अध्याय 1 : शवपुर की दहलीज़
घना अंधेरा फैला हुआ था। हवा सरसराते हुए सूखे पेड़ों से टकरा रही थी और दूर कहीं से किसी अज्ञात प्राणी की चीख सुनाई दे रही थी। यह कोई साधारण गाँव नहीं था, बल्कि एक ऐसा गाँव था जिसका नाम सुनकर ही लोगों की रूह काँप उठती थी—शवपुर।
लोग कहते थे कि इस गाँव की नींव ही खून और श्राप पर रखी गई थी। रात होते ही यहाँ इंसान नहीं, कुछ और जागता था। मैं, अभय, एक शोधकर्ता, वहाँ की झील और हवेली की गुत्थियाँ सुलझाने आया था। लेकिन मुझे नहीं पता था कि यह यात्रा मेरी ज़िंदगी बदल देगी… या शायद, खत्म ही कर देगी।
गाँव में प्रवेश करते ही सबसे पहले जो मेरी नज़र पड़ी, वह थी एक टूटी हुई पत्थर की पटिया। उस पर लिखा था—
“शवपुर में कदम रखने वाला इंसान कभी वापस नहीं लौटता।”
मैंने पढ़कर हंसी में टाल दिया, लेकिन भीतर कहीं न कहीं एक अजीब सा डर घर कर गया। गाँव बिल्कुल सुनसान था। टूटे हुए घर, अधजली झोपड़ियाँ और खामोश गलियाँ। सिर्फ हवा थी, जो कभी दरवाज़ों को हिलाती तो कभी खिड़कियों को। और हाँ—वह झील। गाँव के बीचोंबीच फैली हुई, स्थिर, लेकिन भीतर से जैसे उबल रही हो।
उस रात मैंने अपनी डायरी में पहली एंट्री लिखी:
तारीख़: 12 अक्टूबर, रात 8:15
“आज मैं शवपुर पहुँचा।
झील बेहद भयावह लग रही है।
पानी की सतह पर कोई हलचल नहीं, लेकिन लगता है जैसे कोई मुझे घूर रहा हो।”
गाँव के किनारे पर मुझे एक बुजुर्ग मिला। उसका नाम था रामचरन बाबा। उसकी आँखें धँसी हुईं और चेहरा झुर्रियों से भरा था। उसने धीमी आवाज़ में पूछा,
“बेटा, तू यहाँ किसलिए आया है?”
मैंने जवाब दिया,
“मैं एक शोधकर्ता हूँ, यहाँ की झील और हवेली के बारे में जानने आया हूँ।”
बाबा की आँखें अचानक फैल गईं। वह काँपते हुए फुसफुसाया,
“वहाँ मत जाना… हवेली में वो अब भी है। झील उसकी परछाई है। शवपुर तुम्हें कभी छोड़कर नहीं जाने देगा…”
अध्याय 2 : हवेली का आह्वान
रामचरन बाबा की आँखों में डर साफ झलक रहा था। उसकी आवाज़ काँप रही थी, जैसे उसने अपने जीवन में ऐसी चीज़ें देखी हों जिन्हें शब्दों में बयाँ करना आसान नहीं था। उसने फिर कहा,
“बेटा, शवपुर की हवेली श्रापित है। वहाँ हर दीवार पर खून की कहानी लिखी है। झील उस हवेली की आत्मा है। अगर तू वहाँ गया, तो तुझे कभी शांति नहीं मिलेगी।”
मैंने उसकी बातों को ध्यान से सुना, लेकिन मेरे भीतर का शोधकर्ता मानने को तैयार नहीं था। डर और जिज्ञासा का अजीब सा मेल था, जो मुझे उसी हवेली की ओर खींच रहा था।
रात गहराने लगी। मैंने गाँव के किनारे बने एक जर्जर कमरे में ठहरने का निश्चय किया। दरवाज़ा टूटा हुआ था, छत से हवा सीटी बजाते हुए गुजर रही थी। कमरे में अँधेरा घना था। मैं अपनी लालटेन जलाकर बैठा और डायरी खोली।
तारीख़: 12 अक्टूबर, रात 11:47
“आज रात की हवा में अजीब सी गंध है—सड़ांध और धुएँ की मिली-जुली।
बाबा की बातें मेरे दिमाग़ में गूंज रही हैं।
क्या सचमुच झील और हवेली आपस में जुड़ी हैं?
