खूनी झील का शाप

कोलकाता के दो युवा फोटोग्राफर — अदिति और रोहन — एक सुनसान झील की कहानियाँ सुनकर वहां जाते हैं। झील के पानी में परछाइयाँ लहराती हैं; वे जो देखते हैं वह सिर्फ़ भय नहीं, बल्कि किसी पुराने, भयंकर शाप की पुनरावृत्ति है।

1 — रास्ते की शुरुआत
रात का घिरना।
सड़क धुंध में गायब।
कार की हेडलाइट हल्की-सी कँपकँपा रही थी।
“फूँ… फूँ…” — ठंडी हवा ने टायरों के नीचे सूखी पत्तियों को उड़ा दिया।
केसुरी अंबर से चाँद झिलमिला रहा था, आधा चन्दा जैसे आधा सच।
पेड़ों की पंक्तियाँ दीवार बनी जा रही थीं।
सड़क के किनारे आलते-पालते खड़केड़े।
दूर कहीं भरे खेतों में झरझरा गंध।
गाड़ी धीमी हुई।
रोहन बोला, “यहाँ से कट कर, नक्शे पर छोटा रास्ता है।”
अदिति ने खिड़की से बाहर देखा।
धुंध की परत गड़ी हुई थी जैसे किसी ने काँच पर दूध लगा दिया हो।
“खट-खट… खट-खट…” — काँच पर बूंदों की आवाज नहीं, कुछ ठोकरें।
रोहन ने मुस्कुरा कर कहा, “यहाँ कुछ शूट मिलेंगे।”


2 — पहली झलक
जंगल के बीच से गुजरते हुए रास्ता अचानक खुला।
और सामने — झील।
एक खुला, चौरस-सा पानी का चश्मा, किनारे पर लताओं की भारी झाँकी।
पानी बिल्कुल स्थिर।
चाँद की रोशनी पानी पर फैलकर हल्का जामुनी बना रही थी।
पानी के ऊपर जैसे कोई चमकीली चादर बिछी हो।
“श्श… श्श…” — हवा का एक बेहद धीमा सरसराना।
रोहन ने कैमरा उठाया। शटर की आवाज़ नहीं आयी।
अदिति का हाथ कंपकपा गया, टॉर्च ऑन किया — टॉर्च ने धुँआसा-सा प्रकाश छोड़ा, और फिर काफ़ी अचानक बंद हो गया।
“क्लिक… (साइलेंस)” — कैमरा भी अपने आप रुक गया।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
अदिति ने देखा — झील के बीच कुछ धुंधला सा उठ रहा है, जैसे कोई आकृति।
रोहन बुदबुदाया, “पूरी रात तो नहीं रुकेंगे…”
फिर पानी में गहरे से — एक गोइठ-सा उठना।


3 — लड़की पानी पर
क़रीब आया तो दिखा — वहां एक लड़की खड़ी है।
ग़ैर-जा रही साड़ी, भीगी लंबी ज़ुल्फ़ें, चेहरा धुंधला, पर आँखें — बिल्कुल खाली, पुतलियाँ नहीं।
उसकी साँसें नहीं चल रही थीं।
लेकिन वह झील के ऊपर तैर रही थी — जैसे पानी उसे पकड़ रहा हो।
रोहन की उँगलियाँ कैमरे पर तरह-तरह हिलने लगीं।
कैमरा खुद-ब-खुद ज़ूम इन कर रहा था।
“ट्रर… ट्रर…” — कैमरे की लाइन में अजीब फ्रिक्शन की आवाज़ें।
अदिति ने पप्पीटी आवाज़ में कहा, “हमें वापस चलना चाहिए।”
लड़की ने हौले से मुड़ा — और देखा।
उसने अपने मुँह से एक बर्फीली हँसी निकाली — कोई आवाज़ नहीं, पर कानों में ठंडा साया उतर गया।
“हँ… हँ…” — हवा के साथ कुछ ठन्डा गूँजा।
लड़की ने हाथ उठाया, और झील के पानी से कुछ गिरा — एक छोटा सोना-सा पत्ती जैसा टुकड़ा।
वह पत्ती हवा में घूम कर अदिति के पैरों के पास गिरी।
अदिति ने बेंच पर गिर कर देखा — पत्ती पर खून के भी छोटे-छोटे दाग।
रोहन ने कहा, “ये असामान्य है।”


