मरणूर का मणिकुंड

नदी की गर्दन जहां समुद्र से मिलती थी, वहां एक छोटा सा गाँव था — मरणूर। नारियल के पेड़ किनारे झुके रहते, और दलदली मिट्टी में छोटे-छोटे थार होते जो जुलूस की तरह तिरछे दिखाई देते। गाँव की राहें सर्पिल थीं; हर मोड़ के बाद बैकवॉटर का एक अलग रंग दिखता। देहाती घरों की दीवारों पर लाल मिट्टी और काजल की पपड़ी पड़ी रहती; और शाम होते ही खिड़कियों के अंदर हल्की-सी ठंडी रोशनी। किंतु मरणूर के लोगों की आंखों में एक थकान थी — एक ऐसी थकान जो बारिश और हंसी से मिटती नहीं थी।

इस कहानी की नायिका है अनू। शहर की डॉक्टर बनने की पढ़ाई छोड़कर उसने माँ के साथ मरणूर लौटने का निर्णय लिया — माँ की तबीयत खराब थी और घर के पुराने काम फिर संभालने थे। अनू का लौटना गाँव के लिए एक नई शुरुआत जैसा था; पर वह जल्द ही महसूस करने लगी कि मरणूर के लोगों के चेहरों पर कोई छुपी बातचीत थी—आँखें जो मिलती नहीं, और गपशप जो आधी रह जाती थी।

मरणूर के तट से लगभग एक किलोमीटर दूर, एक छोटा ताल-सा था जिसे गाँव वाले “मणिकुंड” कहते थे। यह ताल हमेशा से ही लोगों की कहानियों में रहा — कभी देवताओं का स्थान माना गया, कभी बंदर-बैल की खाने की जगह, और दूसरों ने इसे शापित भी कहा। ताल का पानी हरा-सा, अरसे पुराना, और किनारे काले-बेसाख के पत्थरों से घिरा हुआ था। अतीत में, जब गाँव युवा था, मणिकुंड में एक मणि निकली थी — कीमती, लाल रंग की—जिसके बाद वहां अजीब घटनाएँ होने लगीं: बकरी गायब होना, नाव के पीछे कुछ घिरना, और लोगों के सपनों में किसी की पुकार सुनाई देना। मणिकुंड के पास बने पुराने आलम में आज भी कुछ मिट्टी के बने नोट लिखे थे—“हद न पार करना” — जिन्हें गांव के बुजुर्ग बड़े हिदायत से पढ़ते।

अनू ने पहली बार उस मणिकुंड की तरफ़ तब देखा जब उसकी माँ ने उसे फोन कर कहा कि गाँव में कुछ अजीब हो रहा है। “रातों में रोशनी दिखती है,” माँ ने कहा। “बच्चे भाग कर अपने घर नहीं जाते। ऊपर से कुछ आवाज़ें आती हैं — पर किसी के बोलने जैसा नहीं।” अनू ने ताजा हवा ली और तय किया कि वह खुद जाकर देखेगी। डॉक्टर होने के बावजूद वह विज्ञान की दुनिया में पली-बढ़ी थी, पर गाँव की बातें उसे भीतर खींचने की कोशिश कर रही थीं — जैसे कोई पुरानी घड़ी, जो धड़कते रहना चाहती हो।

पहली रात अनू और उसकी दोस्त लीना, जो गाँव में ही रहती थी, मणिकुंड के किनारे पहुँचे। चाँद बादलों से छिपा हुआ था और पानी के ऊपर एक हल्की-सी परत बहुत धीरे-धीरे फैल रही थी। किनारे बैठी बूढ़ी दीदी ने उन्हें देखा और इशारे से कहा — “तुम लोग यहाँ मत रुको।” पर युवा जिज्ञासा अधिक दृढ़ थी। लीना ने बताया कि कुछ महीनों से गावँ के कुछ लोग हर रात 2-3 बजे गायब हो जाते — आधे घंटे बाद वे वापस लौट आते, पर उनका चेहरा बदल गया होता; उनकी बातें वही होती पर आवाज़ अंदर से सुनी नहीं जाती — मानो चेहरे पर कोई और छाया बैठ गयी हो। अनू ने डॉक्टर की नज़र से देखा — क्या यह किसी मानसिक बीमारी का समूह है? क्या बैकवाटर का कोई विष था? पर सवालों की तरह जवाब दूर थे—जैसे पानी में कभी-कभी चंद पथरीले आकार दिखाई देते हैं और फिर गायब हो जाते हैं।