क्या सचमुच यहाँ आत्माएँ भटकती हैं?
या यह सब सिर्फ गाँव की कहानियाँ हैं?”
डायरी बंद करने ही वाला था कि दरवाज़े पर धीमी दस्तक सुनाई दी। मैंने लालटेन उठाई और दरवाज़े की ओर बढ़ा। बाहर कोई नहीं था। केवल हवा थी, जो झोपड़ी के बाहर खड़े पीपल के पेड़ की शाखाओं को हिला रही थी।
मैं वापस पलट ही रहा था कि मेरी नज़र ज़मीन पर पड़ी। वहाँ गीले कदमों के निशान बने हुए थे—झील से सीधे मेरी झोपड़ी तक आते हुए। मेरा गला सूख गया।
धीरे-धीरे मैंने उन निशानों का पीछा करने की कोशिश की, लेकिन वे झोपड़ी के दरवाज़े पर आकर अचानक गायब हो गए। जैसे कोई भीतर आया हो, लेकिन फिर धुएँ की तरह मिट गया हो।
उस रात मैं नींद नहीं ले पाया। हर थोड़ी देर पर लगा कि कोई मेरे कमरे के कोनों से मुझे घूर रहा है। लालटेन की रोशनी बार-बार डगमगाती, जैसे कोई अदृश्य साया उसे बुझाना चाहता हो।
भोर होने तक मैं जागता रहा। और जब पहली किरण ने खिड़की से भीतर झाँका, तभी मैंने तय किया—आज मैं हवेली के भीतर जाऊँगा। चाहे सच सामने कितना भी भयावह क्यों न हो।
अध्याय 3 : हवेली के भीतर
सुबह होते ही मैंने अपनी डायरी उठाई और लालटेन संभाली। शवपुर की हवेली गाँव के बीचोंबीच थी, ठीक उसी झील के किनारे, जिसके बारे में बाबा ने चेताया था। रास्ते भर सन्नाटा पसरा था। टूटी छतों वाले घर, बंद खिड़कियाँ और सूनी गलियाँ—जैसे यहाँ इंसान कभी रहते ही न हों।
हवेली की पहली झलक देखते ही रूह काँप गई। विशाल काले पत्थरों से बनी इमारत, जिसकी दीवारों पर काई और खून जैसे धब्बे थे। खिड़कियों के बीच से झाँकता अंधेरा मानो मुझे अंदर खींच रहा था।
मैंने डायरी खोली और लिखा—
तारीख़: 13 अक्टूबर, सुबह 9:05
“हवेली सामने है।
यह सिर्फ एक इमारत नहीं लगती, बल्कि एक जिंदा प्राणी है।
दीवारें साँस ले रही हैं, खिड़कियाँ आँखों की तरह झपक रही हैं।
मुझे लग रहा है कि यह मुझे पहचान रही है।”
दरवाज़ा चरमराते हुए अपने आप खुल गया। जैसे हवेली मेरा इंतज़ार कर रही हो। मैंने सावधानी से भीतर कदम रखा। अंदर की हवा भारी थी, जैसे सदियों से बंद कमरों में कैद हो।
दीवारों पर उभरी आकृतियाँ साफ दिखाई दे रही थीं—जले हुए हाथों के निशान, खून की उंगलियों से लिखी गई अजीब लकीरें। अचानक ऊपर से किसी औरत की कराह सुनाई दी। मेरा दिल तेज़ धड़कने लगा।
मैंने अपनी लालटेन ऊपर की सीढ़ियों की ओर उठाई। वहाँ एक परछाई खड़ी थी। लंबा कद, बिखरे बाल, और आँखें—खाली, बिना पुतलियों के। उसने मुझे देखा और फिर धीरे-धीरे अंधेरे में ग़ायब हो गई।
मेरे हाथ काँप गए। मैंने डायरी खोली और जल्दी से लिखा—
तारीख़: 13 अक्टूबर, सुबह 9:42
“हवेली में कोई है।
वह इंसान नहीं हो सकता।
उसकी आँखें खाली थीं, जैसे मौत की खिड़कियाँ।
क्या यही वह श्राप है, जिसके बारे में लोग कहते हैं?”