4 — गांव के लोक-कथक
गाँव की ओर से धीमी-धीमी किसी ने धुन बजायी — बाँसुरी जैसी।
धुन पुरानी थी, और उसमें उदासी भरी थी।
उन दोनों ने सुना— और फिर किसी बूढ़ी औरत की आवाज़ भी आई — बाहर के एक झोपड़ी से।
“वो झील… नहीं छूओ, नहीं छूओ।”
“कई बरसों से शाप पड़ी है।”
बूढ़ी ने दरवाज़ा अँधेरे में से थोड़ा खोला और फिर चुप।
रोहन ने पूछा, “कौन हो आप?”
औरत बोली, “हम यहाँ के नहीं—पर यहाँ के इतिहास से जुड़े हैं।”
वह बोली — “बचके रहो, बच्चे। झील की गोद में आती हर आत्मा का हिसाब लिखा गया है।”
अदिति ने धीरे पूछा — “क्या हुआ था?”
औरत ने कहा — “सालों पहले — एक दहेज़-सम्बन्धी झगड़ा, और फिर एक रात, खून बहा, और झील ने सबको निगल लिया। तब से—” उसने कहा, “वो रातिनें फिर आती हैं। जब चाँद आधा हो, तब झील अपनी भूख दिखाती है।”
“टप… टप…” — नदी के किनारे पानी की बूंदें रहस्यमय ताल बना रहीं थीं।


5 — आईने जैसा कैमरा
रोहन ने कैमरा खोलकर किनारे रखा।
क्विक-लॉग पर उनकी तस्वीरें भी मिसमैच कर रही थीं।
दिलचस्प बात — कैमरा की स्क्रीन पर हमेशा एक अतिरिक्त फ्रेम रहता— जिसमें वह लड़की बार-बार झलकती।
कैमरा से निकली आवाज़ें तेज़ होती जा रही थीं—
“क्रैक… क्रैक…” — जैसे खामोशियों के बीच कुछ दरारें पड़ रही हों।
अदिति ने स्क्रीन में देखा— और अचानक अपने बचपन की झलक देखी— वह एक नदी में फिसलकर बचपन में डूबी थी; कोई उसे बचाता दिखा — पर आखिर में उसकी बाँहें झील की सतह पर लौट आईं।
रोहन ने कहा, “ये कैमरा हमें सच नहीं, बल्कि वह दिखा रहा है जो यहाँ हर रात बनता है।”


6 — पानी के नीचे की आवाज़ें
रात गहरी होती गयी।
झील के पानी के भीतर से कुछ धीरे-धीरे उठ रहा था — एक समूह आवाज़ों का संगम जैसे किसी ने पुरानी बांसुरी पर नाखून फेर दिए हों।
“घुर्र… घुर्र…” — पानी के भीतर कुछ खुरदरा सरक रहा था।
रास्ते पर एक पुराना नाविक आया— उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि ठहराव था।
वह बोला, “एक बार झील ने ले लिया तो लौटाती नहीं। पर कुछ रातें… कुछ लोगों को वापस लौटा देती है—बदला लेने के लिए।”
रोहन ने पूछा, “किसका बदला?”
नाविक ने जवाब दिया— “जो अपनी आत्मा को बेच बैठते हैं।”
और तब झील से एक नरम रोनी-सी ध्वनि उठी — जैसे किसी ने पत्थर पर गूँजती हुई कहानी पढ़ दी हो।
“रू-रू…” — आवाज़ें छोटी-छोटी कराहों में बदल गयीं।


7 — पहली गिरफ्तारी
अचानक वह लड़की जिसकी पुतलियाँ नहीं थीं, उनके करीब आ खड़ी हुई।
उसने हवा में उंगलियाँ घुमाईं— और झील की सतह से बारी-बारी कई छोटी-छोटी परछाइयाँ उठीं।
पहली परछाई ने अदिति के पैर पकड़ लिये— हल्की-सी टाइटिंग — जैसे कोई ठंडी हथेली उनके टखनों पे लिपटी हो।
“क्लिक-क्लक…” — लकड़ी के पुल की आवाज़।
अदिति पीछे हटना चाही, पर पैरों में से कुछ खिंच कर नीचे जा रहा था।
रोहन ने झट से हाथ पकड़ने की कोशिश की— पर उसका हाथ अचानक भारी हो गया, जैसे किसी ने लोहे का ओझा बांध दिया हो।
आस-पास की हवाएँ हाथों की तरह फैल गयीं और दोनों के रोंगटे खड़े हो गये।
लड़की की आवाज़ का निचला स्वर बाहर से गूँज रहा था— “लौट जाओ…”


8 — पुराने दिन वापस आते हैं
अदिति को झील के भीतर पुराने दृश्य दिखने लगे — वह दिन जब उसकी दादी ने उसे कहा था कि नदी के पास नहीं जाना।
वह बचपन में एक गंध महकती हुई महसूस करती— केवला पान और भच्चे हुए आम का।
पर वह गंध अब गंध नहीं रह गयी— यह बदली हुई, खून सी महक थी।
रोहन को भी अचानक अपने गांव की याद आई— जहाँ उसकी माँ ने रात में उस पुराने मंदिर के बाहर घोड़े की घंटी बजती सुनी थी।
तभी झील के ऊपर से एक स्याह-क़तरा मँडराया और गिर कर उनकी आँखों में चमक गया— चमकने के बाद वह कण झुक कर साड़ी की लय में समा गया।


