झील का रहस्य – मृत्युपुर की डायरी

लेखक का नोट:
ये पन्ने मुझे मृत्युपुर गाँव के पुराने डाकघर के बंद तहख़ाने से मिले। पन्ने पीले, किनारे जले हुए, और कुछ हिस्से धुंधले। तारीख़ें 1989 की हैं…


डायरी – 1 मार्च 1989

सुबह 8:15 बजे
आज मैं मृत्युपुर पहुँचा हूँ। छोटा-सा गाँव, चारों ओर घना जंगल, और बीच में एक झील… या कहूँ तो एक काला, स्थिर पानी का गड्ढा। गाँव वालों ने नाम रखा है “अंधझील”।
मुझे यहाँ एक महीने रहकर झील का सर्वे करना है। सरकारी काम है, पर गाँव वालों की नज़रों में मैं एक बेवजह का मेहमान हूँ।

शाम 6:40 बजे
गाँव के बुजुर्ग ने चेतावनी दी – “सूरज ढलते ही झील से दूर रहना… वहाँ रात को पानी नहीं, कुछ और हिलता है।”
मैं हँसकर निकल आया। पर पता नहीं क्यों, वो बूढ़ा कांप रहा था।


डायरी – 2 मार्च 1989

सुबह 7:50 बजे
झील के पास पहली बार गया। पानी में कोई लहर नहीं, हवा बिलकुल नहीं, लेकिन ऐसा लगा कि सतह के नीचे कुछ धीरे-धीरे साँस ले रहा है।
मैंने पत्थर फेंका – छपाक! आवाज़ के बाद लहरें आईं… पर वो लहरें गोल नहीं थीं, लंबी… जैसे कोई साँप।

रात 11:15 बजे
कमरे में मोमबत्ती जलाकर लिख रहा हूँ। बाहर से पानी टपकने जैसी आवाज़ आ रही है, जबकि बारिश नहीं है।


डायरी – 3 मार्च 1989

दोपहर 1:20 बजे
गाँव के बच्चे खेलते-खेलते झील के पास गए थे। अचानक सब भाग आए। एक बच्चा रोते-रोते बोला – “पानी के नीचे से किसी ने मेरा पैर पकड़ा।”
मैंने देखा – सच में उसके टख़ने पर नीले-से उँगलियों के निशान थे… जैसे किसी ने ज़ोर से पकड़कर खींचा हो।


डायरी – 4 मार्च 1989

सुबह 6:10 बजे
आज झील पर कोहरा इतना घना था कि किनारा भी नहीं दिख रहा था।
पर मुझे कोहरे के बीच एक और किनारा दिखा — पर वो मेरे नक्शे में नहीं था।


डायरी – 5 मार्च 1989

रात 12:05 बजे
मैं जाग रहा हूँ क्योंकि बाहर झील की दिशा से किसी औरत के गाने की आवाज़ आ रही है…
आवाज़ मधुर है, पर बीच-बीच में पानी के बुलबुले फूटने की ग्लप-ग्लप ध्वनि सुनाई देती है।
खिड़की से देखा — धुंध के बीच झील के किनारे एक सफेद साड़ी में कोई खड़ा है… और धीरे-धीरे मेरी ओर देख रहा है।


डायरी – 6 मार्च 1989

दोपहर 3:30 बजे
गाँव के बूढ़े पंडित ने मुझे अंधझील की कहानी सुनाई –
कई साल पहले यहाँ एक पूरा गाँव झील में डूब गया था। कोई तूफ़ान नहीं, कोई भूकंप नहीं… बस पानी अचानक ऊपर उठा और सबको निगल गया।
औरतें, बच्चे, जानवर — सब के सब…
पंडित के शब्द: “उनकी आत्माएँ पानी में फँस गईं… और रात को भूखी होती हैं।”


डायरी – 7 मार्च 1989

रात 1:45 बजे
मैं बाहर निकला… गलती थी।
झील के पास वही सफेद साड़ी वाली औरत खड़ी थी, पर इस बार उसके चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं… सिर्फ़ गहरे काले गड्ढे।
उसने हाथ उठाया… और पीछे झील में से कई हाथ निकलने लगे — सड़े-गले, पानी टपकाते हुए।


डायरी – 8 मार्च 1989

सुबह 10:00 बजे
गाँव में अफ़वाह है कि मैंने “उसे” देख लिया है, अब मेरा बचना मुश्किल है।
गाँव वाले मुझे यहाँ से जाने को कह रहे हैं… लेकिन सरकारी काम अधूरा है।


डायरी – 9 मार्च 1989

रात 11:58 बजे
दरवाज़े पर पानी की बूंदें टपक रही हैं… लेकिन बाहर कोई बाल्टी या घड़ा नहीं।
मैंने दरार से झाँका — ज़मीन पर गीले पैरों के निशान… जो सीधे मेरी खिड़की की तरफ़ जा रहे हैं।


डायरी – 10 मार्च 1989

सुबह 5:40 बजे
नींद टूटी तो पाया कि कमरे में पानी भर गया था… पर दरवाज़ा और खिड़की बंद थे।
पानी ठंडा नहीं, गुनगुना था — जैसे किसी का शरीर का तापमान हो।


डायरी – 11 मार्च 1989

दोपहर 12:00 बजे
गाँव के एक बुजुर्ग ने चुपके से कहा – “अगर रात में झील तुम्हें पुकारे, तो मत देखना… वरना तुम भी उसी में समा जाओगे।”
अब मैं डरने लगा हूँ…


डायरी – 12 मार्च 1989

रात 2:15 बजे
मैंने वही आवाज़ फिर सुनी — “आ… आओ…”
मेरे कदम खुद-ब-खुद झील की ओर बढ़ने लगे।
जैसे किसी ने मेरे दिमाग़ पर धुंध डाल दी हो।
अचानक पीछे से किसी ने ज़ोर से खींच लिया… गाँव का पंडित था। उसने चिल्लाकर कहा – “पीछे देखो मत!”
मैंने नहीं देखा… पर मुझे पानी में अपने ही चेहरे जैसा कुछ हिलता दिखा।


डायरी – 13 मार्च 1989

सुबह 9:00 बजे
आज पंडित मुझे गाँव से बाहर भेजना चाहता है… पर मैं एक आख़िरी बार झील का सर्वे करूँगा।
यह पन्ना शायद मेरा आख़िरी नोट हो…


[इसके बाद डायरी के पन्ने आधे गीले और धुंधले हैं… आख़िरी एंट्री पढ़ने लायक है]


डायरी – 13 मार्च 1989, रात 11:59 बजे

मैं झील के बीच में नाव में हूँ।
पानी स्थिर है… पर नीचे से कुछ बुलबुले उठ रहे हैं।
अचानक नाव हिलने लगी…
सफ़ेद हाथ पानी से बाहर आए, मेरी ओर बढ़ते हुए…
मैंने रोशनी मारी — और देखा कि सबके चेहरे… मेरे जैसे हैं।
उनमें से एक ने कहा – “अब तुम हमारे हो…”

पन्ना यहीं ख़त्म।
बाक़ी हिस्सा गीलेपन में गल चुका है…

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