कमरे में अचानक दरवाज़े बंद होने लगे। एक-एक कर सब दरवाज़े अपने आप धड़ाम से बंद हो गए। पूरा घर अंधेरे में डूब गया। मेरी लालटेन टिमटिमाने लगी।
फिर वही कराह—इस बार और पास से। मैंने देखा कि सीढ़ियों पर खून रिस रहा है, जैसे ऊपर से कोई घायल होकर नीचे गिरा हो। खून की बूंदें मेरे पैरों तक पहुँच गईं।
हिम्मत जुटाकर मैं ऊपर की ओर बढ़ा। लेकिन जैसे-जैसे सीढ़ियाँ चढ़ रहा था, हवा और भारी होती जा रही थी। हर कदम पर लगा कि कोई मुझे पीछे खींच रहा है।
सीढ़ियों के अंत में एक दरवाज़ा था। उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—
“यहाँ मत आना।”
और उसी क्षण, दरवाज़े के पीछे से किसी ने जोर से चीख मारी।
अध्याय 4 : उस दरवाज़े के पीछे
दरवाज़े पर लिखा संदेश—“यहाँ मत आना”—मानो चेतावनी नहीं बल्कि एक चुनौती थी। मेरे भीतर अजीब-सी जिज्ञासा और डर दोनों एक साथ उमड़ने लगे। मैंने डायरी खोली और कांपते हाथों से लिखा—
तारीख़: 13 अक्टूबर, सुबह 10:10
“दरवाज़ा मुझे रोक रहा है, पर मुझे भीतर जाना ही होगा।
शवपुर का सच इसी के पीछे छुपा है।”
धीरे-धीरे मैंने दरवाज़े को धक्का दिया। hinges से उठती चरमराहट मानो किसी बूढ़े की आखिरी साँस हो। अंदर जाते ही ठंडी हवा ने मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया। ऐसा लगा मानो हज़ारों अदृश्य हाथ मेरी गर्दन पकड़कर दबा रहे हों।
कमरा बहुत विशाल था। दीवारों पर पुराने तेल के दीये लगे थे, लेकिन किसी अज्ञात शक्ति से वे अपने आप जल उठे। पीली लौ के उजाले में कमरे की भयावहता सामने आई।
बीचोंबीच एक टूटी हुई चारपाई पड़ी थी, जिस पर खून के धब्बे अब भी ताज़ा लग रहे थे। बगल में लोहे की जंजीरें बिखरी थीं। जैसे यहाँ किसी को बाँधकर रखा गया हो।
अचानक, मुझे दीवार पर टंगी एक तस्वीर दिखी। वह तस्वीर एक औरत की थी—लंबे काले बाल, बड़ी-बड़ी आँखें और चेहरे पर ऐसी मुस्कान, जिसमें जीवन नहीं, बल्कि मौत छुपी थी। तस्वीर के नीचे लिखा था—
“गायत्री – शवपुर की आखिरी रानी”
मैंने डायरी में जल्दी से लिखा—
तारीख़: 13 अक्टूबर, सुबह 10:27
“गायत्री… यह वही नाम है, जिसे गाँव वाले डरते हुए लेते हैं।
कहा जाता है कि उसने अपने ही परिवार का खून किया था।
क्या यह हवेली उसी की आत्मा से ग्रस्त है?”
तभी हवा और भारी हो गई। चारपाई पर जंजीरें अपने आप खड़कने लगीं। तस्वीर की आँखें अचानक हिलने लगीं। मुझे साफ लगा—वह औरत मुझे देख रही है।
अचानक चारपाई पर कोई बैठ गया। गद्दा धँस गया, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। मैंने अपनी लालटेन उठाई तो देखा—एक काला धुँधलका आकार धीरे-धीरे आकार ले रहा है।
वह गायत्री ही थी। उसका चेहरा तस्वीर से मिलता-जुलता, लेकिन आँखें लाल चमक रही थीं। उसने मुझे घूरा और ठंडी आवाज़ में कहा—
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”
मैं वहीं ठिठक गया। मेरा गला सूख गया। मेरी डायरी ज़मीन पर गिर गई। गायत्री धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ रही थी। उसके पैरों के नीचे की ज़मीन खून से भीग रही थी।
तभी दरवाज़ा जोर से बंद हो गया। मैं कमरे में कैद हो चुका था।
अध्याय 5 : श्राप का रहस्य
कमरे में अंधेरा और घना हो गया। लालटेन की लौ काँप रही थी, जैसे वह भी डर के मारे बुझ जाना चाहती हो। गायत्री की आत्मा धीरे-धीरे मेरे करीब आ रही थी। उसका चेहरा अब साफ दिखाई दे रहा था—आधी मुस्कान, आधा क्रोध और आँखों में ऐसा खूनखराबा, मानो उसने अभी-अभी किसी की जान ली हो।
मैं बुरी तरह काँप रहा था, लेकिन अपने डर को रोककर मैंने हिम्मत जुटाई और कहा—
“तुम कौन हो? ये हवेली क्यों खून से सनी है? शवपुर पर यह साया क्यों है?”