9 — गाँव का रहस्य खुलता है
नाविक ने बताया — “यह झील पुरानी थी— पहले इसे साधु लोग पवित्र मानते थे। पर फिर एक लालची ठाकुर ने जमीनी हक़ में नज़र कर ली। उसने गाँव वालों को धमकाया, और जब उनकी महिलाओं ने विरोध किया—ठाकुर ने रातों-रात दफन करवा दिया।”
उसने कहा — “उनकी आत्माएँ न शांत हुईं, न चलीं। पानी ने सभी बचपनों को निगल लिया।”
और फिर नाविक ने खामोशी से कहा— “जो भी गाँव छोड़ कर गया, उसने कभी सच में नहीं छोड़ा।”
“डूँ…डूँ…” — दूर मंदिर की घंटी गूँजी, पर ध्वनि मानो उल्टी दिशा से आ रही थी।


10 — बचने की कोशिश और गिरना
रोहन और अदिति दौड़ पड़े।
रास्ते पर पेड़ के नीचे कुछ कंकड़ खिसक कर उनके पैरों में फंस गये।
“क्रांस— क्रांस।” — रात के छोटे-छोटे ढलान पर कदमों की असामान्य आवाज।
जैसे ही वे भागे, झील का पानी अचानक उठ कर उनके रास्ते में लहर बन गया— और एक विशाल परछाई उनके ऊपर से निकल कर अँधेरे में खो गयी।
अदिति चिल्लायी— “रोहन!”
रोहन ने पीछे मुड़ कर देखा— झील के ऊपर एक रूप उभरा— पुरानी साड़ी पहनकर, और अब उसके हाथ में कुछ था — एक हड्डी सी छड़ी।
उसने हौले से कहा— “जो लौट कर आए, उनका नाम झील लिखती है।”
रोहन ने खुद को झट से मोड़ा और उन्होंने एक पुरानी रेल की पटरी की ओर छलाँग लगाई— जहां मिट्टी में धाँसू निशान थे।
“धप— धप—” — उनकी साँसें घबराई हुई थीं।
पर पटरी एक जाल निकली— जैसे मिट्टी ने उन्हें पकड़ लिया हो।

11 — आधी रात का बुलावा

(लंबी साँस)
रात और गहरी हो गई। चाँद अब और भी पतला, जैसे किसी ने उसे आधा काट दिया हो।
झील की सतह पर अब सिर्फ़ प्रतिबिम्ब नहीं, बल्कि हज़ारों छोटे-छोटे चेहरे उभरने लगे थे—बिना भाषा के, बिना आवाज़ के, पर आँखें बोल रही थीं।

(साउंड: धीमी, बास वाली घुरघुराहट — “घुर्र…घुर्र…”)

अदिति और रोहन, दोनों थके हुए, लेकिन एक अजीब तरीके की नसीहत में बंधे हुए, झील के किनारे एक टूटी सी हवेली के पास ठहर गए। हवेली की खिड़कियाँ टूटीं थीं, और दीवारों पर पुरानी लेखनी—लाल रंग से लिखे हुए हाथों के निशान—अभी भी गीले लगे थे।

नाविक ने धीमे स्वर में कहा, “तुमने उन नामों को देखा? जो पानी पर गूँज रहे थे? वे हमारे पुराने थे—और तुम्हारे भी।”

रोहन ने कैमरा पास किया—स्क्रीन पर नाम चल रहे थे, जैसे टेलीग्राफ़ की रोशनी:
“मधुबाला”… “गोपीनाथ”… “सत्यवती”… “रोहन” — और फिर वह नाम रोक कर रह गया—एक ठहराव, जैसे किसी ने अचानक शटर गिरा दिया हो।

(साउंड: कैमरे की हल्की क्लिकिंग और इलेक्ट्रॉनिक क्रैकल — “ट्र्रर—ट्र्रर”)

अदिति का दिल तेज़ हुआ। “मेरा नाम?” उसने फहत से पूछा।
नाविक ने सर झुकाते हुए कहा, “हर गाँव में कोई न कोई गलती करता है। पर जब गलती खूनी हो और उसकी गूँज पानी में रुक जाए—तो वो रचना बन जाती है।”


12 — हवेली की डायरी

हवेली के अंदर एक पुराना अलमारी था, और उसमें एक अख़रोट-झिल्ली वाली डायरी। पन्ने पीले, किनारे जले हुए।
अदिति ने दस्ताने पहने और पन्ना खोला। लेखनी हकलाती हुई थी—पर हर लाइन में दर्द था।

“ठाकुर ने कहा — गाँव हमारा है। हमने कहा — मेहनत हमारी है। वे रात आई, और फिर… कोई रोना नहीं बचा।
हम पानी में ग़ायब हुए — पर पानी ने हमारी कहानियाँ रख लीं।
जो लौट कर आता है, वह कभी पूरा नहीं लौटता। उसकी आँखों के भीतर झील रहती है।”