村 का पुजारी, राघवन कुट्टी, पुरानी किताबों और पूजा-परंपराओं का भण्डार था। उसने अनू को बताया कि मणिकुंड को कभी “मणिकुंडमन्नर” कहा जाता था — मानो वह किसी राजा या देवता की निगरानी में हो। सालों पहले, एक व्यापारी ने वहाँ से एक लाल मणि निकाली थी और उसे शहर में ले गया — और तभी से गाँव के किस्से बदले। राघवन ने कहा—“किसी चीज़ को उठाना, उसे अपने साथ ले जाना, वहाँ की व्यवस्था को बदल देता है। मामला सिर्फ मणि का नहीं था—वो मणि किसी का सुराग था।” अनू ने सोचा—ऐसा क्या था जो कोई पत्थर या मणि इन लोगों के जीवन पर इतना प्रभुत्व रख सकती थी?

एक ओर गाँव के लोग परंपरा पर विश्वास रखते, दूसरी ओर युवा इसे अंधविश्वास मानते। पर जब एक दिन लीना की छोटी भतीजी रात में खेलते-खेलते गायब हो गयी और आधे घंटे बाद अकेले ही लौट आई, तो डर सर्वत्र फैल गया। भतीजी ने कुछ नहीं कहा—बस आंखों में अजीब-सी चमक थी। उसकी माँ ने बताया कि बच्ची ने मणिकुंड की ओर भागते देखा था और उसने सुना—किसी की आवाज़ जो बिलकुल अलग तरह की थी—“ले चलूंगी।” अनू ने देखा कि बच्चे की नज़रों में कुछ लौट कर नहीं आया — कोई हँसी नहीं, कोई सपना नहीं। वह बच्चे की मानसिक स्थिति का परीक्षण करना चाहती थी—लेकिन उसकी माँ ने कहा—“नहीं डॉक्टर, तुम चीज़ों को आँखों में मत देखो; कुछ चीज़ें आँखों से नहीं, बल्कि दिल से दिखती हैं।” यह बात अनू के मन में बैठ गयी — क्या वास्तव में कुछ ऐसे मानवीय हिस्से हैं जिन्हें सिर्फ़ विज्ञान नहीं पकड़ सकता?

कुछ दिनों बाद गाँव के लोग एक बैठक में जमा हुए। अनेक दायित्वों और कुछ पुराने गुनाहों की बातें उभर आईं। एक बूढ़े ने कहा कि वर्षों पहले गाँव ने बाहर के एक व्यापारी को झूठा लाया — और व्यापारी ने मणि को ले जाकर भागा; तब से गांव में चोटें बढ़ी। दूसरे ने कहा कि मणि की वापसी से ही शांति मिलेगी। पर किसे भेजा जाए? अनू ने एक सुझाव दिया—पहले कारण खोजें; मणि की पृष्ठभूमि; पीछे के रिश्ते; और जो भी लोग रातों में अजीब हो रहे हैं, उन्हें मनोवैज्ञानिक जाँचना। इसका प्रस्ताव मिला, पर जड़ों के संकेत और भय के कारण लोग धकेलते रहे।

एक रात अनू अकेले ही मणिकुंड के किनारे गई। पानी शांत था, लेकिन हवा में एक भरी-सी सतही चाल थी। उसने किनारे पर बड़ी-सी पत्तियों के बीच कुछ चमक देखा—जैसे किसी ने वहाँ कुछ डाल दिया हो। उसने झुक कर देखा—वहाँ एक लाल पत्थर था — चमकीला, गीला, और किसी तरह था कि अनू को देखते ही वह उसके अंदर एक पुरानी याद जगा गया—उसकी माँ के किस्सा: बचपन में कैसे किसी ने लाल मणि दिखाकर उन्हें धोखा दिया था। अनू ने पत्थर उठाया ही था कि पीछे से किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया — वह लीना थी। “तुम्हें यहाँ क्या लगता है?” लीना ने पूछा—पर अनू ने देखा कि लीना की आँखें कुछ और चुकी—उनमें वह चमक थी जो बच्ची में थी। अनू ने पत्थर फेंकने की कोशिश की—पर उसने देखा कि पत्थर असल में बहुत भारी नहीं था; पर उसका हाथ जैसे किसी ने बाँध दिया हो। लीना ने धीरे से कहा—“वह सुना रहा है—वह बुला रहा है।” अनू को लगा—यह भ्रम है। उसने लीना को वहां से उठाने की कोशिश की—पर लीना ने पीठ मोड़ ली—और तब अनू ने देखा—लीना के गर्दन पर एक गहरा निशान उभर आया—जैसे किसी ने चुम्बक की तरह कुछ चिपका दिया हो। और उसी पल, पानी में से एक परछाई उठी—सिर्फ एक परछाई—और उसने अनू के भीतर एक पुरानी, अजीब स्मृति जगा दी: एक रात, उसकी माँ पीछे से चुपके चली गयी थी, और वापसी नहीं हुई। अनू ने महसूस किया—मणिकुंड ने उसे बुलाया था — और शायद उसका परिवार हमेशा से ही इस ताल के कुछ हिसाब से जुड़ा था।