गायत्री की आत्मा एक पल के लिए ठिठकी। फिर उसकी आवाज़ गूंज उठी, मानो हवेली की हर दीवार उसके साथ बोल रही हो।
“मैं हूँ गायत्री…
शवपुर की रानी…
वह जिसे इस गाँव ने धोखा दिया।
मैंने अपने ही खून से इस हवेली को लाल किया, और फिर मैंने इस गाँव को श्राप दिया। अब यहाँ कोई भी चैन से नहीं जी सकेगा। हर आत्मा, हर साँस मेरे नाम की बंधक है।”
उसकी बात सुनकर मेरा गला सूख गया। मैंने जल्दी से डायरी उठाई और लिखना शुरू किया—
तारीख़: 13 अक्टूबर, सुबह 11:05
“गायत्री ने शवपुर को श्राप दिया।
उसने अपने परिवार को मारा और गाँव को हमेशा के लिए अंधकार में धकेल दिया।
पर क्यों? उसकी नफरत का कारण क्या था?”
गायत्री अब मेरे सामने मंडरा रही थी। उसके होंठ काँपे और उसने सच उगलना शुरू किया।
“मेरे पति राजा रणविजय ने मुझे धोखा दिया। उसने गाँव वालों के साथ मिलकर मुझे जिंदा दीवारों में चुनवा दिया। उन्होंने कहा मैं अपशकुनी हूँ… कि मेरी कोख से पैदा होने वाला बच्चा इस गाँव के लिए विनाश लाएगा। उन्होंने मेरी चीखें सुनीं, लेकिन किसी ने मदद नहीं की।
मैंने अपनी आखिरी साँस लेते वक्त सबको श्राप दिया—
कि न कोई बच्चा जन्म लेगा, न कोई आत्मा शांति पाएगी।
शवपुर हमेशा खून और मौत में डूबा रहेगा।”
इतना कहते ही कमरा काँप उठा। छत से धूल झड़ने लगी, दीये बुझ गए और बस उसकी लाल आँखें चमकती रहीं।
मैंने डायरी में काँपते हाथों से लिखा—
तारीख़: 13 अक्टूबर, सुबह 11:17
“यह हवेली एक कब्र है।
गायत्री की आत्मा अब भी यहाँ भटक रही है।
उसका श्राप पूरे शवपुर को बाँध चुका है।”
अचानक, गायत्री ने मेरी ओर झुककर फुसफुसाया—
“अब तू भी इस श्राप का हिस्सा है…
शवपुर से कोई ज़िंदा नहीं निकलता।”
उसकी ठंडी साँस मेरे चेहरे से टकराई। मैं सिहर गया। तभी दरवाज़े के बाहर से किसी ने जोर-जोर से खटखटाना शुरू किया।
“अभय! दरवाज़ा खोल! जल्दी!”
वह आवाज़ रामचरन बाबा की थी।
अध्याय 6 : भागने की कोशिश
दरवाज़े पर लगातार ज़ोर की खटखटाहट हो रही थी। मैं घबराकर खड़ा हो गया। गायत्री की परछाई अचानक गायब हो गई, जैसे धुएँ में घुलकर हवा में मिल गई हो। कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया।
मैंने काँपते हाथों से दरवाज़ा खोला। सामने रामचरन बाबा खड़े थे। उनके माथे पर पसीना था और हाथ में ताबीज़ और रुद्राक्ष की माला।
उन्होंने मुझे पकड़कर बाहर खींचा और जोर से कहा—
“पगले! वहाँ क्या कर रहा था तू? तुझे मालूम है किससे बातें कर रहा था? वह कोई और नहीं, इस गाँव की मौत है—गायत्री!”
मैंने हाँफते हुए कहा—
“बाबा, मैंने सब देखा… उसने सच बता दिया। उसे ज़िंदा दीवारों में चुनवा दिया गया था। उसने श्राप दिया था शवपुर को… बाबा, अब मैं क्या करूँ?”