डायरी के आख़िरी पन्ने पर एक नक़्क़ाशी हुई तस्वीर लगी थी—वही लड़की, वही साड़ी, पर उस तस्वीर में उसके पीछे एक और चेहरा था—ठाकुर का। चेहरा काला, और सिर्फ़ एक आँख चमक रही थी।

(साउंड: पन्ना फड़फड़ाने की आवाज़ — “फड़—फड़—”)

रोहन ने धीरे से पूछा, “तो ये सब किसने बनाया?”
नाविक ने कहा, “जो भी ताक़त है, उसने ठाकुर की लालसा को पकाया और उसे जगह दी—झील ने बदले की भूख पाल ली। पर बदला चुकता करने के लिए आत्माओं को कलम देना पड़ता है—और उस कलम से कई लोग लिखे गए।”


13 — पार/अपराधी की परछाई

अचानक हवेली के दरवाज़े पर कोई खटका। एक रूप आया—एक मध्यम उम्र का आदमी, चेहरे पर मिट्टी की परत, आँखों में खरोंच। वह कहते हुए आया, “मैं… मैं वही हूँ जो ठाकुर से अलग फाँस गया था। मैंने उसे उस रात देखा—वह झील के किनारे खड़ा था, और उसने कहा—‘जलना होगा, तब शांति मिलेगी।’”

आदमी ने दहाड़ लगाई, “मैंने उसे रोका—पर मेरा हाथ फिसला, और वह गिर पड़ा। ठाकुर की चीखें—(हॉरर श्रेक) — और फिर पानी ने सबको ले लिया।”

(साउंड: अचानक तेज़ गूँज — “आआआ!”)

अदिति ने महसूस किया कि वो धड़कनें अब सिर्फ़ उनके हिस्से नहीं रह गई थीं—वे गाँव की धड़कनें बन चुकी थीं।

आदमी ने आँखें घुमाईं—और उसकी परछाई दीवार पर अचानक से लंबी हो गई—मानो वह खुद से बाहर निकल आई हो। परछाई ने भाषाहीन स्वर में कहा, “तुमने देखा है… पर तुमने नहीं सुना।”


14 — झील के तले का द्वार

नाविक ने चुपके से एक बात कही—“नीचे एक द्वार है। गहरे पानी में, जहाँ रात की झिलमिलियाँ रहती हैं। अगर तुम सच जानना चाहो तो वहाँ जाना होगा।”

रोहन का कैमरामैन दिल मानने को तैयार नहीं था—पर जिज्ञासा ने धमकी दी। वे सब नाव में बैठे—नाविक ने रस्सी खींची और नौका धीमी-धीमी पानी में सरकी। पानी ठंडा नहीं, बल्कि ठिठुरा देने वाला था।

(साउंड: ताल की खटखट — “टप…टप… टप…”)

नौका बीच झील पर पहुँची। पानी के नीचे से एक काले छेद का गिर्दा दिखा—जैसे किसी ने धरती खोदी हो और वहाँ से अँधेरा निकलता हो। नाविक ने कहा, “यहाँ उतरना आत्महत्या है—पर पहले उतरने वाले यही कहते थे—हम वापस लौट आये।”

रोहन ने कैमरा ज़ोर से पकड़ा। अदिति ने टॉर्च फिर से चालू करने की कोशिश की—पर टॉर्च इस बार भी धुँधली चमकी और फिर लुप्त हो गई।


15 — दहशत का दर्पण

नाविक ने रस्सी को बाँधा और अपना एक छोटा दीपक जलाया—दीपक की लौ ने थोड़ी सी रोशनी दी। अचानक दीपक के ऊपर किसी ने तेल फेंका—लौ बढने के बजाए धुँआ बनकर ऊपर चली गई। दीपक की लौ दिखाई तो दे रही थी पर उसको चीरती हुई कोई परछाई उस पर उछलती रही—परछाई के नृत्य में समूचे गढ़ की आवाज़ गूँज रही थी—मांगें, दोष, चीखें; सब एक साथ।

(साउंड: दीपक की खिंचती हुई लौ — “स्स्स्स…” और फिर पिस्स-पिस्स की हल्की चीख)

आँखें बंद करके रोहन ने गहरी साँस ली—और अचानक उसने देखा कि पानी की गहराई से कोई पत्र — पुराना, भिंडा हुआ — ऊपर आया। पत्र पर लिखा था:
“तुम्हारा नाम — लिखित है। वापसी का रास्ता नहीं।”

अदिति ने हाथ से पत्र छू लिया—और उसकी त्वचा पर अचानक किसी पुरानी घटना की याद उतर आई—उसकी दादी की वह रात; जब दादी ने उसे कहा था—“नदी से लगकर भी डर रखना”। उसकी आँखों के सामने अचानक वही चेहरा आया—लड़की का चेहरा—पर अब वह बात उसमें कुछ और था—टूटे हुए शब्द, असहाय प्रार्थना।


