राजस्थान की सीमा पर बसे, नक़्शों में मुश्किल से दिखाई देने वाले, एक लगभग-भूले गाँव कांकरेड़ा का नाम बहुत कम लोग जानते हैं। जो जानते हैं… वे इसके बारे में बोलने से कतराते हैं। कहते हैं—वहाँ रात और मौत में फ़र्क नहीं है।
कई साल पहले इस गाँव को “शापित” कहा गया था, एक ऐसा शाप जिसे न मिटाया जा सका, न भुलाया जा सका।
यह कहानी उसी शाप की है।
और उन लोगों की, जो बिना जाने… इस अँधेरे में कदम रख बैठे।
अरविंद चौबीस वर्ष का, दिल्ली में रहने वाला एक फोटोग्राफर था। उसका जुनून—पुरानी, रहस्यमयी जगहों को कैमरे में कैद करना। उसे हमेशा लगता, “जहाँ डर है, वहीं एक अच्छी कहानी छिपी है।”
एक शाम उसे पुरानी किताबों की एक दुकान में एक फटी-पुरानी डायरी मिली। डायरी की पहली ही पंक्ति उसे चौंका गई—
“कांकरेड़ा में जो अँधेरा है… वह रात से नहीं, वहाँ रहने वाली चीज़ों से है।”
डायरी एक भटकती हुई शोधकर्ता “आर्या मिश्रा” की थी, जो तीन साल पहले लापता हो चुकी थी। डायरी के अंत में एक नक्शा बना था—कांकरेड़ा गाँव का।
बस वही नक्शा और एक चेतावनी…
“जो भी इस गांव जाता है… वापस नहीं लौटता।”
पर अरविंद का मन बदलने वाला नहीं था।
अरविंद अपनी मित्र रिद्धि और दोस्त समीर के साथ कार से निकल पड़ा। तीनों साहसिक कामों के शौकीन थे।
शाम ढली, और सुनसान सड़कें शुरू हो गईं।
रिद्धि ने कहा,
“यार, ये रास्ता गूगल मैप पर भी साफ़ नहीं आ रहा।”
समीर हँसा, “भूत तो नहीं आ रहे कहीं?”
अरविंद मुस्कुराया, पर उसके अंदर एक अनजानी बेचैनी उठ रही थी।
सड़कें सँकरी हो रही थीं, पेड़ घने होते जा रहे थे। कुछ देर बाद एक बोर्ड दिखाई दिया—
“कांकरेड़ा – 2 किलोमीटर”
पर वह बोर्ड आधा टूटा हुआ था, जैसे किसी ने नाखूनों से खुरच-खुरचकर इसे मिटाने की कोशिश की हो।
रात का अँधेरा जलते हुए कोयले जैसा घना था।
हवा अचानक ठंडी हो गयी। बहुत ठंडी।
गाँव में घुसते ही तीनों को एक अजीब सी दुर्गंध महसूस हुई—सड़ी मिट्टी, पुराने खून और नमी की मिलीजुली बदबू।
गाँव वीरान था।
न घरों में रोशनी, न कहीं लोग।
घरों की खिड़कियाँ तख्तों से बंद थीं, जैसे कोई चीज़ अंदर कैद हो… या बाहर आने से रोकी गई हो।
अरविंद ने कैमरा निकाला ही था कि अचानक उसे लगा—दूर एक घर की खिड़की के पीछे कोई छाया हिली।
“तुम लोगों ने देखा?” उसने पूछा।
रिद्धि ने निगाहें तरेरीं, “हाँ… मुझे लगा कोई हमें देख रहा है।”
तीनों एक पुराने हवेली जैसे घर के सामने रुके। मुख्य दरवाज़ा अजीब तरह से आधा खुला था।
जैसे कोई उन्हें अंदर आने का निमंत्रण दे रहा हो।
हवेली अंदर से और भी भयानक थी। जाले, टूटी लकड़ी, दीवारों पर पुराने हाथों के काले निशान।
समीर ने टॉर्च चलाई—
और अचानक दीवार पर कुछ लिखा नज़र आया—
“मत खोलना… वो जाग जाएगी।”
अभी तीनों यह समझ ही रहे थे कि तभी ऊपर की मंज़िल पर लोहे की जंजीरों जैसा घसीटने की आवाज़ आई।
“यह क्या था?” रिद्धि डरकर बोली।
अरविंद ने धीरे से कहा, “कोई है ऊपर…”
समीर ने कहा, “चलकर देखते हैं, शायद यहाँ कोई बचा-खुचा गाँव वाला हो।”
तीनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