रामचरन बाबा ने मेरी आँखों में देखते हुए धीमी आवाज़ में कहा—
“अब तू इस श्राप का हिस्सा बन चुका है। लेकिन अगर तू चाहे, तो इसे तोड़ भी सकता है… बस एक ही तरीका है—तुझे गायत्री की हड्डियाँ ढूँढनी होंगी और उन्हें गंगा जल में बहाना होगा। तभी उसकी आत्मा को शांति मिलेगी। वरना वह तुझे भी नहीं छोड़ेगी।”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। हवेली का हर कोना अंधकार से भरा था। और उन्हीं अंधेरे कमरों में कहीं गायत्री की हड्डियाँ छिपी थीं।
डायरी में मैंने जल्दी-जल्दी लिखा—
तारीख़: 13 अक्टूबर, दोपहर 1:10
“श्राप तोड़ने का एक ही रास्ता है—
गायत्री की हड्डियाँ ढूँढकर उन्हें गंगा जल में बहाना।
लेकिन हवेली अब ज़िंदा है। हर दीवार, हर छाया मुझे देख रही है।”
हमने साहस जुटाया और हवेली के गहरे हिस्से की ओर बढ़े। बाबा लगातार मंत्र पढ़ रहे थे—
“ॐ नमः शिवाय… ॐ नमः शिवाय…”
पर अचानक हवेली की दीवारों से कराहने की आवाज़ आने लगी। जैसे किसी को फिर से दीवारों में जिंदा गाड़ा जा रहा हो।
मेरे कानों में एक स्त्री की चीख गूँज उठी—
“कोई है…! मुझे बाहर निकालो…! मुझे बचा लो…!”
मैंने बाबा का हाथ पकड़ लिया।
“बाबा! ये आवाज़… यही तो गायत्री की है।”
बाबा ने गंभीर स्वर में कहा—
“हाँ अभय, यही उसका श्राप है। वह आज तक वही चीख रही है। उसकी हड्डियाँ यहीं कहीं दीवारों के पीछे छुपी हैं।”
मैं काँपते हाथों से लालटेन उठाकर दीवार पर रोशनी डालने लगा। एक जगह दीवार में ताज़ा दरारें दिखाई दीं, जैसे किसी ने हाल ही में उसे छेड़ा हो।
अचानक उस दरार से खून रिसने लगा…
अध्याय 7 : खून से सनी दीवारें
दीवार की दरार से खून बहते देख मेरा गला सूख गया। लालटेन काँपते हाथों में हिल रही थी। बूढ़े रामचरन बाबा भी सिहर उठे, लेकिन उनका मंत्रोच्चार और तेज़ हो गया।
“ॐ नमः शिवाय… ॐ नमः शिवाय…”
खून धीरे-धीरे दीवार पर फैलने लगा और पूरा हिस्सा लाल हो गया। ऐसा लग रहा था, मानो दीवार जिंदा हो और उसकी नसों से लहू बह रहा हो।
मैंने घबराकर कहा—
“बाबा… ये क्या हो रहा है?”
उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए कहा—
“यही है वह जगह। गायत्री की हड्डियाँ यहीं कैद हैं। लेकिन सावधान रहना, उसे यह अच्छा नहीं लगेगा कि हम उसकी कैद तोड़ने की कोशिश करें।”
इतना कहते ही अचानक हवेली की बत्ती खुद-ब-खुद जल उठी। पूरा हॉल रोशनी से भर गया। पर वह रोशनी गर्माहट नहीं, बल्कि ठंडक और डर लेकर आई थी। छायाएँ दीवारों पर नाचने लगीं।
दीवार पर से एक-एक कर उभरने लगे हाथों के निशान। जैसे किसी ने भीतर से जोर-जोर से ठोकरें मारी हों।
“ठक… ठक… ठक…”
मैंने काँपती आवाज़ में कहा—
“बाबा… वह हमें बाहर निकालना चाहती है…”
अचानक दीवार फट पड़ी! मिट्टी और ईंटें इधर-उधर गिर पड़ीं। धूल के बीच कुछ सफ़ेद चमक रहा था—हड्डियों का ढेर!