16 — सामना: आत्माओं का सदन

नाविक ने कहा, “अब जो हो रहा है—वह केवल शुरुआत नहीं। वे आत्माएँ जो खा गईं—वह सब वापस अमल में पीछे खींच रही हैं—तुम्हारे भीतर जो बचा है, उसे पूरा करने के लिए।”

और फिर झील ने एक बड़ा लहर बनाया—नौके के चारों ओर पानी चढ़ा और एक काली हवी छवि उभरी—ठीक बीचोंबीच एक दरवाज़ा, जो पानी का नहीं, बल्कि अँधेरे का था। उस दरवाज़े पर पन्ने लगे थे—हर पन्ने पर एक-एक नाम लिखा हुआ था—उन नामों में रोहन और अदिति के भी नाम झिलमलाए।

(साउंड: दरवाज़े के चरमराने की आवाज — “क़र्र्र—क़र्र्र”)

रोहन का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने नाविक से पूछा—“हम वापस नहीं जा सकते?”
नाविक ने ठंडे स्वर में कहा, “वापसी का मतलब यहाँ से जाना नहीं—यहां से निकलना है, पर इसके लिए तुम्हें पहले पहचानना होगा कि तुम कौन हो।”

अदिति ने अचानक कहा—“मैं जानती हूँ कि मैं कौन हूँ।” उसकी आवाज़ में अब कुछ अलगपन था—कड़वाहट, और साथ में स्वीकार। “मैंने बचपन में एक वादा किया था—खुद को बचाने का। पर मैंने किसी और की खुशी को चुना और अपनी को मिटा दिया। अब वह दस्तावेज मुझे अपने वजूद तक खींच रहा है।”


17 — आत्म-स्वीकृति का अनुष्ठान

नाविक ने कहा, “हर आत्मा जो लौटती है, उसे ठीक उसी चीज़ की ज़रूरत होती है जिसकी कमी थी—एक सच, एक सच्चाई, एक नाम।” उसने एक छोटा घड़ा निकाला—घड़े में मिट्टी, और मिट्टी में कुछ कंकड़। उसने कहा, “तुम्हें झील को एक नई कहानी देनी होगी—एक सच्ची कहानी। तभी यह दरवाज़ा बंद होगा।”

रोहन ने कदम बढ़ाया—उसने कैमरा खोला और झील की तरफ़ बोलना शुरू किया—“हमें बताओ—तुम्हारे साथ क्या हुआ?” उसकी आवाज़ कंपकपाई लेकिन सच्ची थी। वो कैमरा अब सिर्फ़ रिकॉर्डिंग का उपकरण नहीं रहा—बल्कि एक दर्पण बन गया था—जो सच को पकड़ता था।

(साउंड: रिकॉर्डिंग का धीमा बूँद-बूँद सा शोर — “टिक…टिक…”)

लड़की की परछाई झट से निकली और सीधा रोहन के सामने आई—उसने बिना पलक झपकाये कहा—“तुमने भी कहा था कि ठाकुर को माफ कर दोगे—पर तुमने हाथ जोड़कर नहीं किया।”

रोहन की आँखों में आँसू नहीं थे, पर फिर भी उसकी आवाज़ टूटते हुए निकली—“मैं डर गया था—मैंने देखा कि अगर मैं कुछ करूँगा तो मैं खुद खो जाऊँगा।” उसने बताया कि कैसे उसने छोटे-छोटे झूठ कह कर अपनी जगह बचाई—पर उसने सच्चाई को कभी स्वीकारा नहीं।


18 — नामों का पुनर्लिखित होना

अदिति ने डायरी उठाई। उसकी उँगलियों से स्याही निकलने लगी—पर वह स्याही खून नहीं, उसकी यादों की स्याही थी। उसने अपने नाम को डायरी पर फिर से लिखा—पर इस बार उसने लिखा:
“अदिति — जिसने देखा, सुना, और फिर—कदम बढ़ा कर सच स्वीकार किया।”

जैसे ही उसने यह लिखा, हवा थमी। पन्नों की गंध बदल गयी—खून की गंध हल्की पड़ी और उसकी जगह मिट्टी की गंध आई—जिन्दगी वाली मिट्टी। पानी के दरवाज़े पर लिखा एक-एक नाम मिटने लगा—पहले ठाकुर का नाम, फिर गाँव वालों के उन गुमनाम चेहरों के नाम।

(साउंड: पन्नों का धीरे से झुलस कर गड़गड़ाना — “स्स्स…स्स्स…”)

नाविक ने कहा, “सच लिखने से झील शांत होती है—पर हर सच की एक कीमत होती है।”

अदिति ने सिर उठाया—उसने देखा कि लड़की का चेहरा अब थोड़ा नरम हुआ था—नरम नहीं, पर शांत। परछाइयों ने पीछे हटना शुरू कर दिया—पर एक आवाज़ ने कहा—“जो पूरी तरह वापस आया, वह घर का नहीं रहा।”


