भाग 1: हवेली का बुलावा
मसूरी की ऊंची पहाड़ियों में, घने देवदार और चीड़ के पेड़ों के बीच, एक पुरानी हवेली खड़ी थी — मुलिंजर मेंशन।
लोग कहते थे, यहां का दरवाज़ा कभी बंद नहीं रहता। हवा के साथ यह खुद खुलता है… मानो किसी का इंतज़ार कर रहा हो।
राहुल, एक युवा लेखक, अपनी अगली किताब के लिए मसूरी आया था। स्टेशन के पास एक चायवाले ने आंखें चौड़ी करते हुए कहा —
“साहब… वहां मत जाइए… हवेली जिंदा है। जो उसमें घुसा, वो कभी बाहर नहीं आया।”
राहुल हंसकर बोला —
“डर तो बस कहानियों में अच्छा लगता है, हकीकत में नहीं। और मुझे कहानियां लिखनी हैं।”
भाग 2: पहला कदम
शाम का समय था, बादल नीचे झुक आए थे। हवेली के सामने खड़ा राहुल देख रहा था — दरवाज़ा आधा खुला था।
वो बुदबुदाया —
“लगता है मेरा स्वागत खुद हवेली कर रही है…”
अंदर जाते ही ठंडी हवा का झोंका उसके गालों से टकराया, जैसे किसी ने फुसफुसाकर कहा हो — “आ गए…”
दीवारों पर टंगी पेंटिंग्स के चेहरे ऐसे लग रहे थे जैसे उनकी आंखें उसका पीछा कर रही हों।
भाग 3: हवेली का अतीत
मुलिंजर मेंशन का नाम एलिज़ाबेथ मुलिंजर के नाम पर रखा गया था।
एक अंग्रेज़ अफसर की पत्नी, जो पहाड़ों से प्यार करती थी, लेकिन एक रात उसकी चीखों ने पूरे इलाके को जगा दिया।
अगले दिन, हवेली के पास खून के धब्बे थे, लेकिन एलिज़ाबेथ गायब थी।
कहते हैं, उसकी आत्मा अभी भी यहां है, और जो भी हवेली में आता है, वह उसका मेहमान बन जाता है… हमेशा के लिए।
भाग 4: डर की शुरुआत
राहुल अपने कैमरे के साथ हवेली के हर कोने में घूम रहा था।
सीढ़ियों से ऊपर जाते समय उसे लगा कोई पीछे-पीछे चल रहा है।
मुड़कर देखा — कोई नहीं।
तभी, कान के पास एक ठंडी सांस महसूस हुई और आवाज आई —
“वो आ रहा है…”
राहुल ने टॉर्च घुमाई… और वहां थी — सफेद गाउन में एक औरत, जिसका चेहरा पीला था, आंखें गहरी और खाली।
वो धीरे से बोली —
“भागो… अगर भाग सकते हो।”
भाग 5: एलिज़ाबेथ का कमरा
ऊपर के कमरे में एक म्यूजिक बॉक्स अपने आप बजने लगा। धुन मीठी थी, लेकिन उसके पीछे एक दर्द छिपा था।
आईने में राहुल ने खुद को देखा… लेकिन पीछे एलिज़ाबेथ खड़ी थी।
उसकी आंखों से खून टपक रहा था। वो फुसफुसाई —
“वो तुम्हें नहीं छोड़ेगा… जैसे उसने मुझे नहीं छोड़ा।”
भाग 6: गुप्त सुरंग
मुख्य हॉल में एक पेंटिंग टेढ़ी लटक रही थी। राहुल ने उसे सीधा किया, और पीछे एक दरवाज़ा निकला।
दरवाज़ा खोलते ही अंधेरी सुरंग मिली, दीवारों पर नाखूनों के गहरे निशान थे।
सुरंग के अंत में एक कंकाल पड़ा था, उसके पास एक सोने की अंगूठी थी — जिस पर लिखा था: E.M.
राहुल ने अंगूठी उठाई और बुदबुदाया —
“तो ये तुम्हारा सच है…”
भाग 7: अंतिम सामना
जैसे ही अंगूठी उसके हाथ में आई, हवेली हिलने लगी।
खिड़कियां अपने आप बंद हो गईं।
एलिज़ाबेथ सामने आई, अब उसके चेहरे पर गुस्सा था।
“तुमने उसे छू लिया… अब तुम भी यहीं रहोगे।”
राहुल चीखा —
“तुम इंसान नहीं… एक कैद आत्मा हो!”
वो गुर्राई —
“और तुम अब मेरी कैद हो…”
भाग 7.5: भागने की कोशिश और हवेली का जाल
राहुल पीछे हटते हुए दरवाज़े की तरफ भागा।
लेकिन जैसे ही उसने दरवाज़े की कुंडी पकड़ी, कुंडी पिघलकर उसके हाथ में चिपक गई।
वो दर्द से चिल्लाया और पीछे हटा।
तभी फर्श की लकड़ियां अपने आप उठने लगीं और सांप जैसी मरोड़ खाती हुई उसकी तरफ बढ़ीं।
राहुल एक टेबल पर चढ़ गया, लेकिन टेबल के ऊपर लगी झूमर अचानक गिर पड़ी, उसके बिल्कुल पास।
कमरे की दीवारें धीरे-धीरे सिकुड़ने लगीं, मानो हवेली उसे निचोड़कर खत्म करना चाहती हो।
राहुल ने खिड़की की तरफ छलांग लगाई, लेकिन बाहर घना कोहरा था, और कोहरे में हाथों जैसी आकृतियां थीं जो खींचने को तैयार खड़ी थीं।
तभी एलिज़ाबेथ की आवाज़ गूंजी —
“तुम बाहर नहीं निकल सकते… यहां से निकलने का रास्ता, सिर्फ मौत है।”
राहुल ने साहस जुटाकर सुरंग की तरफ भागा, लेकिन जैसे ही वह अंदर घुसा, सुरंग के दोनों छोर बंद हो गए।
उसके चारों तरफ अंधेरा था, और अंधेरे में बस वही म्यूजिक बॉक्स बज रहा था…
भाग 8: आज भी…
कहते हैं, हवेली की खिड़कियों से आज भी एक परछाईं बाहर देखती है।
म्यूजिक बॉक्स की धुन हवा में तैरती है, और बीच-बीच में एक ठंडी फुसफुसाहट —
“वो आ रहा है…”
जो भी वहां रात बिताता है, वो सुबह कभी नहीं लौटता।