मेरा दिल धड़क उठा।
“बाबा… ये… ये तो गायत्री की हड्डियाँ हैं।”
लेकिन तभी एक ठंडी हवा का झोंका आया और रोशनी बुझ गई। अंधेरे में वही परिचित स्त्री-स्वर गूँजा—
“छुओ मत उन्हें… वो मेरी हैं… मेरी…”
मैंने लालटेन फिर से जलाई। सामने गायत्री की परछाई खड़ी थी। उसकी आँखें गहरी खाइयों जैसी थीं और चेहरा अब पहले से कहीं ज्यादा डरावना।
उसने हाथ बढ़ाकर मेरी ओर इशारा किया।
“अभय… तुमने वादा किया था कि मुझे मुक्ति दोगे… लेकिन मुक्ति आसान नहीं है। अगर मेरी हड्डियों को छुआ… तो तुम्हें भी मेरी तरह इन दीवारों का हिस्सा बनना होगा।”
रामचरन बाबा ने जोर से मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया—
“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे… सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्…”
गायत्री चीख उठी। उसके स्वर से पूरा हवेली हिलने लगी। हड्डियों के ढेर से अचानक एक लंबी साया निकली और हवा में घूमते हुए हमारी तरफ़ बढ़ा।
मैंने डायरी में जल्दी-जल्दी लिखा—
तारीख़: 13 अक्टूबर, शाम 4:05
“दीवार से हड्डियाँ बाहर आ चुकी हैं।
गायत्री की आत्मा उन्हें बचाना चाहती है।
लेकिन बाबा कह रहे हैं यही श्राप तोड़ने का मौका है।
अगर आज ये काम अधूरा रह गया… तो मेरी मौत पक्की है।”
मैं आगे बढ़ा और काँपते हाथों से हड्डियों को छू लिया। तभी पूरी हवेली से हज़ारों चीखें एक साथ गूँज उठीं।
अध्याय 8 : हवेली की चीखें
जैसे ही मैंने हड्डियों को छुआ, पूरा शवपुर गाँव हिल गया। हवेली की टूटी-फूटी दीवारें ज़ोर से चरमराने लगीं, मानो अंदर कोई कैदखाना खुल गया हो।
हवा में एक साथ हज़ारों चीखें गूँज उठीं। औरतों की, बच्चों की, बूढ़ों की, जवानों की—सबकी। ऐसा लगा मानो सदियों से कैद आत्माएँ एक साथ विलाप कर रही हों।
मैं अपने कान बंद कर लेना चाहता था, लेकिन वह आवाज़ मेरे दिमाग़ के भीतर गूँज रही थी।
“बचाओ… हमें बचाओ…”
“हम यहीं दबे पड़े हैं…”
“हवेली हमारी कब्र है…”
रामचरन बाबा ज़ोर से चिल्लाए—
“मत घबराना अभय! ये वही आत्माएँ हैं जिन्हें गायत्री ने हवेली में बाँध रखा है। इनकी मुक्ति तुम्हारे हाथों में है। मंत्र पढ़ते रहो!”
मैंने काँपते होंठों से वही मंत्र दुहराना शुरू किया—
“ॐ नमः शिवाय… ॐ नमः शिवाय…”
लेकिन तभी एक ठंडी उँगली ने मेरे गले को छुआ। मेरी साँसें थम सी गईं। मैंने धीरे-धीरे पीछे देखा।
गायत्री ठीक मेरे पीछे खड़ी थी।
उसकी आँखों से खून की धाराएँ बह रही थीं और चेहरा इतना विकृत कि पहचान पाना मुश्किल था। उसने अपने लंबे नाखून मेरे कंधे में गड़ा दिए और फुसफुसाई—
“तुम सोचते हो मुझे रोक लोगे? यह हवेली मेरी है… और अब तुम भी मेरे हो…”
मैं दर्द से चीख पड़ा। खून मेरे कंधे से बहने लगा। बाबा ने तुरंत अपनी कमंडल से गंगाजल मेरे ऊपर छिड़का।
गायत्री की चीख निकली और वह पीछे हट गई।
दीवारों पर परछाइयाँ और तेज़ी से नाचने लगीं।
हड्डियाँ हिलने लगीं।
छत से धूल और चूना गिरने लगा।
डायरी मेरे हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गई, लेकिन मैंने काँपते हाथों से उसे उठाया और जल्दी-जल्दी लिखा—
तारीख़: 13 अक्टूबर, शाम 4:25