19 — अंतिम दांव

द्वार अब धीरे-धीरे बंद होने लगा—पर तभी झील ने आख़िरी दांव खेला। पानी का एक बड़ा टुकड़ा निकला—और उसमें से ठकठकी की आवाज़: “नाम वापस करने होंगे।” नाविक, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी यहाँ बिता दी थी, बोला, “तुम्हें एक आदमी को यहाँ छोड़ना होगा—वरना सब कुछ फिर से खुल जाएगा।”

रोहन ने अचानक अपनी जेब में देखा—उसके पास वही पेपर था जो उसने बचपन में खोया था—एक फोटो जिसमें एक औरत और एक बच्चा थे—और उस बच्चे के चेहरे पर रोहन की झलक थी। उसने महसूस किया—वह फोटो उसकी अंतिम कड़ी थी—उसने अपने पिता को बचाने के लिए कुछ किया था, और पिता ने खुद को खो दिया।

(साउंड: तेज़ अंदर से ठण-ठण की टक्कर — “ठण…ठण…”)

रोहन की आँखों में मजबूरी और प्यार दोनों थे। उसने कहा, “मैं यहाँ किसी को नहीं छोड़ूँगा।” उसकी आवाज़ में दृढ़ता थी। वह कैमरा नीचे रखकर दरवाज़े के सामने गया—और उसने अपना नाम खारिज किया—नहीं, उसने उसे नहीं मिटाया, बल्कि खुद को दरवाज़े के सामने रखा—एक उद्धरण, एक नया विकल्प।


20 — टूटना और फिर शांति

दरवाज़ा जोर से बंद हुआ—जैसे किसी ने उसे भीतर से बंद कर दिया हो। पानी की लहरें वापस झुक गयीं। नाविक के चेहरे से सारी थकान और संतोष झलक उठा—वह मुस्कुराया, फिर जैसे कोई भारी बोझ हल्का हुआ हो, उसका श्वास धीमा और शांत हो गया।

अदिति और बाकी लोग चिल्लाये—पर फिर भी कुछ शांत हो गया। हवेली की खिड़कियाँ खुलने लगीं, और बाहर से पहली हल्की-सी रोशनी आई—पूरा आसमान धीरे-धीरे नीले और सुनहरे रंगों से भरने लगा—एक मृदु-भोर।

(साउंड: पहली चिड़िया की चहचहाहट — “चि-चि-चि” और दूर-दूर घंटी की मंद-सी आवाज)

पर सब कुछ साफ़ नहीं हुआ—कुछ परछाइयाँ अभी भी किनारों पर थीं—दूर से एक राहगीर ने कहा, “जो गया, वह गया; पर जो बचा, वह यहाँ के हिस्से होंगे।”

नाविक ने कहा, “कभी-कभी झीलें सिर्फ़ खून ही नहीं रखती—वे यादें भी समेट लेती हैं। जो यादें वापस आती हैं, वे हमेशा यथार्थ को बदल देती हैं।”


21 — अंत या फिर आरम्भ? (ट्विस्ट)

अदिति और रोहन वापस रास्ते पर निकल पड़े—काँपते हुए शरीर पर हल्की धूप का एहसास। पर रोहन का चेहरा बदल गया था—उसकी आँखों में अब एक गहरी, शांत परछाई थी—जो कभी पूरी तरह मिटती नहीं।

वह कैमरा वापस साथ ले गया—पर कैमरे की स्क्रीन पर अब सिर्फ़ तस्वीरें नहीं थीं—बल्कि एक नई फ़ाइल बन चुकी थी: “वापसी.mp4” — जिसमें रात की वह घटना रिकॉर्ड थी—पर आख़िर में कैमरे ने एक अंतिम फ्रेम पकड़ा—एक नया नाम, जो स्क्रीन के नीचे चमक रहा था: “नाविक”

रोहन ने चौंक कर कहा, “नाविक?” पर नाविक का चेहरा अब कहीं भी नहीं था—हवेली की छाया से भी वह गायब हो गया था।

अदिति ने पीछे मुड़ कर देखा—झील अभी भी शान्त दिख रही थी, पर उसकी सतह पर हल्की-सी लकीरें बाकी थीं—जैसे किसी ने अभी-अभी कुछ लिखा हो। उसने नज़दीक जाकर देखा—और वहाँ, पानी पर, एक नया नाम उभर आया—“अदिति”—पर उसके नीचे एक और वाक्य था—छोटी, सुनहरी लिपि में:
“फिर मिलेंगे”

22 — गाँव की खामोश सुबह

सूरज ऊपर चढ़ आया था, लेकिन रोशनी अजीब तरह से बिखरी हुई थी—छायाएँ बहुत लंबी थीं, और धूप का रंग हल्का नीला पड़ता जा रहा था।
अदिति और रोहन दोनों चाय की दुकान पर बैठे थे, पर दोनों के मन में कोई सुकून नहीं था।

(साउंड: दूर से आती, बेसुरी चिड़ियों की आवाज — “काँँ-काँँ… चि… चि…”)

दुकानदार उन्हें घूर रहा था—ठीक वैसे जैसे झील ने पिछली रात किया था।
उसने पूछा,
“तुम लोग रात में झील के पास थे?”
अदिति ने कहा, “हाँ। क्यों?”
दुकानदार के चेहरे पर पसीना आ गया,
“तो तुम… बच कैसे आए?”