उस रात अनू ने निर्णय लिया—वह विज्ञान के अलावा किसी और रास्ते को भी आजमाएगी। वह गाँव के जो पुरखे रहे, उनसे उनके किस्से सुनेगी; और साथ ही बालू-विशेषज्ञ से मणि की रासायनिक जाँच कराएगी। पर गाँव की पुरानी स्त्रियाँ उसके पास आईं और बोलीं—“कुछ चीज़ें वापस नहीं आतीं। अगर तुम वापस देती हो तो निश्चय से कर दो—वरना वह ले जाएगा।” अनू अब यकीन नहीं कर पायी; पर उसके लिए जो मायने रखता था वह था—सच्चाई। उसे पता था कि सच चाहे जैसा भी हो, उसे सामने आना चाहिए था। और इस प्रकार, मरणूर के छोटे-छोटे हालात उसे जकड़ने लगे — जैसे जाल की सूक्ष्म धागियाँ।

भाग 1 यहीं पर समाप्त होता है—मणिकुंड और मणि का रहस्य, अनू का व्यक्तिगत जुड़ाव और गाँव की परतें खुल चुकी हैं। अगले भाग में अनू का सामना होगा—मणि की वास्तविकता, मणिकुंड के भीतर पलती परछाइयाँ, और उस पुरानी कीमत का खुलासा जो गाँव ने कभी चुकाई थी।

अनू ने अगले हफ़्ते में अपने शोध की शुरुआत की। वह शहर गई, मणि की कैमिकल जाँच कराई, पर रिपोर्ट सामान्य निकली—पत्थर एक प्रकार का क्वार्ट्ज ही था, पर अजीब रंग और उच्च चमक के साथ। फिर भी वह विज्ञान से संतुष्ट नहीं हुई—क्योंकि जो चीज़ गाँव में हो रही थी, उसका पैमाना केवल आणविक नहीं था। उसने गांव के बूढ़ों से पुरानी कहानियाँ पूछीं—और पता चला कि मणि एक देवी की दी हुई एक निशानी थी, जिसे किसी ने चोरी करके वापस न किया। इस चोरी के बाद गाँव को अभिशप्त माना गया और जो चोरी में जुड़े थे, वे पीढ़ियों तक दोष बँटाते रहे। कुछ लोगों ने माना कि शाम के समय किनारे पर बैठकर मणि का शांतिपूर्वक लौटना आवश्यक है—वरना ताल अपनी मांगें ले लेगा।

अनू ने गाँव के पुराने अभिलेख भी पढ़े। उन्होंने पाया कि हर 12 साल में गांव में एक “खोने” की घटना घटित होती रही—बच्चेअचानक गायब होते और कुछ ही देर बाद लौट आते, पर उनका पहचाना स्वर बदल जाता। रिकॉर्ड में लिखा था कि पुराने समय में एक बूढ़ा माँगा करता था—“जीवन के बदले जीवन”। अनू को महसूस हुआ कि यह कोई मामूली परंपरा नहीं, बल्कि एक ज़्यादा पुरानी करारोग्रही प्रथा है—शायद बलि का एक रूप जो अब छुपा हुआ था। पर किस तरह? यही सवाल था।

एक रात जब वह मणिकुंड के पास गई, उसने देखा कि ताल की सतह पर प्रकाश कुछ अलग छा रहा था—निरंतर, पर फिसलता हुआ। उसकी माँ की एक पुरानी दोस्त, ब्रिजिथ अम्मा, साथ आई। ब्रिजिथ ने कहा—“तुमने देखा? पिछले साल तुम नहीं थी—पर मैं देखती थी। वह चुनाव करता है—किसकी साँसें वह लेगा।” अनू ने पूछा—“वह कौन?” ब्रिजिथ ने झट से कहा—“वह मणि है। न, वह पत्थर नहीं—वह देवता की याद है।” अनू ने पूछा—“अगर वह देवता है तो वह क्या मांग रहा है?” ब्रिजिथ की आँखों में आँसू आये—“वह संतुलन मांग रहा है। कभी-कभी वही संतुलन भयानक होता है।”