“पूरी हवेली चीख रही है।
हर दीवार, हर पत्थर, हर खिड़की से आत्माएँ बाहर निकलने की कोशिश कर रही हैं।
गायत्री मुझे रोकना चाहती है।
लेकिन अगर आज मैंने हड्डियाँ अग्नि को नहीं सौंपी… तो यह हवेली हमेशा के लिए मेरी कब्र बन जाएगी।”
अचानक हवेली का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। तेज़ आंधी चलने लगी। लालटेन बुझ गई।
सिर्फ़ अंधेरा था। और उस अंधेरे में गायत्री की हँसी…
“हा… हा… हा… तुम मुझसे बच नहीं सकते अभय…”
अंतिम अध्याय : मुक्ति का अग्निकुंड
हवेली की हर दीवार चीख रही थी। लकड़ी की सीढ़ियाँ अपने आप जलने लगी थीं और हवेली के बीचोंबीच एक अग्निकुंड प्रकट हो गया। उसका तेज़ इतना था कि मेरी आँखें चौंधिया गईं।
रामचरन बाबा ने मेरी ओर इशारा किया—
“यही समय है अभय! हड्डियाँ इस अग्नि को सौंप दो, तभी आत्माएँ मुक्त होंगी। लेकिन सावधान… गायत्री आख़िरी बार पूरी ताक़त से तुम्हें रोकने आएगी।”
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने हड्डियों से भरे कपड़े को कसकर पकड़ा और अग्निकुंड की ओर बढ़ा। लेकिन तभी हवा का एक भयंकर झोंका आया और पूरा आकाश लाल हो गया।
गायत्री मेरे सामने प्रकट हुई।
उसकी आँखें अब अंधेरे में जलती मशालों की तरह चमक रही थीं। उसकी हँसी हवेली की नींव तक हिला रही थी।
वह चीखी—
“कोई मुझे रोक नहीं सकता! यह हवेली मेरी है, यह आत्माएँ मेरी हैं, और अब… तुम्हारी आत्मा भी मेरी होगी!”
उसके शब्दों के साथ हवेली की छत से काली लपटें उठने लगीं। फर्श पर खून बहने लगा। आत्माएँ चीखने लगीं, जैसे वे जान गई हों कि आख़िरी युद्ध शुरू हो गया है।
मैंने अपने काँपते पैरों को ज़बरदस्ती आगे बढ़ाया।
गायत्री ने अपने नाखून हवा में लहराए और वे तलवारों की तरह मेरे सीने की ओर बढ़े।
तभी बाबा ने मंत्र पढ़ा और अपनी कमंडल से गंगाजल अग्निकुंड में डाला। अग्नि और तेज़ हो उठी।
मैंने पूरी ताक़त से हड्डियों को अग्नि में फेंक दिया।
जैसे ही हड्डियाँ आग से स्पर्श हुईं, पूरा शवपुर गाँव दहाड़ की तरह गूँज उठा। आत्माओं की चीखें अचानक शांत हो गईं। हवा थम गई।
गायत्री दर्द से चीखने लगी।
“नहीं… नहीं… ये आग मुझे जला देगी… मैं नहीं मर सकती… मैं अमर हूँ…”
लेकिन उसकी आवाज़ धीरे-धीरे धुँधली होने लगी।
उसका शरीर राख में बदलने लगा और अंत में एक भयंकर विस्फोट हुआ।
हवेली की दीवारें गिर गईं।
अंधेरा छंट गया।
सिर्फ़ शांति रह गई।
मैं ज़मीन पर गिर पड़ा। साँसें तेज़ चल रही थीं।
रामचरन बाबा ने मेरा हाथ पकड़कर कहा—
“बेटा… तूने कर दिखाया। सदियों से कैद आत्माएँ अब मुक्त हो गई हैं। शवपुर का श्राप आज समाप्त हुआ।”
मैंने अपनी डायरी खोली और अंतिम पंक्ति लिखी—
तारीख़: 13 अक्टूबर, रात 11:59
“आज शवपुर की आत्माएँ मुक्त हो गईं। हवेली राख में बदल चुकी है।
लेकिन मेरे भीतर अब भी गायत्री की हँसी गूँज रही है…
क्या वाक़ई वह हमेशा के लिए चली गई?
या फिर किसी अंधेरी रात को… वह फिर लौट आएगी?”
मैंने कलम रख दी।
और उसी पल हवेली की राख में से ठंडी हवा का एक झोंका उठा।
उसमें हल्की-सी हँसी तैर रही थी…
“हा… हा… हा…”
🕯️ समाप्त… या शायद नहीं।