रोहन ने शांत चेहरा बनाया, पर उसकी आँखों में हल्की-सी कंपकंपी थी—जैसे किसी दूसरे का डर उसके भीतर बैठ गया हो।


23 — नाविक का गायब होना

दुकानदार ने एक खबर दी—
“आज सुबह गाँव के लोग कह रहे थे… कि नाविक का शव झील के किनारे मिला है। पूरा शरीर काला पड़ा था, जैसे रात भर किसी ने उसे निचोड़ कर सुखा दिया हो।”

(साउंड: “धड़ाम”—काँच का गिलास रोहन के हाथ से गिरा)

रोहन और अदिति दोनों खड़े हो गए।
रोहन ने चिल्ला कर कहा,
“नाविक कल रात हमारे साथ था! वो हमें झील के बीच तक ले गया!”

दुकानदार ने कांपते हुए कहा,
“नाविक…?
साहब, वह तो तीन साल पहले ही मर गया था।
उसकी आत्मा झील से बंधी थी — जीवितों को रास्ता दिखाने के लिए नहीं…
बल्कि उन्हें वापस अंदर खींचने के लिए।”

अदिति का दिल धक-धक कर उठा।
रोहन की साँस भारी होने लगी।


24 — कैमरे के अंदर बंद आत्मा

वे दोनों तुरंत कैमरा देखने लगे।
कैमरा चालू किया—पर स्क्रीन पर सिर्फ़ कोहरा

फिर एक-एक कर पिछली रात वाली तस्वीरें खुलीं।
लेकिन हर फ्रेम में…
नाविक नहीं।
जहाँ वह खड़ा था, वहाँ बस काली छाया, जैसे कालिख का धब्बा।

फिर अचानक कैमरे की स्क्रीन पूरी लाल हो गई।
बीच में एक लाइन उभरी:

“वह तुम्हें छोड़ कर नहीं गया है।”

(साउंड: कैमरे से आती हल्की खरखराहट — “क़र्क… क़र्क…”)

अदिति ने कैमरा फेंक दिया।
कैमरा जमीन पर गिरकर “टिक”—“टिक”—“टिक” करता रहा,
मानो अंदर कुछ चलने लगा हो।


25 — हवेली की वापसी

दोपहर होने के बावजूद रास्तों पर अजीब धुंध घिर आई।
“ये धुंध… सुबह वाली नहीं है,” अदिति ने कहा।
रोहन ने कहा, “ये झील वाली है।”

वे उस हवेली की ओर भागे—जहाँ नाविक ने उन्हें डायरी दिखाई थी।
पर हवेली अब नहीं थी।
उसकी जगह सिर्फ़ खाली जमीन।

पर जमीन पर…
उसी डायरी का एक पन्ना पड़ा था।

पन्ने पर खून जैसे लाल अक्षरों में लिखा था:

“जो सच स्वीकार नहीं करता, वह कहानी का हिस्सा बन जाता है।”
“अब तुम्हारी बारी है—कौन कहानी लिखेगा?”

अदिति को लगा जैसे उसकी रीढ़ में किसी ने बर्फ डाल दी हो।


26 — नाविक की आवाज़

अचानक हवा में फिर वही आवाज़ गूँजी—
धीमे, गीले स्वर में, जैसे कोई पानी के भीतर बोल रहा हो:

“अदिति…”

(साउंड: पानी के भीतर से आती आवाज़ — “ग्लू—ग्लॉ”—“अदिती…”)

अदिति ठिठक गई।
आवाज़ पहचान में आने लगी।

हवा से नहीं,
धरती से नहीं,
बल्कि…

रोहन की छाया से।

उसने देखा—रोहन की परछाई उसके शरीर से अलग होकर लंबी होती जा रही थी,
अलग…
और आगे बढ़ रही थी।

अदिति ने चीखकर कहा,
“रोहन! रुक जाओ! तुम्हारी छाया—”

रोहन लड़खड़ा गया।
उसका चेहरा सफ़ेद।
उसकी गर्दन के पीछे नीले-काले निशान उभरने लगे—वही निशान जो नाविक के शरीर पर पाए गए थे।


27 — रोहन पर झील की पकड़

रोहन जमीन पर गिरा।
उसके होंठों से फुसफुसाहट निकली—
पर उसकी आवाज़… उसकी नहीं थी।

“झील ने मुझे चुना है।”
“मैंने दरवाज़ा बंद किया… इसलिए दरवाज़ा मुझ पर खुल गया।”

(साउंड: ज़मीन के नीचे से उठती खरखराहट — “क्र्र्र… क्र्र्र…”)

उसके शरीर से हल्का-सा धुआँ उठने लगा।
हर साँस के साथ जैसे कोई उसके अंदर से पानी निचोड़ रहा हो।
अदिति चिल्लाती रही—“रोहन! ये सब हमारी गलती नहीं!”