उसी रात लीना की हालत ख़राब हो गयी। वह छटपटाती दिखी—आँखें टकटकी लगाए, हाथ काँप रहे। अनू और ब्रिजिथ ने देखा कि लीना के हाथों में भी वही छोटी-सी चमक थी—नन्हा सा लाल दाग जो धीरे-धीरे बढ़ रहा था। डॉक्टर की हैसियत से अनू ने उसकी हालत की जाँच की—पर शारीरिक तौर पर कुछ भी स्पष्ट नहीं था। लीना बोल नहीं पा रही थी—उसका मुँह हिल रहा था पर शब्द नहीं निकल रहे थे। तभी उसने अँधेरे में से किसी के मुखड़े को देखा—वह मुखड़ा पानी के पास खड़ा था—आँखों में वे पुराने गाँव के संकेत थे। लीना की आँखों ने उसे देखा और फिर फ़ौरन बन्द हो गयी—पर आगे क्या हुआ वह अनू ने अपनी आँखों से देखा—रीढ़ की हड्डी पर एक सुक्ष्म-सा निशान उभर आया और फिर रात के पहले तेज़ी से उसका स्वर बदल गया। अगली सुबह वह अपनी पुरानी आत्मा में लौट आयी, पर उसकी आवाज़ पतली और दूर से आती हुई लगती थी—मानो किसी ने उसके भीतर से कुछ निकाल लिया हो।

उसी समय गाँव में एक मतभेद उभरा—कुछ लोग मणि को समुद्र में फेंकने की सलाह देने लगे—कहते थे कि समुंदर में उसे लौटाया जाए। पर दूसरों का मानना था कि मणि को वहीं शांति के साथ रखना होगा—अन्यथा और बुरा होगा। अनू ने ठहर कर कहा—“अगर यह किसी देवता की निशानी है तो हमें समझ कर ही कुछ करना चाहिए। सड़क पर उसे फेंकने से क्या होगा—हम नहीं जानते।” विवाद बढ़ा और विभाजन आ गया। पर एक बात साफ़ थी—जो भी दाँव खेला जाएगा, उसकी कीमत कोई न कोई चुकायेगा।

अनू ने फिर से रिपोर्ट पढ़कर तय किया कि वह खुद मणि की वापसी का तरीका ढूँढेगी—अगर किसी ने उसे चोरी करके बाहर ले गया था, तो उसे वापस लाना होगा; पर कैसे? उसके पास कोई स्पष्ट मार्ग नहीं था—सिवाय मणि के दायरे को समझने के। उसने पुराने बुजुर्गों के साथ मणि की पूजा-रीति निभाने की कोशिश की। रात-रात भर बैठ कर उन्होंने मारम एलेयम (पुरानी विधि) जानी—और कुछ-कुछ संकेत मिले कि मणि को शुद्ध करने और फिर सही स्थान पर वापस करने से कुछ संतुलन बैठ सकता है। पर यह आसान नहीं था—क्योंकि मणि का असर उन लोगों पर था जो चोरी या झूठ से जुड़े थे—और उस प्रभाव को हटाने के लिये उन्हें अपनी चूक माननी होगी।

एक रात जब गांव का माहौल अधिक तनावपूर्ण हो गया, तब अनू ने चुपके से फैसला किया—वह मणि खुद उठाकर समुद्र में फेंक देगी। उसे लगा—समुद्र बड़ा है, सब कुछ निगल लेगा; और वह मणि की शक्ति को किसी अज्ञात गहराई में दबा देगा। पर मणि को उठाने के लिए उसे किसी खास समय का इंतजार करना था—जब पानी की लहरें शांत हों और चन्द्रमा ढल चुका हो। उसने लीना की मदद ली और दोनों रात को चले गये। किनारे पहुँच कर उन्होंने देखा—मणि वहीं किनारे पर चमक रही थी, पर उस चमक में एक आहट थी—किसी के इंतज़ार की गूँज। अनू ने मणि को उठाया—यह उसका आख़िरी फैसला था—पर जैसे ही उसने मणि को हाथों में लिया, पानी के भीतर से एक हाथ निकला और उसकी उँगलियों पर छू गया—एक ठंडी पकड़। लीना ने चीख मारी—पर वहां कोई आवाज़ नहीं सुनाई दी। अनू ने देखा—उसकी माँ की स्मृति झलक गयी—किसने उसे छोड़ दिया था? पर फिर उसने मणि को कसकर पकड़ा और पूरे साहस के साथ समुद्र की तरफ़ फेंका।

