी,
फिर भी वह सब कुछ साफ़ देख पा रहा था—
जैसे चीज़ें रोशनी नहीं,
बल्कि याद से चमक रही हों।

सबसे पहले उसने फर्श पर ध्यान दिया।
लकड़ी पुरानी नहीं थी,
बल्कि बिल्कुल नई—
जैसे किसी ने अभी-अभी इसे बनाया हो।

सीटें आगे की पंक्तियों में neatly लगी थीं,
पर उन सीटों पर कोई बैठा नहीं था।

सिर्फ़ हवा में
एक अदृश्य उपस्थिति थी—
एक प्रतीक्षा।
एक दबा हुआ प्रश्न।

डिब्बे के अंत में एक आकृति खड़ी थी।
पीछे मुंह किए।
बिल्कुल स्थिर।
जैसे किसी फ़ोटो को वहाँ चिपका दिया हो।

उस आकृति के कंधे, चाल और शरीर की ऊँचाई—
अर्जुन उस सिल्हूट को पहचानता था

वह उसके पिता थे।

गले में वही नीली शॉल,
जो आख़िरी बार अस्पताल में पहनी थी।
वही झुके हुए कंधे,
और वही हाथ—
जो हमेशा किताबें पकड़े रहते थे।

अर्जुन के गले से आवाज़ नहीं निकली।
पर भीतर एक लहर उठी—
वह सच,
जिससे वह पूरे जीवन भागता रहा था।

उसने धीरे से पुकारा—
“पापा…”

आकृति नहीं हिली।
न सिर मुड़ा,
न हाथ।

अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसकी साँस भारी हो रही थी।
हर कदम पर लगा
कि जमीन नरम हो रही है—
जैसे लकड़ी नहीं,
बल्कि यादों पर चल रहा हो।

डिब्बे के पड़ाव में पहुँच कर
उसने पिता के कंधे पर हाथ रखा।

तभी—

आकृति धीरे-धीरे मुड़ी।

चेहरे पर कोई नफ़रत नहीं थी।
कोई भय नहीं।
कोई शिकायत भी नहीं।

बस…
एक खाली, शांत स्वीकृति—
जिसे देखकर किसी भी इंसान का दिल टूट जाए।

पिता ने कहा—
“तुम इतने सालों से मुझसे बचते क्यों रहे?”

अर्जुन काँप उठा—
“मैंने आपसे कभी नहीं भागा…
मैं बस—
मैं छोटा था।
मैं संभाल नहीं पाया।”

पिता ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“लेकिन सच यह है कि
तुमने मुझे कभी माफ़ नहीं किया।”

अर्जुन पीछे हट गया।
“नहीं… ऐसा नहीं…”

पिता ने शांत स्वर में कहा—
“जब तुम्हें अस्पताल के कमरा-12 में आना चाहिए था,
तुम नहीं आए।
तुमने कहा था—
‘मैं नहीं जा सकता।’
तुम डर गए थे।
और उस डर ने तुम्हें मेरा सामना करने नहीं दिया।”

अर्जुन का चेहरा सुन्न हो गया।
वह याद बहुत गहरी थी।
जिसे वह भूल नहीं पाया था।

पिता आगे बोले—
“मैं मरा नहीं था, अर्जुन।
मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।
अंतिम बार तुम्हें देखना चाहता था।
पर तुम नहीं आए।
और अब वही अपराधबोध
तुम्हें इस स्टेशन पर लेकर आया है।”

अर्जुन के अंदर कुछ टूट गया।
आँसू अपने आप बहने लगे।

“मैं छोटा था, पापा…
मैं संभाल नहीं पाया…
मैंने खुद को दोष दिया…
सालों तक…”

पिता ने कदम बढ़ाकर
धीरे से उसकी पीठ पर हाथ रखा।

“मुझे पता था।
तुम बच्चे थे।
डरना गलत नहीं था।
गलत यह था कि
तुमने उस डर को अपना सच बना लिया।”

अर्जुन फफक पड़ा।
“माफ़ कर दीजिए…
मैंने आपको कभी छोड़ना नहीं चाहा…”

पिता मुस्कुराए—
एक शांत, हल्की मुस्कान।
“मैंने तुम्हें पहले ही माफ़ कर दिया था।
तुम बस यह सुनने यहाँ आए हो।”

अचानक पूरा डिब्बा बदलने लगा।
सीटें धुंध बनकर उड़ने लगीं।
लकड़ी की दीवारें पीछे सरकने लगीं।
जैसे ट्रेन के भीतर छुपा अतीत
अब अपनी जगह छोड़ रहा हो।

पिता की आकृति धीरे-धीरे धुँधली होने लगी।
“अब तुम्हें यहाँ और रहने की ज़रूरत नहीं।”

अर्जुन चिल्लाया—
“नहीं… मत जाइए…
मैंने अभी तो…”

पिता ने उसकी ओर देखा—
“तुम्हारा सत्य पूरा हो चुका है।
अब स्टेशन तुम्हें जाने देगा।”

ट्रेन धीरे-धीरे हल्की होने लगी—
जैसे किसी ने उसका भार चुरा लिया हो।

डिब्बे की दीवारें पूरी तरह पिघलती चली गईं।
सामने प्लेटफ़ॉर्म दिखाई देने लगा।
स्टेशन मास्टर,
खाली रात,
धुंध—
सब फिर से उभर आए।

दरवाज़ा खुल गया।

अर्जुन बाहर आ गया।
उसके कदम हल्के थे,
जैसे किसी ने उसके कंधों का भार हटा दिया हो।

स्टेशन मास्टर ने उसकी ओर देखकर कहा—
“तुमने अपना डिब्बा चुन लिया।
और अपना सत्य भी।”

अर्जुन ने पूछा—
“अब क्या होगा?”

मास्टर ने कहा—
“अब यह स्टेशन तुम्हारे नाम को मिटा देगा।
और तुम…
वापस लौट सकते हो।”

अर्जुन ने दीवार की ओर देखा—
जहाँ उसका नाम लिखा था।
वहाँ अब कुछ नहीं था।
खाली जगह।
मानो किसी ने वह पन्ना फाड़ दिया हो।

अर्जुन मुस्कुराया—
बहुत दिनों बाद,
बहुत हल्की मुस्कान।

वह स्टेशन से बाहर की ओर बढ़ा।
धुंध हटने लगी।
हवा गर्म हो गई।
पहली बार स्टेशन उसे जीवित लगा—
मृत नहीं।

जब वह बाहर पहुँचकर पलटा,
तो पाया—
स्टेशन गायब था।

जहाँ पुराना प्लेटफ़ॉर्म था,
वहाँ सिर्फ़ खाली ज़मीन थी—
जंगल, मिट्टी,
और दूर तक फैला सन्नाटा।

अर्जुन ने सूटकेस उठाया
और सड़क की ओर बढ़ गया।
वह जानता था—
वह अब कभी “शवगृह स्टेशन” के रास्ते पर नहीं पड़ेगा।

पर पीछे कहीं हवा में
कोई पुराना, थका हुआ स्वर फुसफुसाया—

“अगला यात्री… समय आने पर आएगा।”

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