पर झील की आवाज़ फिर गूँजी—
“गलती? तुम्हें लगता है ये गलती है?
ये कर्ज़ है।”


28 — झील का असली रूप

अदिति दौड़ पड़ी—झील की तरफ़।
सूरज बीच आकाश में था, पर झील के ऊपर अँधेरा तैर रहा था।
झील अब पानी नहीं लग रही थी—
बल्कि पिघला हुआ सन्नाटा थी,
जहाँ परछाइयाँ ऊपर तैरतीं, फिर अंदर डूब जातीं।

झील की सतह पर एक-एक चेहरा दिखने लगा—
गाँव के लोग…
ठाकुर…
वह लड़की…
नाविक…
और अंत में—

रोहन का चेहरा।

अदिति चीख पड़ी।

(साउंड: कई आवाज़ों का एक साथ बोलना — “आओ…” “वापस…” “कहानी…” “पूरा…”)


29 — शाप का असली कारण

अचानक झील के पानी में से एक बूढ़ी औरत का चेहरा उभरा—
थका हुआ, पर कठोर।
वह बोली—

“इस झील को सूखा नहीं,
सच ने डुबोया है।”

उसने बताया—
सालों पहले गाँव में एक बच्ची गायब हुई थी।
लोगों ने ठाकुर पर शक किया, पर किसी ने उसके खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई।
गाँव वालों की चुप्पी ने उस बच्ची की मौत को झील में बांध दिया।
उसकी आत्मा वापस हर साल उसी चुप्पी को खाने लौटती है—
और हर लौटने वाली आत्मा इस झील का हिस्सा बन जाती है।

“और तुम दोनों,” उसने कहा,
“तुमने सच्चाई से मुँह मोड़ा।
उस रात… झील सिर्फ़ तुम्हें देखना चाहती थी।
पर अब झील तुम्हें माँग रही है।”


30 — निर्णय

अदिति के सामने दो रास्ते थे:

  1. रोहन को छोड़ दे—ताकि झील शांत हो जाए।
  2. झील में उतर जाए—और खुद उसके शाप को तोड़ने की कोशिश करे।

रोहन की परछाई धीरे-धीरे पूरी काली हो चुकी थी।
वह रेंगते हुए झील की तरफ़ जा रहा था।

अदिति ने हाथ बढ़ाया—पर उसका हाथ झील की ओर खिंचने लगा।
उसने जोर से चिल्लाया—
“रुको! मैं कहानी को खत्म करूँगी!”

झील अचानक शांत हो गई।
चारों तरफ़ सन्नाटा।

(साउंड: पूरी चुप्पी… फिर बहुत धीमी धड़कन — “डुम… डुम… डुम…”)


31 — अंतिम कदम

अदिति ने झील की सतह पर कदम रखा।
पानी ठंडा नहीं था—
गर्म था।
जैसे किसी ने उबलती यादों को नीचे बांध रखा हो।

उसने कहा—
“तुम्हें कहानी चाहिए?
मैं दूँगी।”

उसने अपने बचपन की यादें बयाँ करना शुरू किया—
अपनी दादी की चेतावनी,
झील के किनारे का बचपन,
और वो हादसा जब उसने सच को छिपा लिया।

हर शब्द के साथ झील उबलने लगी।

अचानक एक लहर ने उसे घुटनों तक खींच लिया।

(साउंड: पानी में डूबने की आवाज़ — “ग्लप—ग्लप—ग्लप”)

रोहन ने बहुत कमज़ोर आवाज़ में कहा—
“अदिति… वापस आ जाओ…”

अदिति मुस्कुराई।
“मैं वापस नहीं आ रही, रोहन।
मैं उसे वापस ला रही हूँ
जिसका बदला कभी पूरा नहीं हुआ।”

और उसके साथ—
झील का दरवाज़ा फिर से खुल गया।


32 — अंत… या आरम्भ फिर?

अगली सुबह, झील शांत थी।
पूरे गाँव में एक नई कहानी फैल चुकी थी—
कि झील ने दो आत्माएँ निगल लीं।

पर रात को—
झील की सतह पर दो परछाइयाँ तैरती दिखीं।
एक लड़की…
और उसके पीछे—

अदिति।

और दूर खड़ा—
एक तीसरा चेहरा भी उभर आया।
नाविक।

उन्होंने मिलकर कहा—

“कहानी खत्म नहीं हुई है।
अब झील हम हैं।”

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