सीढ़ियों पर धूल की मोटी परत थी—एकदम अछूती।
जैसे कोई कई सालों से ऊपर गया ही न हो।
लेकिन कुछ देर पहले तो आवाज़ आई थी…
ऊपर पहुँचकर उन्हें लंबा अंधेरा गलियारा दिखा।
गलियारे के अंत में एक दरवाज़ा था—
और वह धीरे-धीरे अपने आप खुलने लगा।
क्रीईईईक…
दरवाजा पूरा खुलते ही अंदर एक पुरानी लाल चुनरी हवा में लटकी हुई दिखी—जैसे किसी अदृश्य गर्दन पर पड़ी हो।
रिद्धि चीख पड़ी।
और तभी… चुनरी एक झटके से फ़र्श पर गिर गई।
हवेली छोड़कर तीनों बाहर आ गए। अब वे गाँव के बीचोंबीच थे।
अरविंद बुदबुदाया,
“यहाँ कुछ गड़बड़ है… लेकिन मुझे डायरी वाला मंदिर ढूँढ़ना है।”
डायरी में लिखा था कि कांकरेड़ा का शाप एक पुरानी देवी के क्रोध से जुड़ा था—जिस मंदिर में देवी की मूर्ति अब नहीं थी… या शायद छिपा दी गई थी।
चलते-चलते समीर ने पूछा,
“क्या किसी ने सुना? कोई हमारे पीछे चल रहा है।”
तीनों रुके।
पीछे—कदमों की आहट।
स्पष्ट, धीमी… और जानबूझकर।
लेकिन सड़क खाली थी।
हवा में हल्की फुसफुसाहट उठी—
“मत… रुको…”
रिद्धि यह सुनकर काँप उठी।
“अरविंद, कोई हमें चेतावनी दे रहा है।”
अरविंद बोला, “या फँसा रहा है।”
तीनों एक बेहद पुराने, बेहद गहरे कुएँ के पास पहुँचे।
डायरी में इसी कुएँ का उल्लेख था—
“यही वह जगह है जहाँ पहला खून बहा था। यही वह जगह है जहाँ से शाप शुरू हुआ।”
कुएँ के चारों ओर राख बिखरी थी, जैसे कोई लंबे समय तक यहीं आग जलाता रहा हो।
अचानक कुएँ के भीतर से आवाज़ आई—
छपाक… छपाक…
जैसे कोई भीतर पानी में चल रहा हो।
“यह कैसे हो सकता है?” समीर फुसफुसाया। “यह कुआँ तो वर्षों से सूखा बताया गया है…”
अरविंद झुककर नीचे देखने लगा।
अचानक…
एक सफ़ेद सूखी हथेली कुएँ के भीतर से बाहर आई और उसकी उंगलियाँ पत्थर पर रेंगने लगीं।
रिद्धि चीख पड़ी, “भागो!”
लेकिन हथेली अब ऊपर चढ़ने लगी थी…
काफी दूर भागने के बाद तीनों एक टूटा हुआ, पर विशाल मंदिर के पास पहुँचे।
मंदिर के दरवाज़े पर खून जैसे गाढ़े लाल रंग से लिखा था—
“वह अभी भी भूखी है।”
रिद्धि ने काँपते हुए कहा,
“कौन? किसकी बात हो रही है?”
अरविंद बुदबुदाया,
“कांकर देवी… डायरी में उसका नाम कई बार आया था।”
मंदिर के मुख्य कक्ष में पहुँचकर उन्हें एक बड़ा चबूतरा मिला—
लेकिन उस पर मूर्ति गायब थी।
सिर्फ दो सुनहरी आँखें जैसे किसी अदृश्य चेहरे पर टँगी हों।
ज़मीन पर कई पुराने बलिदान के निशान थे।
अचानक मंदिर में घंटा अपने आप बज उठा।
ढनन…
ढनन…
ढनन…
और मंदिर के भीतर छाया-सी आकृति घूमने लगी—धीरे-धीरे, बिना आवाज़।
उस आकृति के लंबे, अस्वाभाविक बाल फ़र्श पर घिसट रहे थे।
समीर ने कांपती आवाज़ में कहा,
“यह इंसान नहीं है…”
अचानक मंदिर की दीवारें हिलने लगीं।
फ़र्श में दरारें पड़ गईं और काले धुएँ जैसी लपटें फैलने लगीं।
और तभी एक धीमी, भयावह आवाज़ हवा में गूँज उठी—
“तुम्हें… नहीं आना चाहिए था…”
सामने वह लाल चुनरी फिर दिखाई दी—लेकिन इस बार चुनरी हवा में नहीं, एक औरत के कंकाल जैसे शरीर पर थी।
उसके लंबे नाखून ज़मीन पर रगड़ते हुए चिंगारियाँ निकाल रहे थे।
रिद्धि भय से जड़ हो गई।
“यह… देवी है?”