अब जैसे ही मणि समुद्र में डुबकी लगी, पानी अचानक उबालता हुआ सामने आया—छोटी-छोटी लहरें चढ़ीं और फिर वापस हटने लगीं। एक जादुई स्तिथि थी—जैसे समुद्र ने ग्रहण कर लिया हो, पर उसकी गहराई में से किसी ने एक स्वर निकाला—“तुमने क्या किया?” और उसी क्षण, दूर गाँव के घरों की खिड़की पर कुछ लोग उठकर देखे—उनकी आँखें अपने-अपने स्थान पर बंद थीं; पर उनकी आवाज़ें टूट गयीं। अगले तीन दिनों में गाँव में उसी रात कुछ लोग नदारद हुए—जिन्हें मशीन की भाषा बदल ने के बाद भी वे वापस आये पर कुछ अंदर से खो गया था। उन लोगों में लीना की माँ भी थी—वह अजीब तरह की चुप्पी में वापस आयी, पर आँखों में खालीपन था। अनू के मन में यह विचार आया कि मणि को समुद्र में फेंक कर उसने संतुलन तो बना दिया, पर किसी और की कीमत पर।

गाँव की बुजुर्गों ने तब एक प्राचीन सत्य कहा—“कभी-कभी वस्तु को वापस छोड देने से संतुलन नहीं आता—उसके लिये तुम्हें एक कहानी पूरी करनी होगी।” अनू ने महसूस किया कि वह कहानी उसकी माँ से जुड़ी थी—उसकी माँ ने वर्षों पहले एक वादा किया था और उसे पूरा नहीं किया गया। अनू ने गाँव की बूढ़ी महिलाओं के साथ मिलकर पुरानी दस्तावेज़ों को पढ़ा—और पाया कि उसके दादा ने गाँव के कुछ लोगों की जमीन पर अनैतिक कब्जा कराया था; और उसे वही जमीन restitute करनी होगी। अनू ने निर्णय लिया—वह अपनी माँ के बचपन के घर की जमीन उन परिवारों को लौटा देगी—यह उसका युद्ध था—एक मानव व साधारण तरीका—जिसमें उसने मणि की शक्ति का उपयोग नहीं किया पर अपने कृत्य की भरपाई में मट्टी का हाथ रखा।

धीरे-धीरे, अनू ने गाँव के लोगों के साथ मिल कर उन जमीनों को लौटाया। कुछ लोगों ने रो कर धन्यवाद किया, कुछ ने चिल्ला कर विरोध किया—पर जो वादा था, वह पूरा हुआ। पथरीली शाम में, ताल के पानी की चमक कम हुई और किनारे पर जो परछाइयाँ थीं वे हल्की पड़ने लगीं—मानो किसी भारी बोझ की परत उतर गयी हो। लीना की आवाज़ भी पक्का हुई—वह फिर से वही हास्य वाली लड़की बन गयी। पर कुछ लोग लौटे पर अलग थे—उनके चेहरे पर अब भी कोई नमी थी जो समुदाय की हंसी में घुल नहीं पाई। अनू ने सीखा—कभी-कभी सच्चाई स्वीकार कर लेने का अर्थ यह नहीं कि दर्द चला जाएगा; बल्कि यह कि दर्द साझा हो जाएगा और लोग जीवन के साथ उसे उठाना सीखेंगे।

कहानी का आख़िरी दृश्य एक शांत सुबह में है: अनू मणिकुंड के किनारे खड़ी है, पीछे समुद्र की असीम रिक्तता और सामने गाँव के लोग जो अपने कामों पर लौटे हैं। मणि अब कहीं समुद्र की गहराइयों में है या कहीं किसी और जगह पर — यह अज्ञात है। पर मरणूर ने फिर से सांस ली—कम-से-कम उस हफ्ते के लिये। अनू ने डायरी निकाली और लिखा—“हिम-नदी, बैकवाटर और मानव—तीनों में संतुलन है। जब हम उससे छेड़छाड़ करते हैं, तो वह हमें अपने तरीके से वापस पूछता है। कभी-कभी प्रश्न कठोर, कभी-कभी शांति।”

अंत में, गाँव ने सीखा कि कुछ चीज़ें सिर्फ़ कभी नहीं भूलनी चाहिए — और मणि की कथा उस सीख की याद थी। अनू ने जाना कि उसका ज्ञान, विज्ञान और मानवता—तीनों मिल कर ही किसी जगह की असल शांति दिला सकते हैं।

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