अरविंद बोला,
“नहीं। यह वह है जिसे देवी ने शाप दिया था। देवी की पुजारी… जिसने गाँव के सभी लोगों को मार डाला था!”
कंकाली औरत चीख रही थी—गूँजती, जानलेवा चीख…
“बंद कर दिया उन्होंने मुझे… इतने साल… भूखी…”
समीर ज़ोर से चिल्लाया, “भागो!”
तीनों मंदिर से बाहर भागे।
लेकिन मंदिर के पीछे से दर्जनों छायाएँ निकलने लगीं—
बिना चेहरों के, बिना आँखों के… बस अँधेरे से बने शरीर।
वे तेज़ी से पास आ रही थीं।
गाँव में भगदड़ मच गई—लेकिन वहाँ भागने की जगह ही कहाँ थी?
सड़कें जैसे बदल रही थीं।
हर मोड़ उन्हें वापस वहीं ले आता जहाँ से वे निकले थे।
छायाएँ अब उनके करीब थीं।
कहीं से बच्चों जैसी हँसी गूँज रही थी—कर्कश, मरती हुई, भयानक।
रिद्धि चिल्लाई,
“यह गाँव जिंदा है! ये रास्ते बदल रहा है!”
समीर फिसलकर गिर पड़ा।
उसके पैर पर कुछ पकड़ लिया—एक ठंडी, हड्डियों जैसी उंगलियाँ।
अरविंद ने उसे खींचकर उठाया।
पर समीर का चेहरा पीला पड़ चुका था।
उसकी आँखें फैल रही थीं।
“वह…” समीर काँप रहा था, “वह मेरे पीछे है…”
अरविंद और रिद्धि ने पीछे देखा—
लाल चुनरी वाली कंकाली औरत पेड़ों के बीच से रेंगती हुई आ रही थी।
उसके मुँह से खून की जगह काला धुआँ निकल रहा था।
आख़िरकार वे गाँव के बाहर पहुँच ही गए।
सामने उनकी कार खड़ी थी, पर हेडलाइट अपने आप जल-बुझ रही थीं।
तीनों कार में बैठे, इंजन स्टार्ट किया—
पर कार की खिड़की पर ठक… ठक… ठक… की आवाज़ आई।
रिद्धि ने देखा—
लाल चुनरी खिड़की से चिपकी हुई थी।
अरविंद ने पूरी ताकत से एक्सलेटर दबाया।
कार तेजी से आगे बढ़ी।
गाँव का बोर्ड फिर सामने आया।
लेकिन इस बार उस पर खून से लिखा था—
“अगली बार… रात खुद तुम्हें बुलाएगी।”
कुछ देर बाद तीनों हाईवे पर पहुँचे।
अँधेरा पीछे रह गया था।
वे बच गए थे…
या उन्हें ऐसा लगा।
दिल्ली पहुँचकर तीनों ने चैन की साँस ली।
पर उस रात रिद्धि के कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।
हल्की हवा चली…
और उसके बिस्तर पर वही लाल चुनरी पड़ी मिली।
रिद्धि चीख उठी।
पर उससे भी भयानक दृश्य सुबह देखने को मिला—
समीर बिस्तर पर मृत पड़ा था।
चेहरे पर भय का भाव…
और उसकी गर्दन पर उंगलियों के निशान।
अरविंद ने खबर सुनी और दौड़कर पहुँचा—तो समीर की दीवार पर खून से लिखा था—
“एक गया… दो बाकी।”
अरविंद समझ गया—
कांकरेड़ा का अँधेरा अब गाँव तक सीमित नहीं रहा।
वह उनका पीछा कर रहा है।
और यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
क्योंकि उसी रात अरविंद ने अपने कैमरे की गैलरी खोली—
हर फोटो में उन्हें सिर्फ वीरान हवेली दिखनी चाहिए थी…
लेकिन हर फोटो के पीछे खड़ी थी वह लाल चुनरी वाली आकृति।
कभी और नज़दीक…
कभी और साफ़…
आख़िरी फोटो में—
वह अरविंद के ठीक पीछे खड़ी थी,
और उसके कंकाल जैसे होंठों पर डरावनी हँसी उभर रही थी।
कांकरेड़ा का शाप खत्म नहीं हुआ है।
जो भी इस नाम को सुनता है… वह धीरे-धीरे उसकी ओर खिंचता चला जाता है।
और रात—
रात कभी खाली नहीं रहती।
वह अपने लिए नए चेहरे ढूँढती रहती है।
अगर आप यह कहानी पढ़ रहे हैं…
तो याद रखिए—
कुछ दरवाज़े खुलने के लिए नहीं होते।
और कुछ गाँव…
कभी नहीं छोड़ते उन्हें,
जो एक बार वहाँ चले जाते हैं।